भोगपदार्थोंकी स्थिति

याद रखो—संसारके भोगपदार्थोंकी वैसी ही स्थिति है, जैसी बच्चोंके खिलौनोंकी; जैसे बच्चे काँचकी रंग-बिरंगी गोलियोंसे, मिट्टी-पत्थर-धातुके खिलौनोंसे खेलते हैं, उनमें आसक्ति-ममता करते हैं, उनके छीने जाने या नष्ट हो जानेपर दु:खी होते तथा रोते हैं, छीन लेने या तोड़ देनेवालोंपर क्रुद्ध होते हैं, उनसे लड़ते-झगड़ते हैं, अपमानको सहन न करके उसका बदला लेना चाहते हैं, ठीक वैसे ही बड़ी उम्रके तुमलोग मकान, जमीन, भोगपदार्थ, मान-सम्मान, नाम-इज्जत आदिके लिये व्यवहार-बर्ताव तथा अनुभव करते हो। बच्चोंका अज्ञान अविकसित है, इससे उनको दीर्घकालतक स्मृति नहीं रहती। वे लड़-झगड़कर जल्दी प्रसन्न हो जाते हैं, अपमानको भी जल्दी भूल जाते हैं। बड़ी उम्रके तुमलोगोंका अज्ञान विकासको प्राप्त रहता है, इसलिये तुम जीवनभर स्मरण रखते हो और इसलिये जन्मान्तरमें भी उसके संस्कारोंको साथ लिये जाते हो।

याद रखो—यहाँका जीवन तुम्हारी लम्बी यात्राका एक मार्ग है, घर-द्वार आदि सब रेलके डिब्बे या रास्तेकी सरायके समान हैं। यहाँकी चीजें मार्गके निर्वाहके लिये हैं और यहाँके सम्बन्ध यात्रियोंके यात्राकालके परस्पर कल्पित सम्बन्धके अनुसार हैं। न यहाँके काम तुम्हारे काम हैं, न यहाँका घर तुम्हारा स्थायी घर है, न यहाँकी वस्तुएँ तुम्हारी अपनी हैं और न यहाँके सम्बन्ध ही तुम्हारे स्थायी सम्बन्ध हैं। ये सब कामचलाऊ हैं, अनित्य हैं और कल्पनामात्र हैं। इनके साथ वास्तविक सम्बन्ध जोड़कर इनमें ममता-आसक्ति कर लेनेसे ही सारी फँसावट होती है, एक दु:खके बाद दूसरे नये दु:खकी परिस्थिति आती रहती है तथा एकके बाद दूसरा नया बन्धन उत्पन्न होता रहता है। रास्तेमें मुसाफिर एक-दूसरेसे लड़ बैठें, द्वेष-वैर करने लगें तो क्लेश-कलह-दु:ख तथा कहीं-कहीं मुकद्दमा चल जानेपर नया दु:ख—बन्धन हो जाता है, यात्रामें रुकावट आ जाती है; वैसे ही ममता-आसक्ति करनेपर भी राहमें रुकावट तथा बन्धन होता है। अतएव इस जीवनको मुसाफिरका जीवन समझकर अपने एकमात्र लक्ष्य परमानन्दरूप भगवान‍्की प्राप्तिको सामने रखते हुए सावधानीके साथ अपने मार्गपर चलते रहो। न किसी प्राणी-पदार्थ-परिस्थितिके साथ राग या ममत्व करो तथा न किसीके साथ द्वेष या परत्व करो। सेवा करो, प्रेम करो, सुख दो—सेवा चाहो मत, दूसरेको प्रीति करनेके लिये बाध्य न करो—सुखकी किसीसे आशा न रखो और यहाँके तमाम भोग-पदार्थोंको क्षणभंगुर, अनित्य, केवल देखनेमें सुन्दर—फलमें असुन्दर समझकर उनका यथायोग्य उपयोग करो; पर करो इन्हें खिलौने समझकर, न कि अपनी वस्तु समझकर।

याद रखो—यहाँ जो वस्तु, प्राणी, परिस्थिति प्राप्त नहीं हैं, उनके लिये दु:ख न करो और न उनके लिये लुभाओ, ललचाओ। जो प्राप्त हैं, उनका निरन्तर भगवत्सेवामें प्रयोग करो। प्रत्येक परिस्थितिसे लाभ उठाओ और लाभ उठानेका यही अर्थ है कि उन प्राणी-पदार्थ-परिस्थितिको भगवत्सेवाके उपयोगी बनाकर सदा-सर्वदा अपनेको सेवामय बनाये रखो। तुम्हारे जीवनका प्रत्येक श्वास, प्रत्येक विचार, प्रत्येक क्रिया तथा प्रत्येक पदार्थ भगवान‍्की सेवामें ही लगना चाहिये, तभी उनकी सार्थकता है। नहीं तो ‘व्यर्थ’ ही नहीं, वे ‘अनर्थ’-रूप हैं।

याद रखो—जीवनका जो क्षण, जो विचार, जो कार्य भगवान‍्की सेवामें लगता है, वह वास्तविक ‘अर्थ’ है—यह अर्थ ही परमार्थ है। जो निर्दोष भोगकी प्राप्ति तथा संयोगमें लगता है, वह ‘व्यर्थ’ है और जो दोषयुक्त अवैध भोगोंके भोग तथा प्राप्तिके साधनमें लगता है, वह सर्वथा ‘अनर्थ’ है। ‘अनर्थ’ का सर्वथा परित्याग करो, उसे बिलकुल छोड़ दो। ‘व्यर्थ’ का भी त्याग करो; क्योंकि जीवन बरबाद होता है और केवल ‘अर्थ’ का सेवन करो, जीवनको सर्वतोभावेन ‘परमार्थ’ में लगाओ।

याद रखो—इसीसे भगवान‍्के द्वारा गीतामें प्रयुक्त चतुर्विध आर्त, जिज्ञासु, अर्थार्थी और ज्ञानी भक्तोंकी एक महात्माने ठीक क्रमसे यह व्याख्या की है कि जो परमार्थरूप भगवान‍्की प्राप्तिके लिये अत्यन्त आतुर है, परम दु:खी है—बिलकुल आर्त होकर रो रहा है, वह ‘आर्त’ भक्त है। जो प्रत्येक प्राप्त साधन-सामग्रीसे तथा बुद्धि-विद्या-संत आदिसे केवल भगवान‍्का ही संधान पूछता है, वह ‘जिज्ञासु’ है। जो केवल भगवान‍‍्रूप ‘अर्थ’ के लिये ही अनन्यरूपसे तीव्रतम कामना करता है, वह ‘अर्थार्थी’ है और जो भगवान‍्का यथार्थ संधान प्राप्त कर चुका है, वह ‘ज्ञानी’ है। इसलिये तुम सदा सच्चे अर्थमें ‘सच्चे अर्थ’ के लिये ‘अर्थार्थी’ बनो। भगवान् ही वह सच्चा अर्थ हैं।