जीव भगवान्का सनातन अंश
याद रखो—तुम शरीर नहीं हो; तुम सच्चे अर्थमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और पिता, पुत्र, पति, गुरु, पत्नी, माता आदि नहीं हो। तुम हो सच्चिदानन्द आत्मा या तुम हो भगवान्के सनातन अंश।
याद रखो—यह शरीर तथा इस शरीरके सम्बन्धको लेकर कहे जानेवाले नाम सब कल्पित हैं और हैं केवल लोगदेखाऊ या कामचलाऊ—व्यावहारिक जगत्में केवल व्यवहारके लिये। ये न तुम्हारा स्वरूप हैं, न इनसे तुम्हारा कोई सम्बन्ध है।
याद रखो—शरीरको तथा शरीरके सम्बन्धसे कहे जानेवाले नामोंको अपना स्वरूप मान लेनेके कारण ही शरीरमें तथा प्राणिपदार्थोंमें तुम्हारी अहंता, ममता, आसक्ति हो गयी है तथा इनकी कामना-वासनामें फँसकर तुम बिना हुए ही दु:खी हो रहे हो और यह दु:ख जबतक इस शरीर तथा शरीरके सम्बन्धसे कहे जानेवाले नामोंमें स्वरूप-बुद्धि रहेगी, तबतक मिटेगा ही नहीं—चाहे बाहरी स्थिति कुछ भी, कैसी भी क्यों न हो जाय।
याद रखो—इस मिथ्या मान्यताके कारण ही ममता, आसक्ति, कामनाके वश हुए तुम नाना प्रकारकी अनन्त आशाकी फाँसियोंसे बँधे हुए हो, इन्हींके कारण तुम काम-क्रोध-लोभपरायण हुए भाँति-भाँतिके नये-नये पाप कर रहे हो और इसीलिये जीवनके अन्तिम क्षणतक तुम हजारों-लाखों नयी-नयी चिन्ताओंकी ज्वालासे जलते रहते हो। परिणामस्वरूप तुम्हें तीन चीजें हाथ लगती हैं—(१) दिन-रातकी चिन्ताज्वाला, (२) कामना-पूर्तिके लिये किये जानेवाले पापोंका संग्रह और (३) जन्म-मृत्युके चक्रमें ही डाले रखनेवाली मानव-जीवनकी असफलता।
याद रखो—तुमको मनुष्य इसलिये नहीं बनाया गया कि तुम अपनी बुद्धिका दुरुपयोग करके जन्म-मृत्युके चक्रको और भी लम्बा कर लो, अज्ञानके बन्धनको और भी सुदृढ़ कर लो, आसुरी योनियों तथा अत्यन्त पीड़ादायक नरकादिमें पचनेकी और भी निश्चित सुव्यवस्था कर लो। तुम्हें तो यह मानवशरीर मिला था—जन्म-मृत्युके चक्रसे छूटकर अपने सत्य नित्य चिदानन्दघन आत्मस्वरूपकी प्राप्ति या भगवान्की प्राप्तिके लिये, समस्त बन्धनोंको सदाके लिये काट डालनेके लिये और नित्य-निरन्तर भगवान्में ही स्थिति प्राप्त करनेके लिये।
याद रखो—अब भी समय है, अब भी चेतकर सन्मार्गपर आनेसे काम बन सकता है। अब भी मानव-जीवन सफल हो सकता है। तुम आज ही, अभी इस सत्यको समझकर इसे स्वीकार कर लो और शरीर तथा शरीरके सम्बन्धसे कहे जानेवाले नामोंमें स्वरूपकी मिथ्या कल्पना छोड़ दो एवं अपनेको नित्य-सत्य-चिद्घन आत्मा समझ लो या भगवान्की लीलामें सेवा करनेवाला एक भगवान्का अनन्य सेवक मान लो। फिर तुम्हारी जगत्के प्राणिपदार्थोंमें ममता, आसक्ति तथा उनके लिये आशा और उनमें कामना नहीं रहेगी; फिर, व्यावहारिक जगत्में सारे काम होंगे या तो स्वप्नकी तरह या भगवान्की पवित्र सेवाके रूपमें।
याद रखो—ऐसा होते ही तुम्हारी सारी चिन्ताएँ दूर हो जायँगी, पापकी कल्पना तुम्हारे चित्तके समीप भी नहीं आ सकेगी और तुम यहीं आत्मस्वरूप या भागवत-जीवनमें सुप्रतिष्ठित होकर जीवनकी परम और चरम सफलता लाभ करोगे।