जीवन भगवान्की क्रीड़ा
याद रखो—तुम्हारा सारा जीवन भगवान्की क्रीड़ा है और तुम्हारा अहंकार तथा तुम भगवान्की क्रीड़ास्थली हो। तुम्हारे सुख-दु:ख, लाभ-हानि, उत्सव-अवसाद, स्वस्थता-रुग्णता, मान-अपमान, स्तुति-निन्दा, निज-पर, प्रिय-अप्रिय, शुभ-अशुभ, जीवन-मरण—सभी भगवान्की क्रीड़ा है, उनकी लीला है। तुम जो क्रीड़ाक्षेत्र हो—अपनेको कर्ता-भोक्ता मानकर व्यर्थ ही भगवान्की लीला तथा भगवान्के प्राणी-पदार्थोंमें अहंता-ममता, कामना-आसक्ति करके अपने-आप ही अशान्ति, क्षोभ, दु:ख, पाप आदिको बुलाकर उनके अधीन हो जाते हो, इस मोहको—प्रमादको छोड़कर अपनी यथार्थ स्वरूपस्थितिको पहचानो और इन सारे अज्ञानजनित स्वरचित मिथ्या बन्धनोंको तोड़कर भगवान्को स्वतन्त्ररूपसे निर्बाध उनकी मनमानी लीला करने दो—खेल खेलने दो।
याद रखो—तुम उनके लीलाक्षेत्र ही हो, पर यदि सर्वथा अपनेको उनकी लीलाका क्षेत्र न देख सको तो कम-से-कम यही करो कि तुम्हारे जिम्मेका जो खेल है, उसे उन एकमात्र स्वामी भगवान्की प्रीतिके लिये उनके लीला-विधानके अनुसार खेलते रहो और उनकी शेष सारी लीलाओंको—सब खेलोंको चाहे वे शृंगार-रसके हों या भयानक-रसके, करुण-रसके हों या रौद्र-रसके, हास्यरसके हों या वीभत्स-रसके—किसी भी रसके कैसे भी हों, देखते रहो और उन अजब खिलाड़ी लीलामय भगवान्की लीला-चातुरीपर नित्य मुग्ध होते रहो।
याद रखो—वस्तुत: इस समस्त अनन्त विश्व-ब्रह्माण्डमें दो ही चीजें हैं—जो है वह ‘भगवान्’ है और जो हो रहा है—वह ‘भगवान्की लीला’ है। लीलामय भगवान् और भगवान्की लीलामें स्वरूपत: कोई भेद नहीं है। वस्तुत: लीला, लीला करनेवाले भगवान् और लीलाके साथी-संगी तथा उपकरणादि सब भगवान् ही हैं। भगवान् सर्वतन्त्र-स्वतन्त्र सर्वलोक-महेश्वर हैं और वे नित्य नयी लीला करते हैं तथापि उन सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान्की सारी लीलाएँ पूर्वज्ञात, पूर्वरचित, सुव्यवस्थित, निर्भ्रान्त एवं परमानन्दमयी हैं। भगवान्की इस लीलामें नित्य-निरन्तर केवल सीमारहित आनन्द-ही-आनन्द है; क्योंकि यह लीला उन अनन्त परमानन्दस्वरूप भगवान्की ही अभिव्यक्ति है। वे लीलामय ही लीलाके रूपमें प्रकट हैं।
याद रखो—भगवान्की इस लीलामें तुम्हें यदि कहीं दु:ख, पीड़ा, निराशा, विषाद, भय, शोक आदि काली-कराली छायामूर्तियाँ दीखती हैं या उनकी कल्पना होती है तो इसका अभिप्राय यही है कि तुमने अभीतक इस बातको ठीक-ठीक समझा-देखा नहीं है कि इस अनन्त विश्वमें केवल परमानन्दमय भगवान् हैं तथा उनकी आनन्दमयी लीला ही अनवरत चल रही है। सृजन और संहार दोनों उस लीलाकी ही दो दिशाएँ हैं। इस रहस्यको समझ-देख लेनेपर तो सदा सर्वथा सर्वत्र आनन्द-ही-आनन्दका अनुभव होता है।
याद रखो—भगवान् ही इन सारी लीलाओंके निमित्त उपादान-कारण हैं, वे ही करते हैं, वे ही देखते हैं और यदि कहीं भोगनेकी कल्पना हो तो अपनेमें अपनेको विविध विचित्र खिलौनोंके रूपमें, खेलके रूपमें आप ही भोगते हैं। तुम भी एक खिलौने, खेलकी भूमि या खेल ही हो। यह समझो और सदाके लिये आनन्दमय बन जाओ।