जीवनका उद्देश्य भगवान्
याद रखो—जबतक तुम्हारे जीवनका एकमात्र उद्देश्य भगवान् न होंगे, जबतक तुम भगवान्के सम्मुख होकर उनको प्राप्त करनेके साधनोंको स्वीकार न कर लोगे और जबतक तुम उन साधनोंको क्रियारूपमें परिणत न कर दोगे, तबतक तुम कभी भी, किसी भी स्थितिमें शान्ति-सुख-संतोषके दर्शन नहीं कर सकोगे।
याद रखो—अपूर्ण अनित्य और परिवर्तनशील जगत्प्रपंचके प्राणी, पदार्थ, परिस्थितिमें कभी शान्ति-सुख हैं ही नहीं; उनमें निरन्तर अपूर्णताका दु:ख, नष्ट हो जानेका दु:ख और बदल जानेका दु:ख लगा रहता है। सच्चा सुख एकमात्र नित्य निरतिशय परिपूर्णतम, अविनाशी सदा अखण्ड एकरस श्रीभगवान्में ही है। जीवनका लक्ष्य बनाकर, अतएव उन्हींको उन्हींकी प्राप्तिके साधनोंको स्वीकारकर तदनुसार जीवन बनाओ।
याद रखो—कोई भी मनुष्य किसी स्थानपर पहुँचना चाहे तो उसके लिये तीन बातें परमावश्यक हैं—जहाँ पहुँचना है, उसको याद रखे; जिस रास्तेसे वहाँ पहुँचा जा सकता है उसी रास्तेको अपनावे और उसी रास्तेपर चलता रहे। लक्ष्य-स्थान याद न रहा, तब तो कुछ भी नहीं होगा। वह जायगा ही कहाँ! लक्ष्य याद भी रहा, पर यदि विपरीत—उलटे मार्गको स्वीकार कर लिया, तब भी वहाँ नहीं पहुँच सकता एवं यदि ठीक रास्तेपर होनेपर भी चले नहीं—रुका ही रहे, तब भी पहुँचना सम्भव नहीं। अतएव लक्ष्यको भूलो मत, निरन्तर याद रखो; लक्ष्यसिद्धिके साधनोंको स्वीकार करो और उन साधनोंको अपनी शक्तिके अनुसार सावधानीसे करते रहो।
याद रखो—भगवान्की ओर मुख करके उनके मार्गपर चलना आरम्भ कर दोगे तो जितना ही आगे बढ़ोगे उतनी ही चलनेकी शक्ति बढ़ेगी, उतने ही अच्छे-अच्छे सदा सहायता तथा सेवा करनेवाले प्रिय साथी मिलेंगे, उत्तरोत्तर उत्तम सुखमय मार्ग मिलेगा, प्रकाश मिलेगा, स्वस्थता मिलेगी, दैवी-सम्पत्तिपर अधिकार होता जायगा और सहज ही सच्चे शान्ति-सुख बढ़ते रहेंगे; क्योंकि वह मार्ग ही ऐसा है, जिसपर दैवी-सम्पदासम्पन्न पुरुष ही जाते हैं और वहाँ उत्तरोत्तर अधिक-से-अधिक दैवी-सम्पत्तिका ही आदान-प्रदान चलता है।
याद रखो—भगवान्से विमुख होकर भोग-जगत्की ओर मुख करके उसके मार्गपर चलोगे तो जितना ही आगे बढ़ोगे, उतनी ही सात्त्विकी शक्तिका ह्रास होगा, उतने ही नीच नराधम, सदा सताने तथा लूटनेवाले चोर, ठग, लुटेरे, बदमाशोंका संग मिलेगा, उत्तरोत्तर दु:खमय मार्ग मिलेगा, कंकड़-पत्थर-काँटे-गड़हे मिलेंगे, अन्धकार मिलेगा। मानसिक और शारीरिक रोग मिलेंगे, आसुरी सम्पत्तिके सारे दुर्गुण, दुर्विचार, दुष्कर्म आकर तुमपर अपना एकाधिकार कर लेंगे और सहज ही तुम असीम अशान्ति, अपार दु:खके स्वरूप ही बन जाओगे; क्योंकि वह रास्ता ही ऐसा है जहाँ आसुरी सम्पत्तिका ही उत्तरोत्तर अधिक विस्तार है, वहाँ वैसे ही लोग रहते हैं और उनमें परस्पर आसुरी सम्पदाका ही आदान-प्रदान चलता है।
याद रखो—दैवी सम्पत्ति मोक्षके लिये है और आसुरी बन्धनके लिये। दैवी सम्पदावालोंके साथ सदा शान्ति, सत्कर्म तथा सुख रहते हैं। वे यहाँ सुख-शान्तिपूर्वक पुण्य कर्म करते हुए भगवान्को प्राप्त होते हैं और आसुरी सम्पदावालोंके साथ सदा अशान्ति, पाप और दु:ख रहते हैं। वे जीवनभर चिन्ताग्रस्त अशान्त जीवन बिताते हुए कुकर्ममें निरत रहते हैं और अन्तमें नरकोंको प्राप्त होते हैं। दैवी सम्पदा भगवत्प्राप्तिका मार्ग है और आसुरी सम्पदा नरकप्राप्तिका।
याद रखो—असुरोंको अपार वैभव, जागतिक प्रचुर सम्पत्ति, विस्तृत अधिकार, परम उच्च पद और लौकिक यशकीर्ति आदि पदार्थ मिल सकते हैं, पर इनसे उन्हें सच्ची शान्ति, सच्चा सुख कदापि नहीं मिल सकता; वे जीवनभर जलते ही रहते हैं और दुष्कर्मपरायण रहकर अन्तमें भीषण यन्त्रणा—ज्वालामय नरकोंमें पड़ते हैं। अतएव सच्चे सुखस्वरूप भगवान्को ही जीवनका एकमात्र साध्य बनाओ और उन्हींकी प्राप्तिके लिये सावधानी तथा एकनिष्ठाके साथ तदनुकूल साधनोंमें सदा तत्पर रहो।