ममता ही बन्धन है

याद रखो—संसारके प्राणी-पदार्थोंमें ममता ही बन्धन है और ममताका सर्वथा अभाव ही मुक्ति है। ममता न होनेका अभिप्राय है संसारमें कभी, किसी भी वस्तुमें, परिस्थितिमें, प्राणीमें जिसका मेरापन न हो। जिसके कुछ भी अपना नहीं है, जो सर्वथा अकिंचन है, वही ममता-बन्धनसे रहित मुक्त है।

याद रखो—सांसारिक प्राणी-पदार्थोंकी ममतासे मुक्त पुरुषसे भगवान् स्वयं ममत्व करते हैं। वह भगवान‍्को अत्यन्त प्रिय होता है। वही भगवत्प्रेमी भगवान‍्का सहज भजन करनेवाला है। जिनके मनमें जन्म, ऐश्वर्य, विद्या, परिवार, धन, बुद्धि, मत आदिमें ममता होती है, वे तो इनके द्वारा शरीर तथा नामके अभिमानको ही पुष्ट करते हैं। वे भजनपरायण नहीं हो सकते।

याद रखो—यथार्थरूपसे भजन करनेमें समर्थ वे ही अकिंचन पुरुष होते हैं, जिनमें किसी भी प्राणी, पदार्थ या परिस्थितिमें तनिक भी ममताका लेश नहीं रह गया है; क्योंकि भगवान् अकिंचनके सर्वस्व हैं और अकिंचनसे ही मिलते हैं। इसीलिये उनको ‘अकिंचन-गोचर’ कहा गया है।

याद रखो—ममता ही दु:खोंकी जड़ है। जिस वस्तु या प्राणीमें तुम्हारी ममता नहीं होती, उसके नष्ट हो जाने या मर जानेपर तुम जरा भी दु:खी नहीं होते, चाहे वह दूसरेकी दृष्टिमें कितनी बहुमूल्य या महान् प्रिय हो। पर जहाँ ममता है वहाँ जरा-सा भी उसका क्षय या उसके नाशकी सम्भावना ही दु:खदायी बन जाती है और यह निश्चय है कि संसारका कोई भी वस्तु या प्राणी तुम्हारा है नहीं। तुमने मिथ्या ही उनमें ममत्व कर रखा है। जब तुम मरोगे, तब कोई भी ममताका पदार्थ या प्राणी तुम्हारा नहीं रहेगा। सभीसे ममताका सम्बन्ध बलात् छूट जायगा; परंतु उस सम्बन्धके छूटते समय तुम्हें अत्यन्त दु:ख होगा।

याद रखो—यदि तुम पहलेसे ही सब प्राणी-पदार्थोंसे ममताका सम्बन्ध तोड़कर आसक्तिसे मुक्त हो जाते हो तो तुम्हारे दु:खकी सम्भावना ही नष्ट हो जाती है। फिर तुम्हें न तो मरणकालमें दु:ख होगा, न उसके बाद ही।

याद रखो—जिसकी जगत‍्में कहीं भी ममता नहीं रहती, उस अकिंचनको भगवान् अपनाकर उसके हृदयमें अपनी ममताका उदय कर देते हैं। वह भगवान‍्में ममतायुक्त होकर केवल भगवान‍्को ही अपना मानने लगता है। भगवान् नित्य सत्य सनातन सच्चिदानन्द-स्वरूप हैं, उनका कभी अभाव होता ही नहीं। अतएव भगवान‍्में ममता करनेपर भगवान‍्का नित्य सांनिध्य प्राप्त हो जाता है। भगवान‍्के सारे दिव्य गुण अपने-आप उसमें आ जाते हैं और वह सदाके लिये भगवान‍्का होकर सफल-जीवन हो जाता है।

याद रखो—सचमुच ही तुम भगवान‍्के हो। वे तुमको स्वभावसे ही सदा अपना मानते हैं; परंतु तुम अपनेको उनका नहीं मानते तथा अपनेको सदा विनाशी तथा दु:खयोनि भोगोंके दासत्वमें नियुक्त रखते हो। इसीसे भगवान् जो नित्य तुम्हारे हैं, जो एकमात्र ही तुम्हारी ममताकी वस्तु हैं, तुम उनसे वंचित हो रहे हो। तुम निश्चयरूपसे समझ लो, भगवान् तुम्हारे हैं। वही तुम्हारी ममताके यथार्थत: एकमात्र वस्तु हैं। उनपर तुम्हारा स्वभावत: ही अधिकार है और तुम सदा ही एकमात्र उनके हो, उनकी ही ममताकी वस्तु हो। तुमपर किसी भी दूसरेका कभी अधिकार नहीं है, उन्हींका सम्पूर्ण अधिकार है। जिस क्षण तुम यह समझ लोगे, उसी क्षण तुम्हारी सारी ममता उनमें हो जायगी और वे तो तुमको अपना मानते ही हैं। बस, तुम निहाल हो जाओगे।