मनुष्य कर्मयोनि

याद रखो—मनुष्य कर्मयोनि है। कर्म करना उसका स्वभाव है। अत: वह बिना कर्म किये रह ही नहीं सकता। सुव्यवस्थित शुभकर्म नहीं करेगा तो अव्यवस्थित अशुभकर्म करेगा, आलस्य तथा प्रमादयुक्त निकम्मे कर्म करेगा। जिनका परिणाम उसके लिये अत्यन्त हानिप्रद एवं दु:खजनक होगा। इसलिये उसे सदा-सर्वदा शुभकर्ममें लगे रहना चाहिये।

याद रखो—जिम्मेवारीके कर्मका भार न रहनेसे ही मनुष्य प्रमाद करता है। इसलिये तुम अपनेको जिम्मेवारीके साथ कर्ममें लगाये रखो, जिससे प्रमादकी बात सोचने-करनेके लिये अवकाश ही न मिले। ‘करनेयोग्य’ कर्मका न करना और ‘न करनेयोग्य’ कर्म करना—यही प्रमाद है। मनुष्य जब प्रमादमें फँस जाता है, तब उसका सर्वथा पतन होते देर नहीं लगती। प्रमाद मृत्युसे भी बढ़कर है, अतएव प्रमादसे सदा बचो।

याद रखो—जबतक तुम जिम्मेवारीके साथ अपना सारा समय कर्तव्य (करनेयोग्य) शुभकर्ममें नहीं लगाये रखोगे—तबतक प्रमाद होनेकी सम्भावना रहेगी ही। शुभकर्म वही है, जिससे तुम्हारा अन्त:करण पवित्र हो, मनके भाव उन्नत तथा विशुद्ध हों, परिणाममें अपना तथा दूसरोंका हित होता हो, चित्तमें शान्ति तथा सुखकी वृद्धि होती हो एवं सुव्यवस्थापूर्वक सहजभावसे सत्कर्ममें उत्साहयुक्त प्रवृत्ति बनी रहे।

याद रखो—शुभकर्ममें लगे रहनेका यह अर्थ नहीं है कि बाहरी कर्मोंमें इतना अधिक फँसा रहना पड़े, जिससे विचार करने, कर्तव्याकर्तव्य सोचने, शास्त्र तथा सत्पुरुषोंसे कर्मके लिये परामर्श करने, सदाचारकी रक्षा एवं उन्नति करने, भगवत्स्मरण तथा नियमित उपासना-आराधना करने और घरके लोगोंके साथ यथोचित व्यवहार-बर्ताव तथा उनके प्रति कर्तव्यपालन करनेके लिये ही अवकाश न मिले। ऐसा कर्मबहुल जीवन मशीनकी तरह जड़वत् बन जाता है और आखिर उसे प्रमादग्रस्त होकर पतित होना पड़ता है।

याद रखो—कर्मका अर्थ है वे सारे सुकर्म—सत्कर्म जो इन्द्रियोंके द्वारा, मन-बुद्धिके द्वारा होते हैं तथा जिनसे सर्वांगीण योगक्षेमकी प्राप्ति एवं मानव-जीवनकी सफलता प्राप्त होती है। अत: जब जहाँ जो कर्म करना आवश्यक हो, वही कर्म करना चाहिये। एक कर्ममें लगे रहना और दूसरे सब कर्तव्यकर्मोंके प्रति दायित्वहीन होकर उनकी अवहेलना करना उचित नहीं है। एकांगी कर्म सुकर्म नहीं रह पाता। हाँ, अवश्य ही मानवके प्रत्येक कर्मका लक्ष्य होना चाहिये—भगवत्प्राप्ति या भगवत्प्रेमकी प्राप्ति—जिसके लिये वह मनुष्य बना है और उसके प्रत्येक कर्ममें प्रेरक होनी चाहिये भगवत्प्राप्ति या भगवत्प्रेम प्राप्त करनेकी सदिच्छा।

याद रखो—मानव-जीवनका लक्ष्य भगवान् हैं, भोग नहीं। भोगकी उपेक्षा नहीं है, पर उसे भगवत्प्राप्तिके लिये सहायकरूपमें बनाकर स्वीकार करना है, भगवान‍्की जगह लक्ष्य बनाकर कदापि नहीं। जीवनका लक्ष्य भगवान् होगा तो कर्म स्वयं सत्कर्म बन जायँगे—दैवी सम्पत्ति जीवनका स्वभाव बन जायगी और यदि लक्ष्य भोग होगा तो सत्कर्म भी दुष्कर्म बनने लगेंगे तथा आसुरी सम्पत्ति जीवनका स्वभाव बन जायगा। दैवी सम्पत्तिका फल है सुखशान्तिपूर्वक निष्पाप जीवननिर्वाह तथा तमाम बन्धनोंसे मुक्ति और आसुरी सम्पत्तिका फल है दु:ख-अशान्ति-भय-विषादयुक्त जीवन और परिणाममें बन्धन तथा नरक-यन्त्रणाकी प्राप्ति। इसलिये भगवान‍्को ही जीवनका एकमात्र लक्ष्य बनाकर सदा सत्कर्ममें ही लगे रहो!