परम ध्येय
याद रखो—तुम संसारमें इसलिये मनुष्य बनकर नहीं आये हो कि दिन-रात शरीरके आराम तथा कल्पित नामके यशके लिये ही प्रयत्नशील रहो और मोहमें अंधे होकर ऐसे कुकर्मोंमें लगे रहो कि जिनके फलस्वरूप असंख्य जन्म-जन्मान्तरोंतक फिर कभी मनुष्य बननेका अवसर ही न आवे।
याद रखो—तुम नित्य सच्चित् स्वरूप आनन्दमय आत्मा हो, सच्चिदानन्दघन भगवान्के सनातन अंश हो। अपने इस स्वरूपको भूलकर तुम अपनेको अमुक नामवाला शरीरधारी मनुष्य मान रहे हो और इस शरीरमें तथा शरीरसम्बन्धी प्राणी-पदार्थोंमें ही राग-द्वेष करके दिन-रात भय-विषादकी भट्ठीमें जल रहे हो। जीवनभर एक क्षणके लिये भी तुम्हें कभी यथार्थ आनन्द तथा सच्ची शान्तिके दर्शन नहीं होते। अपनी इस मिथ्या कल्पना तथा भ्रमजनित बुरी स्थितिपर विचार करो और गहराईसे सोचकर अनुभव करो कि तुम यह शरीर नहीं हो, तुम यह नाम भी नहीं हो।
याद रखो—जबतक तुम इस शरीर और नामको ही अपना स्वरूप मानते रहोगे, तबतक तुम्हें कभी सुख होगा ही नहीं; क्योंकि यह शरीर तथा इसके सम्बन्धी सभी प्राणी-पदार्थ अनित्य, परिवर्तनशील, क्षणभंगुर तथा अपूर्ण हैं। इनका वियोग और विनाश होगा ही। तुम्हारा जो अनन्त, नित्य, शाश्वत स्वरूप है, वह नित्य अविनाशी, अपरिवर्तनीय और पूर्ण है। उसीमें अपनेको स्थित करो। फिर चाहे संसारमें, शरीरमें, नाममें, शरीरसे सम्बन्ध रखनेवाले प्राणी-पदार्थ तथा परिस्थितिमें कुछ भी परिवर्तन हो जाय, तुम सदा आत्मानन्द या भगवदानन्दमें ही स्थित रहोगे। तुमपर किसीका कोई भी असर नहीं होगा।
याद रखो—यहाँ न कुछ भी तुम्हारा है, न पराया है। अपना-पराया मानकर ही तुम राग-द्वेषके वश हो जाते हो। जबतक प्रारब्धवश शरीर है, तबतक व्यवहारके लिये सब चीजें तुम्हें यथायोग्य प्राप्त हैं। ये केवल व्यवहारके लिये ही हैं। तुम्हारे स्वरूपसे इनका कुछ भी, कहीं भी यथार्थमें कोई सम्बन्ध नहीं है। इन्हें व्यवहारोपयोगी मानकर ही यथायोग्य व्यवहार करो। जिसका त्याग उचित है, उसका त्याग करो एवं जिसका ग्रहण उचित है, उसका ग्रहण करो। परंतु द्वेष या राग किसीमें मत करो या यों समझो कि यह सब लीलामय भगवान्की नित्यलीला है। लीलामें परिवर्तनका और विभिन्न रसोंका, रंगोंका होना आवश्यक है। अतएव यहाँ जो कुछ भी हो रहा है, सभी भगवान्की लीलाका ही दृश्य सामने आ रहा है। उनकी लीला-भंगिमाको, नाट्य-निपुणताको देख-देखकर सदा उल्लसित होते रहो। नित्य नवीन नाट्य, नित्य नवीन अभिनय! कभी-कभी काली घटा, प्रखर प्रकाश; कभी मृत्यु, कभी जन्म; कभी हानि, कभी लाभ; कभी अयश-अकीर्ति, कभी यश-कीर्ति; कभी अपमान, कभी सम्मान; कभी अप्रिय प्रसंग, कभी प्रिय प्रसंग—ये सभी लीलाके ही विविध अंग हैं। वस्तुत: एक लीलामय भगवान्के अतिरिक्त और कुछ भी है ही नहीं।
याद रखो—जो मनुष्य प्रत्येक परिस्थितिमें लीलामय भगवान् को, भगवान्की लीलाको अथवा नित्य एकरस सच्चिदानन्दघन परमात्माको ही देखता है, वही यथार्थ देखता है। सर्वत्र समभावसे व्याप्त भगवान् या आत्माको देखनेवाले उस पुरुषकी स्थिति नित्य चिदानन्दमय-स्वरूप ही रहती है। वह जन्म-मरणके चक्रसे मुक्त हो जाता है। यही मानव-जीवनका परम ध्येय है।
याद रखो—इस परम ध्येयकी प्राप्तिके लिये ही तुम मनुष्य बनकर संसारमें आये हो। अत: संसारमें यथायोग्य व्यवहार करते हुए सदा सावधानीके साथ इस ध्येयकी प्राप्तिके प्रयत्नमें लगे रहना ही तुम्हारा परम कर्तव्य है। इससे कभी किसी अवस्थामें भी विचलित न होओ। अपने ध्येयको निश्चितरूपसे प्राप्त कर लो।