परमात्मा नित्य पूर्ण और एकरस है

याद रखो—परमात्मा अनादि अनन्त नित्य सत्य स्वत: प्रमाण है। परमात्माको सिद्ध करनेके लिये प्रमाता, प्रमेय और प्रमाणकी आवश्यकता नहीं है। वस्तुत: परमात्मासे ही प्रमेय-प्रमाणादि व्यवहारोंकी सिद्धि होती है। परमात्मा नित्य है, उसकी कभी कहीं उत्पत्ति हुई हो सो नहीं है, इसीसे उसका कभी कहीं अभाव या नाश नहीं है, वह शाश्वत है। अन्त:करणकी मलिनताके कारण ही उसका अनुभव नहीं हो रहा है। अन्त:करणके निर्मल होते ही, अविद्याका आवरण दूर होते ही अपने-आप ही उसका प्रकाश हो जाता है, वैसे ही जैसे बादलके हटते ही सूर्य प्रकाशित हो जाता है। सूर्य तो पहलेसे ही प्रकाशित है, बादलके आवरणसे दीखता नहीं है। इसी प्रकार परमात्मा पहलेसे ही होनेपर भी योगमायाके पर्देके कारण उसके दर्शन नहीं होते।

याद रखो—परमात्मा एकरस तथा पूर्ण है। उसमें कभी भी किसी परिवर्तन-परिवर्धनके लिये अवकाश नहीं है। परमात्मा अमुक स्थानमें कम है, अमुकमें अधिक है। कहीं अपूर्ण है, कहीं पूर्ण है। ऐसी कल्पना ही नहीं है। वह सर्वत्र पूर्ण है। ऐसा विलक्षण है कि उस पूर्णमेंसे पूर्ण पृथक् हो जाय तब भी पूर्ण ही शेष बच रहता है। जैसे चींटीमें आत्मा पूर्ण है, वैसे ही हाथीमें भी पूर्ण है। छोटे-बड़े शरीरोंमें आत्मा छोटा-बड़ा नहीं होता, ऐसे ही समस्त विश्वब्रह्माण्ड और उसके परे भी, सृष्टिके पूर्व, सृष्टिकाल और सृष्टिके प्रलयके पश्चात् भी परमात्मा नित्य पूर्ण ही रहता है। उसे कोई जाने या न जाने, उसकी पूर्णता सदा सर्वत्र पूर्ण ही रहती है।

याद रखो—परमात्मा किसी देश-कालसे परिच्छिन्न नहीं है; क्योंकि वह सर्वकालमें, सर्वदेशमें तथा सबके लिये स्वत:सिद्ध ही है। बल्कि समस्त काल, समस्त देश और सबकी सत्ता उसीकी सत्तापर आधारित है। परमात्माके आधार बिना किसी भी देश-कालकी प्रतीति ही नहीं हो सकती।

याद रखो—परमात्मामें या परमात्माके ज्ञानमें ज्ञाता और ज्ञेयका कोई भेद नहीं है। भेदकी प्रतीति उपाधिके कारण होती है। ज्ञानसे पृथक् ज्ञेय पदार्थकी सिद्धि नहीं हो सकती और ज्ञेयके बिना ज्ञातृत्वका व्यवहार भी नहीं बन सकता। इस प्रकार ज्ञेय और ज्ञाताको एक-दूसरेकी अपेक्षा रहती है; परंतु परमात्मा या उसका ज्ञान स्वत:सिद्ध होनेके कारण उसकी सिद्धिके लिये किसीकी अपेक्षा नहीं है।

याद रखो—परमात्माका यथार्थ स्वरूप सर्वथा अनिर्वचनीय है। ज्ञान, ज्ञाता और ज्ञेय एक ही परमात्माके उपाधिभेद द्वारा कल्पित स्वरूप हैं। वस्तुत: परमात्मा नित्य स्वरूपमय भेदरहित है।

याद रखो—यह परमात्मा सर्वदेश, सर्वकाल तथा सबमें नित्य स्वरूपगत होनेपर भी इसकी उपलब्धि या अनुभूति इसीलिये नहीं होती कि मिथ्या होनेपर भी अविद्याका एक आवरण बीचमें आ गया है। इसीसे नित्य स्वरूपकी विस्मृति हो रही है और अपनेको ‘जीव’ मानकर सत्स्वरूप तुम इस असत् शरीरके धर्मोंकी अपनेमें कल्पना करके शरीररूप बन रहे हो, अतएव अपने स्वरूप परमात्माकी प्राप्तिके लिये इस अविद्याके आवरणको हटा देनेके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं करना है। इसके लिये ‘मैं आत्मा हूँ, परमात्मा स्वरूपत: आत्मासे अभिन्न है, परमात्माके सिवा अन्य कुछ है ही नहीं, एकमात्र परमात्मा ही सर्वत्र सर्वदेशमें तथा सर्वकालमें परिपूर्ण है’—ऐसा सत्य दृढ़ निश्चय करो।