प्रभुके साथ नित्य सम्बन्ध

याद रखो—सांसारिक प्राणी-पदार्थोंसे सम्बन्ध जोड़नेमें प्रयास और समय आवश्यक है। इतनेपर भी इच्छानुसार सम्बन्ध जुड़ना निश्चित नहीं है; परंतु प्रभुके साथ सम्पर्क स्थापित करनेमें न प्रयासकी आवश्यकता है, न समयकी। तुम्हारी इच्छा होनी चाहिये। इसका कारण यही है कि प्रभुके साथ तुम्हारा नित्य सम्बन्ध है और वे सदा ही तुम्हारे साथ रहते हैं।

याद रखो—तुम्हारे अन्दर जो सत्ता, स्फूर्ति, शक्ति, चेतना है, वह सब प्रभुसे ही मिली है। प्रभु ही तुम्हारे जीवनमें पुष्टि-तुष्टि, शान्ति-कान्ति, क्षेम-प्रेम, ज्ञान-विज्ञानके रूप अभिव्यक्त हैं। तुम ऊपरकी चीजोंको देखते हो, इसीलिये सबके मूल, सबके सत्तारूप प्रभुको देख नहीं पा रहे हो। उधर तुम्हारी दृष्टि ही नहीं है, इसीसे तुम्हारे सामने सत्य छिपा है। तुम किसी भी क्षण दृष्टिको भीतर ले जाकर, अपने विचारोंके प्रवाहको प्रभुकी ओर मोड़कर उन्हें जान सकते हो। याद रखो—प्रभुको जाननेकी तुम्हारी तीव्र इच्छा होनी चाहिये। इसके लिये तुम्हारे अंदर तड़प होनी चाहिये। फिर तुम केवल उन्हें जान ही नहीं लोगे, उन्हें देख भी लोगे और उनके साथ घुल-मिल भी जाओगे। उनके दिव्य लीलाक्षेत्रमें तुम्हारा सहज प्रवेश हो जायगा।

याद रखो—वे प्रभु सदा ही तुम्हारे हैं और तुम सदा ही उनके हो। तुम्हारा यह सम्बन्ध नित्य है, अच्छेद्य है; परंतु तुम इसे भूल रहे हो। इसीसे किसी छोटे-से क्षेत्रमें और छोटी-सी नाम-रूपकी सीमामें अपनेको बाँधकर उसी क्षेत्र तथा नाम-रूपके झगड़ेमें उलझे हो और उसीके कल्पित विकास-विनाश, लाभ-हानि, सुख-दु:ख और अनुकूलता-प्रतिकूलताकी प्राप्तिमें दिन-रात विकारग्रस्त हुए छटपटा रहे हो। तुम्हारी मूर्खता ही इसमें हेतु है।

याद रखो—तुम चाहते हो—शाश्वत सुख-शान्ति। उस शाश्वत सुख-शान्तिका जो नित्य आधार है, जो अक्षय अनन्त भण्डार है, वह सदा तुम्हारे पास है, परंतु तुम उसे भुलाकर उससे दूर, बहुत दूर जाकर सुख-शान्तिका अनुसंधान कर रहे हो; तुम्हारा यह प्रयास वैसे ही सर्वथा मिथ्या और निश्चित असफल है, जैसे संतप्त बालूमेंसे तेल निकालना। तथापि तुम इतने मोहग्रस्त हो रहे हो कि दिन-रात बालूके पेरनेमें ही लगे अपने जीवनको दु:खमय बनाते हुए बरबाद कर रहे हो। स्नेह-सुधासागर तुम्हारे अंदर ही लहरा रहा है, पर तुम्हारी मूर्खतासे वहाँ तुम्हें सूखा प्रतीत हो रहा है और तुम भटकते भीषण विषय-विष-ज्वालासे दग्ध हुए जा रहे हो।

याद रखो—तुम तनिक गहराईमें जाकर प्रभुकी ओर देखो, अपनेको उनकी ओर मोड़नेकी इच्छा करो। फिर तो उनकी सहज कृपा तुमपर बरस पड़ेगी, तुम सहज ही शीतल, शान्त, स्वच्छ, निर्मल, शाश्वत, शक्तिसमन्वित, परम मधुर और सुन्दर जीवनसे सम्पन्न हो जाओगे। तुम्हारे सभी संताप सदाके लिये नष्ट हो जायँगे; परंतु जबतक तुम उनकी ओरसे मुख मोड़े रहोगे, तबतक जलते ही रहोगे। न कोई प्राणी तुम्हें शान्ति दे सकेगा, न कोई पदार्थ या परिस्थिति ही।

याद रखो—ज्यों-ज्यों तुम संसारके इन अनुकूल प्रभु-विमुख प्राणी-पदार्थ-परिस्थितियोंकी खोजमें आगे बढ़ोगे और ज्यों-ज्यों तुम्हें इनकी प्राप्ति होगी, त्यों-ही-त्यों तुम्हारी अशान्ति, तुम्हारी जलन, तुम्हारा संताप बढ़ता ही चला जायगा। यों ही न मिलनेकी हालतमें भी तुम अशान्ति, जलन और संतापसे ही पीड़ित रहोगे। इन प्राणी-पदार्थ-परिस्थितियोंकी आस्था, आशा, आकांक्षा छोड़कर प्रभुकी ओर देखो। फिर सारी प्रभु-इच्छित अनुकूलता अपने-आप ही आकर तुम्हारे चरण चूमेगी और तुम्हारे संतापका और उसके कारणोंका सदाके लिये सर्वनाश हो जायगा।