प्रेम त्यागमूलक है

याद रखो—बन्धन करनेवाली है ममता, प्रेम नहीं। बन्धन करनेवाला है भोग, त्याग नहीं। अत: ममता कहीं मत करो, किसी भी प्राणी-पदार्थ-परिस्थितिमें ‘मेरापन’ मत रखो। भोगवासनाको लेकर किसी भी प्राणी-पदार्थ-परिस्थितिसे सम्पर्क मत रखो, सम्बन्ध मत जोड़ो। परंतु प्रेम करो सबके साथ, त्याग करो सबके लिये उनके सुखार्थ, उनके हितार्थ और उनके अधिकार-रक्षणार्थ। वस्तुत: प्रेम है ही त्यागमूलक, भोगमूलक कदापि नहीं।

याद रखो—तुम कहते हो ‘अमुक मुझसे प्रेम नहीं करता—अर्थात् मेरे हित-सुखके लिये वह त्याग नहीं करता’ पर तुम अपनी ओर देखो—तुम सचमुच उससे प्रेम करते हो क्या? तुम सचमुच उसके सुख-हितके लिये त्याग करते हो क्या? यदि नहीं करते तो उससे कैसे चाहते हो और क्यों उसपर दोषारोपण करते हो? तुम प्रेम करो, अपनी ओरसे उसके हित सुखके लिये त्याग करो। फिर देखोगे, वह तुमसे कितना प्रेम करता है।

याद रखो—सर्वत्र भगवान् भरे हैं—सब कुछ भगवान‍्से परिपूर्ण है। अत: सभी तुम्हारे पूज्य हैं, सभी आदरणीय हैं, सभी सेव्य हैं और सभी अपने हैं। तुम यदि सदा ‘सबके रूपमें भगवान् हैं’ यह विश्वास करोगे और यदि तुम्हारा विश्वास और दृढ़ हो जायगा तो तुम्हें सबमें निश्चय ही भगवान् दीखने लगेंगे। तुम ऐसा करके देखो। परंतु जबतक ऐसा न हो, तबतक आप्तवाक्योंपर विश्वास करके सबमें भगवान‍्की भावना करो और सबके साथ नम्रता, विनय तथा सम्मानयुक्त व्यवहार करो; सबको सुख पहुँचानेका मनोरथ और प्रयास करो। बड़ी सावधानीसे यह ध्यान रखो—तुम्हारे द्वारा जान-बूझकर किसीका भी जरा-सा भी अहित न हो जाय, किसीके भी हित और न्याय अधिकारपर तुम्हारे द्वारा जरा-सा भी आघात न पहुँच जाय।

याद रखो—भगवान् तो सभीमें हैं, सर्वदा हैं और सर्वत्र हैं। परंतु जहाँ-जहाँ दैन्य, दु:ख, अभाव, पीड़ा, व्याधि, मार्गच्युति, भय, विषाद और असहायावस्था है, वहाँ-वहाँ मानो भगवान् उस-उस रूपमें तथा उस-उस परिस्थितिमें तुम्हें दी हुई अपनी ही वस्तुओंके द्वारा तुमसे यथायोग्य अपनी सेवा चाह रहे हैं। तुमसे अपनी ही वह वस्तु अपने ही लिये—तुम्हें दाता एवं दयालुपनका गौरवदान देते हुए, माँग रहे हैं। अतएव इस अवस्थामें मुक्तहस्त होकर उनकी यथायोग्य सेवा करो और भगवान‍्का स्नेहपूर्ण आशीर्वाद प्राप्त करो।

याद रखो—तुम्हारे पास जो कुछ है, सब भगवान‍्का है और वह भी है भगवान‍्की सेवा-पूजाके लिये ही! तुम्हारा अधिकार तो केवल भगवान‍्के भोग लगानेके बाद बचा हुआ प्रसाद पानेका ही है और वास्तवमें यही परम सौभाग्य है। उनकी वस्तुको सदा उन्हींकी मानते हुए उसके द्वारा उनकी सेवा करो और बचा हुआ पुण्यमय, अमृतमय प्रसाद पाकर कृतार्थ होते रहो। उस वस्तुके सम्बन्धमें तो तुम्हारे दो ही कर्तव्य हैं—उसका संरक्षण-संवर्धन करो और सदा-सर्वदा प्रसन्नहृदयसे उसे उनकी सेवामें लगा-लगाकर परमानन्द लाभ करते रहो।

याद रखो—यह आवश्यक नहीं है कि उनकी सेवा अमुक वस्तुसे ही हो सकती है। तुम्हारे पास जो कुछ भी मन, तन, बुद्धि, धन, विद्या, शक्ति आदि है उसीके द्वारा उनकी सेवा करो। वे जिस-जिस रूपमें जो-जो चाहते हैं, उस-उस चाहके अनुरूप तुम्हारे पास जो-जो वस्तुएँ हैं, केवल उन्हींके द्वारा उनकी सेवा करो। पर असल बात तो यह है कि उन वस्तुओंको मानो उन्हींकी और उनका सदुपयोग करो उनकी सेवामें ही। यही तुम्हारे सारे बन्धनोंको तुरंत काटनेवाला और भगवान‍्को तुम्हारे साथ नित्य बँधे रहनेके लिये बाध्य करनेवाला ‘प्रेम’ है।