सब ब्रह्मरूप है

याद रखो—मैं-तुम, यह-वह, सृष्टि-संहार आदि रूपसे जो दृश्यप्रपंच दिखायी दे रहा है, वह एकमात्र अद्वितीय नित्य निर्मल शान्त चिन्मय ब्रह्मकी ही अभिव्यक्ति है। इन समस्त सत्-रूपसे दीखनेवाले असत् पदार्थोंमें एकमात्र सत् परमात्मा ही प्रकट है। वह सच्चिदानन्दघन ब्रह्म ही यह सम्पूर्ण जगत् है। उसके अतिरिक्त जगत् नामकी कोई सत् वस्तु कभी न थी, न है।

याद रखो—आकाशकी शून्यता आकाश ही है, जलकी द्रवता जल ही है, प्रकाशकी आभा प्रकाश ही है, वायुका स्पन्दन वायु ही है, समुद्रकी तरंगें समुद्र ही है, बर्फकी शीतलता बर्फ ही है, काजलकी कालिमा काजल ही है—ठीक वैसे ही ब्रह्ममें दीखनेवाला यह समस्त जगत् भी ब्रह्म ही है।

याद रखो—जैसे स्वप्नमें दीखनेवाले दृश्य, बालकको दीखनेवाला बैताल, रज्जुमें दीखनेवाला सर्प, स्वर्णमें दीखनेवाले कड़े-बाजूबंद, प्रशान्त महासागरमें उठनेवाली तरंगें और आवर्त, मिट्टीमें दीखनेवाले घड़े-सिकोरे और आकाशमें दीखनेवाले नगर-घर आदि सब उपाधिमात्र हैं, भ्रममात्र हैं, वैसे ब्रह्ममें दीखनेवाला यह सम्पूर्ण जगत् भ्रममात्र है। वस्तुत: उसकी कोई भिन्न सत्ता है ही नहीं।

याद रखो—यह समस्त जगत् वस्तुत: भ्रान्तिसे ही जगत्-रूप दीखता है। यथार्थ तत्त्वका ज्ञान होनेपर यह जगद‍्भ्रम वैसे ही नष्ट हो जाता है जैसे रस्सीका ज्ञान होनेपर सर्पकी भ्रान्ति नष्ट हो जाती है अथवा आकार तथा नामकी व्यावहारिक विभिन्नता प्रतीत होते हुए भी जैसे स्वर्णका ज्ञान होनेपर स्वर्णभूषणोंके नाम-रूपके कारण होनेवाली विभिन्नता तथा भिन्नरूपता नष्ट हो जाती है—एकमात्र स्वर्ण ही दीखने लगता है, वैसे ही ब्रह्मका ज्ञान होनेपर विभिन्न नामरूपात्मक यह विशाल विश्व ब्रह्मरूप ही दीखने लगता है, कहीं भी कोई भिन्न सत्ता रहती ही नहीं। वास्तवमें तो सच्चिदानन्दघन परमात्माके अतिरिक्त और कुछ है ही नहीं।

याद रखो—यह समस्त दृश्य जगत् तथा इसमें होनेवाली सभी क्रियाएँ चिदानन्दघन ब्रह्मका ही संकल्प है। वह संकल्प भी ब्रह्म ही है। ब्रह्म जगत‍्का कारण नहीं है; क्योंकि जगत्-रूपी कार्य सर्वथा असत् ही है। नित्य सत्य ब्रह्मसे अनित्य असत् जगत‍्की उत्पत्ति, नित्य निरतिशय दिव्य परमानन्दघन परमात्मासे दु:खपूर्ण जगत‍्की उत्पत्ति, प्रकाशमय परब्रह्मसे तमोमय जगत‍्की उत्पत्ति सम्भव ही नहीं। अतएव ब्रह्म तथा जगत‍्में कारण-कार्यभाव नहीं है, ब्रह्म ही जगत्-रूपमें भासित हो रहा है। उस चिदाकाशमें ही चिदाकाशसे यह सब खेल हो रहे हैं। उसके अतिरिक्त अन्य कुछ है ही नहीं।

याद रखो—जब एक ब्रह्मके अतिरिक्त कोई सत्ता ही नहीं रह जाती, तब भिन्न अहंकार कहाँ रहेगा और अहंकारका अभाव होते ही राग-द्वेष, ममता-मोह, मेरा-तेरा आदि सब मिथ्या विकार मिट जाते हैं, जैसे स्वप्नसे जागते ही स्वप्नका सारा संसार सर्वथा मिट जाता है। फिर जगत‍्में रहता हुआ भी इस ज्ञानको प्राप्त जीवन्मुक्त पुरुष नित्य-निरन्तर ब्रह्ममें ही स्थित रहता है। वह जगत‍्के आदि, मध्य, अन्त सभी अवस्थाओंमें समचित्त रहता है; क्योंकि तब उसका चित्त ही नहीं रह जाता। अतएव वह न तो प्राप्त हुई प्रिय कहलानेवाली वस्तुका अभिनन्दन करता है, न अप्रियसे द्वेष करता है, न नष्ट हुई प्रिय वस्तुके लिये शोक करता है और न अप्राप्त वस्तुकी इच्छा ही करता है।

याद रखो—ऐसा परमतत्त्वको प्राप्त—परमात्मामें अभिन्नभावसे स्थित पुरुष जगत‍्की क्षणभंगुर अवस्थाको अपनी प्रशान्त ब्राह्मी स्थितिके अन्दर हँसता हुआ देखता है। उसके लिये न कुछ पाना शेष रह जाता है, न कुछ करना रह जाता है। वह सर्वव्यापी परब्रह्म परमात्मस्वरूप ही बन जाता है। यही योगवासिष्ठकी शिक्षा है।