सब कुछ भगवान‍्का

याद रखो—तुम्हारे पास जो कुछ है, सब भगवान‍्का है और भगवान‍्की सेवाके लिये ही है। उसे अपना मानकर उसका केवल अपने भोगमें उपयोग करना बेईमानी है। इस बेईमानीसे बचो और समस्त प्राप्त साधनोंको भगवान‍्की सेवामें लगाओ।

याद रखो—सबमें भगवान् हैं। समस्त जीवोंके रूपमें भगवान् ही अभिव्यक्त हैं। अतएव उनके जिस किसी रूपको जब भी जिस वस्तुकी आवश्यकता हो और वह यदि तुम्हारे पास हो तो ‘भगवान‍्की वस्तु भगवान‍्के अर्पण कर रहे हो’—इस भावसे बिना अभिमानके नम्रतापूर्वक उसे समर्पण कर दो।

याद रखो—सच्ची सेवा करनेवाला जगत‍्में सदा-सर्वत्र सबमें भगवान‍्के दर्शन करता है। सेवा करना उसका स्वभाव ही है। वह ऊँच-नीच, अपना-पराया, मित्र-शत्रु नहीं देखता। उसे जब सेवाका अवसर मिलता है, तब वह अपना सौभाग्य समझता है।

याद रखो—सेवाका न विज्ञापन होता है, न दूकान खुलती है। सेवा सेवकका सहज स्वभाव होता है। सेवाका अभिप्राय है, अपने पास जो कुछ भी साधन-सामग्री, तन-धन, विद्या-बुद्धि आदि हैं और जो कुछ भी शक्ति है, वह सब सेवाके लिये है और सेवामें ही विनयपूर्वक किसी प्रकारकी कामना न रखते हुए उनका उपयोग करना।

याद रखो—सेवकमें सात बातें होनी चाहिये—(१) सेवामें विश्वास, (२) सेवाकी पवित्रता, (३) सेवामें निष्कामभाव, (४) सेवामें आत्मसंयम, (५) सेवामें उत्साह, (६) सेवामें प्रीति और (७) विनयभाव।

याद रखो—पापमें सहायता-सहयोग देना सेवा नहीं है। दूसरोंको सतानेवाले, खूनी, डकैत, व्यभिचारी, पराया स्वत्व हरण करनेवाले—ऐसे लोगोंकी उनके इन कामोंमें सहायता करना सेवा नहीं है। इन कामोंसे तो कर्ताका बड़ा अनिष्ट होता है और किसीके अनिष्ट-साधनमें सहायता करना सेवा नहीं, वह तो पापका समर्थन है।

याद रखो—सेवकमें त्याग तथा विनयका होना परमावश्यक है। बिना त्याग सेवा नहीं होती और विनय हुए बिना अभिमान उत्पन्न होता है। वह जिसकी सेवा करता है, उसको नीचा और अपनेको ऊँचा मानने लगता है। त्याग और निरभिमानता हुए बिना बदला चाहना, कृतज्ञताकी आकांक्षा करना, कृतज्ञ न होने या बदला न चुकानेपर नाराज होकर उसे कृतघ्न मानना, उससे द्वेष करना आदि दोष उत्पन्न होकर सेवाके पवित्र स्वरूपको ही नष्ट कर देते हैं।

याद रखो—सेवक जिसकी सेवा करता है, न तो उसके पूर्व-इतिहासको देखता है, न भविष्यमें उसका कैसा बर्ताव होगा, यह देखता है। वह तो उसकी वर्तमान निर्दोष आवश्यकताको देखता है और सीधे-सादे तौरपर अपने साधन तथा शक्तिके अनुसार उसकी सेवा करता है।

याद रखो—सच्चे सेवककी ममता सेवामें रहती है, उसकी कामना सेवाकी शक्ति बढ़नेकी होती है, उसका अहंकार विनम्रतामें परिणत हो जाता है और वह सेव्यको भगवान‍्के रूपमें और अपनेको नित्य सेवकके रूपमें देखता है।

याद रखो—सेवक न मान-बड़ाई चाहता है, न दूसरोंपर हुकूमत करना चाहता है, न वह किसीको अपना-पराया मानकर राग-द्वेष रखता है, न किसीको अज्ञानी-मूर्ख मानता है या अपनेसे नीचा मानता है, न किसीकी निन्दा-चुगली करता है और न कभी किसीसे अपने लिये आराम, अच्छे भोजन या सेवाकी ही आकांक्षा करता है।

याद रखो—सच्चे सेवकमें प्राणी-मात्रकी सेवाकी भावना सहज रहती है। वह दयालु, निर्मल मन, धैर्यशील, चतुर, उद्यमी, श्रद्धालु, नित्य सत्कर्मपरायण, चरित्रवान्, संयतेन्द्रिय, अत्यन्त विनम्र तथा दूसरोंके हितके लिये ही जीवन धारण करनेवाला होता है। वह यथासाध्य सेवाको गुप्त रखना चाहता है। सेवा ही उसके जीवनका स्वरूप होता है।

याद रखो—सेवा निष्काम तथा विनम्र चित्तमें प्रकट भगवान‍्का विशुद्ध तथा मधुर प्रसाद है। वह कोई लेन-देनका व्यापार नहीं है और न अभिमान उत्पन्न करके दूसरोंको नीचा दिखानेवाला सदोष प्रयत्न है।

सो अनन्य जाके असि मति न टरइ हनुमंत।

मैं सेवक सचराचर रूप स्वामि भगवंत॥