सबमें निर्दोष भगवान् विराजित

याद रखो—सबके अंदर समरूपसे सर्वथा निर्दोष भगवान् विराजमान हैं। जितने भी दोष हैं, सब बाहरी हैं; स्वरूपगत नहीं हैं। तुम दोष देखोगे तो तुम्हें दोष दिखायी देंगे और भगवान‍्को देखोगे तो भगवान्। व्यवहार बाहरी स्वरूपके अनुसार करनेमें आपत्ति नहीं है, पर वह करो केवल व्यवहारके लिये ही और मन-बुद्धिमें निश्चय रखो कि इस रूपमें स्वयं भगवान् ही अभिव्यक्त हैं।

याद रखो—यदि किसीमें कोई दोष दिखायी देते भी हैं तो वे दोष वस्तुत: हैं ही, ऐसी निश्चित बात नहीं है। सम्भव है तुम्हारी द्वेषदृष्टि ही उसमें दोषकी कल्पना करती हो और यदि दोष हैं भी तो यह भी मत मानो कि वे दोष सदा बने ही रहेंगे। आयी हुई चीज चली भी जायगी ही।

याद रखो—यदि तुम किसीमें केवल दोष ही देखते हो और तुमने यह निश्चय कर रखा है कि ये दोष तो इनमें सदा रहेंगे ही, तो तुम अपना और उसका दोनोंका अहित कर रहे हो; उसमें दोषका आरोप करके तुम अपनी दृढ़ भावनासे उन्हें यथार्थ दोष बनानेमें सहायता करते हो, अपने दृढ़ निश्चयसे उसमें दोषोंके सदा बने रहनेमें सहायता करते हो और दोष दीखनेके कारण सदा उसके प्रति द्वेषबुद्धि रखकर स्वयं जलते और उसे जलाते रहते हो। तुम्हारी द्वेषबुद्धि उसके मनमें भी तुम्हारे प्रति द्वेष पैदा कर देती है। इस प्रकार तुम द्वेषका एक बड़ा दुरूह जाल बना लेते हो और उसमें फँसकर सदा दु:खी रहते हो या एक विशाल विषवृक्ष लगाकर उससे जर्जरित होते रहते हो।

याद रखो—यदि तुम किसीमें दोष न देखकर या गुण देखकर उससे प्रेम करते हो, सदा अपनी मधुर सुधामयी सद्भावना देते हो तो अपना और उसका दोनोंका सहज ही हित करते हो। तुम्हारी प्रेमभरी गुणदृष्टि उसमें गुणोंका निर्माण करती है, उन्हें बढ़ाती है और स्थायी बनाकर उसके जीवनको मधुर सुधापूर्ण सद‍्गुणमय बनानेमें सहायता करती है। यों जब तुम उसका हितसाधन करते हो तो स्वाभाविक ही उसके द्वारा तुम्हारा हितचिन्तन और हितसाधन होता है। यह निश्चय मानो कि तुम दूसरेको जो दोगे, वही अनन्तगुना होकर तुम्हारे पास लौट आयेगा। द्वेष दोगे तो द्वेष, दु:ख दोगे तो दु:ख, प्रेम दोगे तो प्रेम और सुख दोगे तो सुख!

याद रखो—तुम्हारा वास्तवमें कोई शत्रु नहीं है, तुम्हारे मनमें रहनेवाला शत्रुभाव ही शत्रु है। तुम्हारे प्रति यदि कोई सचमुच ही शत्रुता करता हो, यद्यपि बहुत बार तो यदि कोई शत्रुता करता दीखता है, तो वह तुम्हारी अपने मनमें रही शत्रुभावनासे ही दीखता है। यह निश्चित नहीं है कि वह शत्रुता करता ही हो। परंतु तुम स्वयं उसे अपनी ही भूलसे शत्रु मानकर उसमें शत्रुताके अंकुर उत्पन्न करके उसे शत्रु बना लेते हो और ठीक इसके विपरीत सचमुच शत्रुता करनेवाले शत्रुको भी तुम अपनी प्रेमभरी मैत्रीभावनासे प्रेम-दान करके—सहज ही उसको सुख प्रदान तथा उसका निरहंकार गुप्त हित-साधन करके मित्र बना सकते हो। तुम अपना हित चाहते हो, सुख चाहते हो, अपने लिये अमृत चाहते हो तो बस, सभीका सदा प्रेमपूर्वक हित करते रहो, सभीको सदा प्रेमपूर्वक सुख देते रहो और सभीको सदा अमृत वितरण करते रहो।

याद रखो—तुम्हारा किसीके सम्बन्धमें भी अशुभ निश्चय—अशुभके निर्माणके हेतु तथा सहायक बनकर तुम्हारा और उसका दोनोंका निश्चय ही अहित करेगा और शुभ निश्चय दोनोंका हित करेगा। अतएव सबमें परम मंगलमय, परम शुभस्वरूप भगवान‍्को देखो, सबके अंदर सदा विराजित भगवान‍्को जगाओ, उन्हें पूजो और उनका प्रकाश-विकास करके उसको तथा अपनेको धन्य कर दो और ऐसा करके स्वयं भी परम धन्य हो जाओ।