सच्चा अर्थ
याद रखो—सच्चा अर्थ वही है, जो परमार्थका साधक हो, जो मानव-जीवनकी चरम तथा परम सफलतारूप भगवत्प्राप्तिका साधन हो। इसके विपरीत जो संसारमें—संसारके भोगोंमें लगनेवाला है, वह अर्थ ‘व्यर्थ’ है तथा पापोत्पादक अर्थ तो वास्तवमें ‘अनर्थ’ रूप ही है।
याद रखो—जिस अर्थका उपार्जन भगवान्के अनुकूल पवित्र साधनोंसे एवं जिसका उपयोग भगवत्सेवामें नहीं होता, वह ‘व्यर्थ’ एवं ‘अनर्थ’ रूप ही होता है। इसीसे यह ‘अर्थ’ नामधारी ‘अनर्थ’ कहा गया है।
याद रखो—स्वभावसे ही ‘अर्थ’ पंद्रह अनर्थोंको पैदा करनेवाला होता है—१. चोरी, २. हिंसा, ३. झूठ, ४. दम्भ, ५. मद, ६. काम, ७. क्रोध, ८. अभिमान, ९. भेद, १०. वैर, ११. स्पर्धा, १२. लम्पटता, १३. अविश्वास, १४. जूआ और १५. मद्यपान। इस ‘अर्थ’ नामक अनर्थकी प्राप्तिके साधन, इसकी प्राप्ति, इसकी वृद्धि, इसकी रक्षा, इसके व्यय और इसके नाश—सभीमें अत्यन्त प्रयास, त्रास, चिन्ता, भ्रम तथा शोकका नित्य निवास रहता है।
याद रखो—इस अर्थका मोह माता-पिता, भाई, सुहृद्, मित्र (जिनका जीवन सदा स्नेहसे सना रहना चाहिये) आदिमें भेद तथा वैर उत्पन्न करके परस्पर शत्रुता उत्पन्न करनेवाला होता है। सदाके स्वजन समस्त सौहार्द, आत्मीयता, स्नेहको भूलकर क्षुब्ध, क्रोधित होकर परस्पर शत्रु बन जाते हैं और एक-दूसरेका जीवन नाश करनेमें तत्पर हो जाते हैं।
याद रखो—अर्थके लोभसे मनुष्य परस्पर लड़ाई-झगड़े करते, मुकदमे लड़ते, जीवनकी समस्त शान्तिको खोकर सदा घोर अशान्ति भोगते हुए ही मनुष्य-जीवनको अनर्थोत्पादक सिद्ध करके नष्ट हो जाते हैं।
याद रखो—अर्थकी कामनासे ही अंधे होकर मनुष्य खाद्य पदार्थोंमें, औषधोंमें तथा जीवनोपयोगी वस्तुओंमें अन्य वस्तु मिलाकर, नकली वस्तुओंको उन वस्तुओंका नाम देकर निर्दोष मनुष्योंके प्राणहरणका पाप मोल लेते हैं और अपने लिये नरकका मार्ग प्रशस्त करते हैं।
याद रखो—यहाँकी अर्थसम्पत्तिके एक कणका भी मृत्युके बाद साथ नहीं होता। जीवनभर व्यर्थ ही अर्थ-चिन्ताकी आगमें जलकर मनुष्य अनर्थमय बन जाता है। अतएव अर्थका लोभ छोड़कर प्राप्त अर्थको परमार्थ-प्राप्तिमें सहायक बनाकर विविध भाँतिसे भगवान्की सेवामें लगाओ और यदि अर्थ प्राप्त नहीं है तो भगवान्की कृपाका प्रत्यक्ष अनुभव करके, जैसे निर्वाह होता है उसीमें संतुष्ट होकर जीवनको भगवत्सेवामें लगाओ।
याद रखो—तुम्हारे पास यदि प्रचुर अर्थ है और यदि तुम उसे अपनी सम्पत्ति मानकर भगवान्की सेवामें—जहाँ आवश्यक है, वहाँ नहीं लगाते, तो तुम चोर हो, तुम्हारी इस बेईमानीका दुष्परिणाम तुम्हें भोगना पड़ेगा।
याद रखो—अर्थकी लोलुपतासे या अधिक आवश्यकताकी कल्पनासे तुम दूसरोंका स्वत्व छीनकर, पराया हक मारकर, गरीबों तथा असमर्थोंको सताकर अर्थोपार्जन या अर्थसंग्रह करते हो तो तुम महापाप करते हो। ऐसा अर्थ सर्वथा अनर्थरूप है; वह यहाँ भी तुम्हें जलाता रहेगा, चाहे कुछ दिन अभिमानके मदमें इसका अनुभव न कर सको और परलोकमें तो तुम्हें इसका बड़ा ही भीषण परिणाम भोगना पड़ेगा। अतएव अर्थके लोभमें न पड़कर प्राप्त अर्थका सदुपयोग करो। अप्राप्तकी अन्यायपूर्वक प्राप्तिके साधनसे सदा दूर रहो।