साधनमें शीघ्रताकी आवश्यकता

याद रखो—जिसको जल्दी यात्रा पूरी करके अपने घर पहुँचना है, जिसको पल-पलमें घरकी याद आती है और घरके लिये जिसकी व्याकुलता बढ़ रही है, वह रास्तेके विलम्बको कैसे सहन करेगा? वह न तो रास्तेमें किसीमें ममता करके किसीके मोहमें फँसेगा, न किसीसे जरा भी लड़-झगड़कर अपने समयको खोयेगा तथा अपने मार्गमें रुकावट पैदा करेगा और न कहीं इधर-उधर भटकेगा और अटकेगा ही। वह सबसे मेल रखता हुआ अपने लक्ष्यपर ध्यान रखते हुए सीधा अपनी राहपर चलता रहेगा। इसी प्रकार यदि तुम्हें जीवनके चरम तथा परमलक्ष्य श्रीभगवान‍्के धाम पहुँचना है, भगवान‍्को प्राप्त करना है तो इस बातको कभी न भूलकर सावधानी तथा शीघ्रताके साथ आगे बढ़ते चले जाओ।

याद रखो—तुम यहाँ जिस घरको अपना घर कहते हो, वह तुम्हारा घर नहीं है, रेलके डिब्बेके समान यात्रामें बैठनेका स्थान है या किसी समय रास्तेमें विश्रामके लिये किसी धर्मशाला या वेटिंग रूममें ठहरते हो, वैसे ही कुछ समयके लिये ठहरनेका स्थान है। तुम्हारा यह शरीर यात्रा-शरीर है और तुम्हारा जीवन-यापन तथा तुम्हारी सारी क्रियाएँ चलना है। यदि तुम अपने लक्ष्यको—भगवान‍्को कभी न भूलते हुए सदा निर्लेप तथा सावधान रहकर भगवान‍्की ओर चलते रहोगे तो यह मानव-शरीर तुम्हें निश्चय ही वहाँ पहुँचानेमें समर्थ होगा; पर यदि तुमने यात्राको स्थायी निवास मान लिया, रास्तेमें बैठने या ठहरनेके स्थानरूप इस घरको अपना घर मान लिया, किसीमें ममता जोड़ ली और किसीसे द्वेष कर लिया और यदि इन्द्रियोंके भोगोंमें अटककर इधर-उधर भटक गये तो तुम्हारी यह यात्रा सफल तो होगी ही नहीं, तुम्हारे मानव-जीवनका उद्देश्य तो पूरा होगा ही नहीं, बल्कि उलटे मार्गपर चलकर तुम भगवान‍्से और भी दूर पहुँच जाओगे।

याद रखो—यदि ममतावश तुम कहीं किसी प्राणी-पदार्थमें मोहित हो गये, भोगोंमें आसक्त हो गये तो बुरी तरह फँस जाओगे, फिर निकलना अत्यन्त कठिन हो जायगा और यदि कहीं द्वेष करके लड़-झगड़ बैठे तो वैसे ही नयी विपत्तिसे घिर जाओगे, जैसे रेलके डिब्बेमें या राहमें कहीं किसीसे लड़ाई-झगड़ा हो जानेपर फौजदारीमें मुकदमा चल जाता है, रुपये खर्च होते हैं और जेलकी सजा भुगतनी पड़ती है। यात्रा ही नहीं रुकती, उलटी विपत्तियाँ झेलनी पड़ती हैं, वैसा ही मानव-जीवनकी इस यात्रामें भी हो सकता है। अतएव न कहीं ममतामें बँधकर राग करो, न द्वेष करो, न किसीमें मोह करो, न किसीसे लड़ो-झगड़ो। जैसे बुद्धिमान् यात्री रास्तेमें सबसे प्रेमका सम्बन्ध रखता हुआ अपनी यात्रा सुखपूर्वक पूरी करता है, इसी प्रकार तुम भी अपनी इस महायात्राको सावधानीके साथ पूर्ण करो।

याद रखो—मानव-शरीर जहाँ प्रयत्न करनेपर भगवत्प्राप्तिका, मोक्षका परम साधन है, वहाँ वही कर्म-शरीर होनेके कारण विपरीत कर्म करनेपर बड़े भारी बन्धनका और नरकयन्त्रणाका कारण बन सकता है। दूसरे शरीरोंमें यह बात नहीं है; पर यहाँ तो यदि सफलताकी ओर नहीं अग्रसर हुए तो घोर विफलता प्राप्त होगी और अनेकों जन्म-मरणके नये चक्रमें फँस जाना पड़ेगा।

याद रखो—तुम संसारमें मानव-जीवनमें आये ही हो—भगवत्प्राप्तिके लिये, भोगके लिये नहीं। भोग तो अनेक योनियोंमें प्राप्त होते रहते हैं। पशु-पक्षियोंकी योनिमें और देव-राक्षसादिकी योनिमें बहुत अधिक प्राप्त होते हैं। भगवत्प्राप्तिका साधन तो इसी एक मानव-शरीरमें ही सुलभ है। अतएव यदि तुम इस परम उद्देश्यकी सिद्धिके लिये अपने जीवनको इस कल्याणमय साधनमें न लगा देते हो तो तुम्हारी मूर्खताकी सीमा नहीं है। तुम जान-बूझकर हाथमें आये हुए स्वर्ण-अवसरको ही नहीं खो देते हो—वरन् महान् हानिके पात्र बनते हो। अतएव सावधानीसे बिना अटके-भटके भगवान‍्की ओर बढ़ते रहो।