संसार रंगमंच
याद रखो—संसारमें इस शरीरसे तथा शरीरके सम्बन्धी प्राणी-पदार्थमात्रसे तुम्हारा वैसा ही सम्बन्ध है, जैसा रंगमंचपर अभिनय करनेवाले अभिनेताका अपने स्वाँगसे, नामसे और वहाँके अन्यान्य नाम-रूपधारी अभिनेताओं तथा वहाँके कार्योंसे होता है।
याद रखो—जैसे वह अभिनेता उस रंगमंचपर अपनेको वही बताता है जो स्वाँग धारण किये है; वहाँ किसीको पिता, किसीको माता, किसीको पुत्र, किसीको मित्र, किसीको अपना, किसीको पराया बताकर व्यवहार करता है। वहाँ उसको राज्य भी मिल सकता है, पुत्र भी मर सकता है, वह रोता-हँसता भी है। वह अपने स्वाँगके अनुसार सभी रसोंका प्राकट्य करता है; पर वह कभी किसी कालमें भी वहाँकी किसी वस्तुको, किसी प्राणी-पदार्थको, किसी क्रियाको तथा अपने नाम-रूपको भी वास्तवमें सत्य नहीं मानता। वह जानता है, मैं इस पोशाक तथा नामको ग्रहण करके, ऐसे ही अन्यान्य खेल करनेवाले अभिनेताओंके साथ खेल करता हूँ। वैसे ही तुम भी एक अभिनेता हो; तुम्हारे ये नाम-रूप केवल खेलनेको मिले हैं, ये तुम्हारे वास्तविक स्वरूप नहीं हैं।
याद रखो—रंगमंचपर मिले हुए सुख-दु:ख, लाभ-हानि, मान-अपमान, धनप्राप्ति-धननाश, पुत्रप्राप्ति-पुत्रमरण, विजय-पराजय, प्रिय-अप्रिय, सिद्धि-असिद्धि, मित्र-शत्रु आदि केवल अभिनयमात्र हैं। वह अभिनेता इन सभी द्वन्द्वोंसे अपनेको सर्वथा परे तथा इन्हें खेलमात्र मानकर अपने अंदर इनसे निर्लेप रहता है। न कभी इनमें उसकी आसक्ति होती है न द्वेष, न ममता होती है न द्रोह, न इनकी कामना होती है न वासना। वह सारे कार्य अपने स्वाँगके अनुसार यथाविधि सुचारुरूपसे करता हुआ भी निर्द्वन्द्व रहता है। वैसे ही तुम भी इस संसारमें सब कुछका केवल इस शरीर और नामसे ही सम्बन्ध मानकर, यहाँ अभिनेताकी भाँत सारे काम भलीभाँति करते हुए भी निष्काम, अनासक्त, निर्लेप रहो।
याद रखो—कोई अभिनेता रंगमंचकी पहनी पोशाक, गहने आदिपर या वहाँ बने हुए पुत्र, पत्नी आदिपर वस्तुत: अपना अधिकार करना चाहे या उन्हें अपना बतावे तो वह जैसे पागल या अपराधी माना जाता है और उसे यथाविधि शिक्षा या दण्ड दिया जाता है। वह वस्तु तो उसकी होती ही नहीं, क्योंकि वह कभी उसकी थी ही नहीं। वह तो खेलमात्रके लिये उसे मिली थी। वैसे ही इस संसारके प्राणी-पदार्थोंपर ममता करके जो उनका मालिक बनना चाहता है, उसको वे प्राणी-पदार्थ तो मिलते ही नहीं, वह उलटा दण्डका पात्र होता है और दु:खी होता है।
याद रखो—जब अभिनेता रंगमंचपर स्वाँग धारण करके नहीं आया था, तबतक वह जैसे अपने स्वरूपमें था वैसे ही स्वाँग धारण करके रंगमंचपर अभिनय करनेके लिये आनेपर भी वह अपने स्वरूपमें ही है। केवल अपने प्रभुका बताया हुआ अभिनय करनेके लिये रंगमंचपर दूसरा नाम-रूप धारण करके आया है। इसी प्रकार तुम भी इस शरीर और नामको धारण करके प्रभुकी प्रीतिके लिये खेल करने आये हो, इस बातको याद रखते हुए अपने स्वाँगके अनुसार प्रभु-प्रीत्यर्थ खेल करते रहे। अपनेको सदा प्रभुका आदेश पालन करनेवाला सेवक बनाये रखो। जबतक वे नाम-रूप देकर संसारमें काम कराना चाहते हैं, तबतक अपने स्वाँगके अनुसार काम करते रहो। पर सदा यही दृढ़ अनुभव करते रहो कि इस कामसे तथा जिनके साथ तुम्हारे इस कामको लेकर व्यवहार होता है, उनसे वस्तुत: तुम्हारा कोई भी सम्बन्ध नहीं है। तुम्हारा सम्बन्ध तो केवल प्रभुसे है। वे तुम्हारे बहुत ही भले नित्य मालिक हैं और तुम उनकी रुचिके अनुसार चलनेवाले नित्य सेवक हो।
याद रखो—प्रभुका सेवक वही है, जिसपर दूसरे किसीका—किसी भी प्राणी-पदार्थ-परिस्थितिका अधिकार नहीं है तथा जो प्रभुकी सेवाको छोड़कर किसी भी प्राणी-पदार्थ-परिस्थितिपर अपना अधिकार नहीं मानता। ऐसा अनन्य सेवक ही प्रभुका यथार्थ सेवक है और प्रभु भी उसीके अनन्य स्वामी हैं।