सर्वोत्तम सुखका साधन—संतोष

याद रखो—संसारमें सर्वोत्तम सुखकी प्राप्तिका परम साधन है—‘संतोष’। असंतोषी मनुष्य सदा ही दु:खी रहेगा, चाहे उसको कुछ भी, कैसी भी वस्तु या परिस्थिति प्राप्त हो जाय। परंतु भगवद्भजन, भगवत्प्रेममें संतोष महान् विघ्नरूप हैं। सांसारिक भोगोंमें संतोष साधन है और भगवद्भजनमें संतोष विघ्न है। अत: भजनमें कभी संतोष मत करो। भजन जितना हो उतना ही थोड़ा; परमार्थ-साधन जितना हो, उतना ही थोड़ा और भगवान‍्के प्रति प्रेम जितना हो उतना ही थोड़ा।

याद रखो—विषयासक्त मनुष्य इससे ठीक विपरीत भोगजगत‍्में सदा असंतोषी रहता है, जितना जो कुछ भी पाता है, उसमें सदा ही कमीका अनुभव करता है और अधिक पाना चाहता है। उसके लिये जो कुछ करता है, उससे अधिक—और भी अधिक करना चाहता है। इसी असंतोष-वृत्तिको लेकर वह अपना कार्यक्षेत्र बढ़ाता रहता है, परिणाममें अपने-ही-आप अपनेको सब ओरसे जकड़कर बुरी तरह फँस जाता है तथा रात-दिन चिन्ता, भय, विषादसे घिरा रहता है। कभी किसी भी अवस्थामें वह शान्ति नहीं पाता, परंतु परमार्थ-साधन या भजनमें सदा संतोष रखता है। प्रथम तो, उसकी आवश्यकता ही नहीं समझता; जहाँ कुछ करता भी है तो वह बहुत ही थोड़ा, नियमित, अल्पकालके लिये ही और मान लेता है कि मैं बहुत कर रहा हूँ। इसीसे परमार्थ-साधन या भजन बनता नहीं और इसीसे सच्चे शान्ति-सुखकी प्राप्ति होती नहीं।

याद रखो—दिनभरके चौबीस घंटेमें भी कुछ मिनट यदि कोई भजनमें लगाता है और तेईस घंटेसे भी अधिक भोग-सेवन तथा भोग-साधनमें लगाता है तो उसका मन सहज ही भोगोंमें रहता है, भगवान‍्में नहीं लग पाता। भगवान‍्में मनका न लगना ही मानव-जीवनकी व्यर्थता है और बहुत बड़ा प्रमाद है।

याद रखो—भोगासक्ति तथा भोगकामनासे जीवन भोगपरायण बन जाता है। भोगपरायणतासे विवेक नष्ट हो जाता है तथा विवेकभ्रष्ट मनुष्य ऐसे कर्म करने लगता है, जो उसे कभी नहीं करने चाहिये और जिनको वह खुद बुरा मानता—कहता चला आ रहा है। उन पापकर्मोंको करते-करते उनसे पहले तो घृणा-बुद्धि निकल जाती है, फिर उनमें समीचीन बुद्धि हो जाती है, उनकी आवश्यकताका अनुभव होने लगता है और तदनन्तर पापाचरणमें वह अपना गौरव मानने लगता है—अत: उसका जीवन पाप-जीवन बन जाता है और फलत: वह अनन्त पाप-राशिको लेकर मरता है। यों उसका मानव-जीवन केवल व्यर्थ ही नहीं होता, वह मानव-जीवनके परम तथा चरम लक्ष्य भगवत्प्राप्तिसे ही वंचित नहीं रहता, वह पापके परिणामस्वरूप जन्म-जन्ममें कूकर-शूकरादि, पिशाच-राक्षसादि तथा कृमि-कीटादि आसुरी योनियोंमें जाने तथा भीषण नरक-यन्त्रणाएँ भोगनेको बाध्य होता है। अत: उसका मानव-जीवन केवल व्यर्थ ही नहीं जाता, घोर अनर्थ उत्पन्न करनेवाला होता है। इसलिये भोगमें सदा ही संतोष रखो—जो कुछ भी प्राप्त हो जाय, उसीमें संतुष्ट रहो; किन्तु भजनमें—परमार्थ-साधनोंमें कभी संतोष मत करो। उसको सदा बढ़ाते ही जाओ।

याद रखो—भगवद्भजन ही असली धन है, वही परम सम्पत्ति है। भजन न होना ही घोर दारिद्रॺ तथा महान् विपत्ति है। भजनमें ही परम बुद्धिमत्ता एवं सौभाग्य है, भजन न होना ही महान् मूढ़ता एवं दारुण दुर्भाग्य है। भजन ही पुण्य है तथा भजन न होना ही भयंकर पाप है। अतएव दिन-रात भजन करो। मनसे भगवान‍्का चिन्तन, वाणीसे भगवान‍्के नाम-गुणका गान तथा शरीरसे होनेवाले प्रत्येक कल्याणमय कार्यके द्वारा भगवान‍्का सेवन-पूजन करो। यों दिन-रात भगवद्भजनमें लगे रहकर जीवनको भजनमय बना दो। तभी मानव-जीवन मानव-जीवन है और तभी उसकी सार्थकता है।