शक्ति और शक्तिमान‍्में अभेद

याद रखो—जैसे अग्नि और अग्निकी दाहिकाशक्ति, सूर्य और सूर्यकी किरण, चन्द्रमा और चन्द्रमाकी चाँदनी एवं जल और जलकी शीतलता सदा एक हैं, इनमें कभी कोई भेद नहीं है, उसी प्रकार शक्तिमान् और शक्तिमें कोई भेद नहीं है। जैसे अग्निशक्ति अग्निस्वरूपके आश्रयके बिना नहीं रहती और जैसे अग्निस्वरूप अग्निशक्तिके बिना सिद्ध ही नहीं होता, उसी प्रकार शक्ति और शक्तिमान‍्का अविनाभाव एकत्व-सम्बन्ध है। वह नित्य पुरुषरूप है और यह नित्य ही नारी-स्वरूप। ऐसे दो होते हुए भी वे नित्य एक हैं। स्वरूपत: कभी दो होकर रह ही नहीं सकते। एकके बिना एकका अस्तित्व ही नहीं रहता।

याद रखो—पराशक्ति परब्रह्म परमात्मा शक्तिमान‍्के आश्रय बिना नहीं रहतीं; इसलिये वे ‘परमात्मस्वरूपा’ ही हैं। इसी प्रकार शक्तिमान् परब्रह्म पराशक्तिके कारण ही शक्तिमान् हैं, इसलिये वे नित्य ‘पराशक्तिरूपा’ ही हैं। इन दोनोंमें भेद मानना ही भ्रम है, परंतु इस प्रकार नित्य अभिन्न होनेपर भी इनमें प्रधानता शक्तिकी ही है।

याद रखो—‘सच्चिदानन्दघन सर्वातीत तत्त्व भी ‘सच्चिदानन्द-शक्ति’ का अभाव हो तो ‘शून्य’ रह जाता है। इसलिये उसका सत्-तत्त्व सत्-शक्तिसे, चित्-तत्त्व चित्-शक्तिसे और आनन्द-तत्त्व आह्लादिनी-शक्तिसे ही स्वरूपत: सिद्ध है।

याद रखो—परमात्माकी इन्हीं शक्तियोंको संधिनी, संवित् और ह्लादिनी-शक्ति भी बतलाया गया है। अपनी जिस स्वरूपाशक्तिके द्वारा भगवान् सबको सत्ता देते हैं, उस शक्तिका नाम ‘संधिनी’ है, जिसके द्वारा ज्ञान या प्रकाश दिया जाता है, वह ‘संवित्’ शक्ति है और स्वयं नित्य अनाद्यनन्त-परमानन्दस्वरूप होकर भी जिस शक्तिके द्वारा अपने आनन्दस्वरूपकी जीवोंको अनुभूति कराते हैं तथा स्वयं भी आत्मस्वरूप विलक्षण परमानन्दका साक्षात्कार करते हैं, उस आनन्दमयी स्वरूपाशक्तिका नाम ‘ह्लादिनी’ शक्ति है।

याद रखो—यह परमाश्चर्यमयी नित्य परमानन्दस्वरूप स्वरूपमयी ह्लादिनीशक्ति ही स्नेह, प्रणय, मान, राग, अनुराग, भाव और महाभावरूपमें भक्ति या प्रेम-शब्द-वाच्य होकर परम प्रेमसुधाका प्रवाह बहाती है और उसमें अवगाहन करके भक्त तथा भगवान् दोनों ही परमानन्दका अतृप्त पान करते हैं। यह सब शक्तिका ही चमत्कार है।

याद रखो—भगवान् विष्णु, भगवान् शंकर, भगवान् राम, भगवान् श्रीकृष्ण तथा अन्यान्य बड़े-छोटे किसीकी भी उपासना शक्तिरहित रूपमें हो ही नहीं सकती। जो शक्ति विष्णुको विष्णु, जो शक्ति शिवको शिव, जो शक्ति रामको राम और जो शक्ति श्रीकृष्णको श्रीकृष्ण बनाये हुए हैं, जिनके बिना उनकी स्वरूपसत्ता ही नहीं रहती, उन शक्तियोंके बिना जब वे शक्तिमान‍् रूप ही नहीं रहते, तब उनकी अकेलेकी—‘शक्तिरहित शक्तिमान्’ की उपासना कैसे हो सकती है? शक्ति न रहनेपर तो उनका स्वरूप ही नहीं रहेगा।

याद रखो—शक्तिको साथ माना जाय या न माना जाय, उपासनामें शक्तिका विग्रह साथ रखा जाय या न रखा जाय, जब उपासना होगी तब शक्ति साथ रहेगी ही। उसके बिना उपास्य तथा उसकी उपासना सम्भव ही नहीं।

याद रखो—इसी प्रकार अकेली पराशक्तिकी भी उपासना नहीं हो सकती। जब शक्ति शक्तिमान‍्में ही निवास करती है, तब शक्तिकी उपासनासे शक्तिमान‍्की उपासना भी स्वत: ही हो जायगी। अतएव वैष्णव, शाक्त और शैवोंमें वस्तुत: कोई भेद नहीं है। पुरुषरूप शक्तिमान‍्की उपासना करनेवाले स्वाभाविक ही शक्तिकी उपासना करते हैं, चाहे अपनी जानमें न करें और इसी प्रकार शक्तिकी उपासना करनेवाले भी शक्त्याधार शक्तिमान‍्की उपासना करते हैं। अतएव मुख्य या गौण भेदसे किसी भी शक्तिमान् या शक्तिकी उपासना की जाय, यदि उसमें अनन्यभाव है तो वह एकमात्र सच्चिदानन्द-तत्त्वकी ही उपासना है।

याद रखो—तथापि पृथक्-पृथक् रूपोंमें तथा विभिन्न नामोंसे शक्तिकी उपासना की जाती है। वैष्णवजन भगवती लक्ष्मीकी, भगवती सीताकी, भगवती राधाकी उपासना करते ही हैं। शैव भगवती उमा-सतीकी—दुर्गाकी उपासना करते हैं और इसी प्रकार शाक्त भी भगवान् शिव तथा भैरवकी उपासना करते हैं। विशेष-विशेष अवसरोंपर भगवान् स्वयं उपदेश देकर भगवती देवीकी उपासना अपने भक्तोंसे करवाते हैं और भगवती स्वयं उपदेश देकर भगवान‍्की उपासना करवाती हैं तथा इससे उन्हें बड़ी प्रसन्नता प्राप्त होती है। भगवान् रामकी उपासनासे सीताको, भगवान् श्रीकृष्णकी उपासनासे राधाको, भगवान् श्रीविष्णुकी उपासनासे लक्ष्मीको और भगवान् श्रीसदाशिवकी उपासनासे पार्वतीको एवं इसी प्रकार भगवती सीताकी उपासनासे श्रीरामको, भगवती राधाकी उपासनासे श्रीकृष्णको, भगवती लक्ष्मीकी उपासनासे श्रीविष्णुको और पार्वतीकी उपासनासे श्रीमहादेवको अनिर्वचनीय सुखकी प्राप्ति होती है।

याद रखो—उपासनामें इष्टका रूप एक होना चाहिये, यह परम आवश्यक है। तथापि उस एककी प्रसन्नता-सम्पादनके लिये या उसके आज्ञापालनके लिये अन्य रूपकी उपासना करना भी कर्तव्य होता है। अर्जुनने भगवान् श्रीकृष्णकी आज्ञासे भगवान् शिवकी तथा ‘एकानंशा’ शक्तिकी उपासना की। स्वयं भगवान् श्रीकृष्णने भगवान् शंकरकी उपासना की, भगवान् श्रीरामने स्वयं शक्ति तथा शिवकी उपासना की, श्रीशंकरने भगवान् विष्णु तथा रामकी एवं शक्तिकी आराधना की, गोपोंने अम्बिकाकी पूजा की, गोपरमणियोंने कात्यायनीकी पूजा की; यादवोंने दुर्गापूजन किया एवं श्रीसीताजी और श्रीरुक्मिणीजीने अम्बिकापूजन किया। ये सब कथाएँ प्रसिद्ध हैं।

याद रखो—शक्ति और शक्तिमान‍्में अभेद मानते हुए ही जिनकी जिस रूपमें, जिस नाममें, जिस तत्त्वविशेषमें रुचि हो, जिसका जो इष्ट हो, उसको उसीकी उपासना उसीके अनुकूल पद्धतिसे करनी चाहिये। पर यह मानना चाहिये कि हमारे ही परम इष्टकी उपासना सभी लोग विभिन्न नाम-रूपोंसे करते हैं तथा हमारे ही परम इष्टदेव विभिन्न रूपोंको धारण किये हुए हैं।