वैराग्यवान् पुरुष ही सुखी

याद रखो—जबतक संसारके भोगपदार्थोंमें सुखकी भ्रान्ति है और इस कारण जबतक संसारके प्राणी-पदार्थोंमें ममता और आसक्ति है, तबतक न तो सच्ची भक्ति प्राप्त होगी, न ज्ञान ही मिलेगा और न योगसाधना ही सिद्ध होगी। निष्काम कर्मका साधन भी बिना विषय-वैराग्यके नहीं हो सकता।

याद रखो—आसक्ति मनमें होती है और उसका त्याग भी मनसे ही होता है। इसलिये न ‘वैरागी’ या ‘वीतरागी’ नाम रखनेसे विषयासक्तिका त्याग होता है न बाहरी त्यागसे। नाम रखना और वस्तुत: वैराग्यकी इच्छा न करना तो दम्भ है। परंतु जबतक मनमें विषयोंकी ओर आकर्षण है, विषयोंमें सुखकी कल्पना है, विषय-सुखकी वासना है, तबतक ‘वैराग्य’ नहीं है।

याद रखो—जबतक विषय-सुखकी भ्रान्ति तथा उसकी वासना रहेगी, तबतक बाहरसे त्याग करनेपर भी विषयके सामने आनेपर अथवा विषयकी स्मृति होनेपर उसे प्राप्त करनेकी इच्छा उत्पन्न हो जायगी, जो बाह्य-विषय-त्यागी पुरुषको भी विषय-सेवनमें लगा देगी और उसका पतन हो जायगा।

याद रखो—विषयमें सुख है ही नहीं, दु:ख-ही-दु:ख है। संसारमें खान-पान और कपड़ा-लत्ता तथा घर-मकान तो जीवन-निर्वाहके लिये हैं और यह मानव-जीवन है भोगोंमें वैराग्य प्राप्त करके भगवत्प्राप्ति या स्वरूप-साक्षात्कारकी साधनाके लिये। जीवन-निर्वाहके लिये इन वस्तुओंका ग्रहण है, इनके लिये जीवन कदापि नहीं है। अतएव जो स्वाद-शौकीनीके लिये भोजन-वस्त्रादिका सेवन करता है, वह विषयासक्त मनुष्य सर्वथा विरागहीन है और उसे संसारमें बँधे ही रहना पड़ेगा।

याद रखो—जैसे ये विषय शरीरनिर्वाहके लिये हैं, वैसे ही यह शरीर भी जीवात्माके रहनेभरके लिये है। यह तुम्हारा स्वरूप नहीं है। इस शरीरमें होनेवाली बाल, युवा, वृद्धावस्थाको जाननेवाला आत्मा सदा एक-सा रहता है। तुम कहते हो, ‘मैं पहले बालक था, यों खेलता था; जवानीमें मेरे शरीरमें बड़ी शक्ति थी, अब बुढ़ापेमें मैं शक्तिहीन हो गया।’ यों कहनेवाले तुम आत्मा इस शरीरसे पृथक् हो, यह सिद्ध है। यों समझकर इस शरीरसे आसक्ति-ममताका त्याग करो और जबतक शरीर है, तबतक समबुद्धिसे प्राप्त भोगोंका भोग करते हुए इसे भगवत्साधनामें सहायक बनाये रखो।

याद रखो—तुम्हारा जब भगवान‍्में अनुराग हो जायगा या आत्मस्वरूपमें तुम्हारी स्थिति हो जायगी, तब तो तुम भोगोंको विषकी भाँति या स्वप्नराज्यकी भाँति स्वयमेव ही त्याग दोगे। परंतु पहलेसे ही उनमें बार-बार दोष-दु:ख देखकर और उन्हें बन्धनका परम कारण मानकर उनकी आसक्तिका त्याग करो।

याद रखो—असली त्याग तो मनकी भोगासक्तिके त्यागमें ही है और वही सच्चा वैराग्य है। परंतु जहाँतक बने, विषयसेवन कम-से-कम करो; विषयोंमें रमणीयता तथा सुखका बाध छोड़कर उनका केवल आवश्यकता होनेपर ही सेवन करो। भोगोंका संग्रह-परिग्रह भी भोगोंकी आसक्तिको बढ़ानेवाला है। भोगासक्त तथा भोगसम्पन्न मनुष्योंकी ओर मत देखो, देखो विषयविरागी-त्यागी महात्माओंकी ओर। संग करो उन विषयविरागी महात्माओंके चरित्रों और उपदेशोंका, जिससे भोगरूपी मीठे विषके प्रति तुम्हारे मनमें अनास्था, अनासक्ति पैदा होकर उनमें यथार्थ वैराग्य हो जाय।

याद रखो—भोगी पुरुष सदा ही भय और विषादके जालमें फँसा रहेगा—प्राप्त भोगके नाशका भय और नाश हो जाने या न मिलनेपर महान् विषाद और शोक। परंतु जिसकी भोगोंमें आसक्ति नहीं है, वह सदा निर्भय और शोकरहित एवं परमानन्दमें रहेगा। वैराग्यवान् पुरुषको कोई भी परिस्थिति दु:खी नहीं बना सकती।