वस्तु और परिस्थितिका सदुपयोग
याद रखो—भगवान्ने तुम्हें जो कुछ भी दिया है, वह लाभ उठानेके लिये है। अत: प्रत्येक वस्तु तथा परिस्थितिका सदुपयोग करके उससे लाभ उठाओ। सबसे अधिक मूल्यवान् वस्तु है—समय। मृत्यु आनेपर एक क्षणका समय भी माँगे नहीं मिलता। अतएव जीवनके एक-एक क्षणका सदुपयोग करो। एक-एक श्वासका समय कल्याणमय कार्यमें लगाओ। समयका सर्वोत्तम सदुपयोग है—आलस्य-प्रमादको छोड़कर भगवान्का मंगलमय स्मरण करते हुए प्रत्येक कर्तव्य-कर्मको भगवान्की पूजा-सेवाके भावसे करना। अनर्थकारी और व्यर्थ साहित्य, सिनेमा, ताश आदि खेल, व्यर्थ निद्रा, व्यर्थ वार्तालाप आदिमें समय लेना उसका दुरुपयोग है। पापकर्मोंमें समय लगाना तो दुरुपयोग ही नहीं है, समयके साथ शत्रुता करके अपने विनाशको बुलाना है।
याद रखो—तुम्हें मन मिला है—भगवच्चिन्तन करने तथा सच्चिन्तनके द्वारा अपना तथा दूसरोंका मंगल सोचनेके लिये। ऐसा करना ही मनका सदुपयोग है और जीवनकी सफलताका साधन है। परंतु तुम इसे यदि विषाद, भय, चिन्ता, वैर, हिंसा, व्यर्थ-चिन्तन, काम-चिन्तन, विषय-चिन्तनमें लगाते हो, पवित्र भावोंके बदले अशुद्ध विचारोंमें संलग्न रखते हो, नियन्त्रणमें न रखकर व्यर्थ-अनर्थके विचारोंमें भटकने देते हो तो तुम इसका दुरुपयोग कर रहे हो।
याद रखो—तुम्हें वाणी मिली है—भगवन्नाम-गुणगानके लिये, स्वाध्यायके लिये, हितपूर्ण-मधुर-सत्य-भाषणके लिये—ऐसे शब्दोंके उच्चारणके लिये जिनसे अपना तथा दूसरोंका कल्याण हो तथा जो शब्द वायुमण्डलमें फैलकर चिरकालतक वातावरणमें शुद्ध प्रेरणा देते रहें। ऐसा करना ही वाणीका सदुपयोग है। इसके विपरीत यदि तुम वाणीके द्वारा असत्य, अहितकारी, उद्वेग उत्पन्न करनेवाले, कटु तथा अप्रिय शब्दोंका उच्चारण करते हो, परनिन्दा, परचर्चा, परहानि-चर्चा, आत्म-प्रशंसा, सन्निन्दा या व्यर्थकी बातोंमें, दुनियाकी आलोचना-प्रत्यालोचनामें, मिथ्या गप-शपमें लगाते हो तो वाणीका दुरुपयोग करते हो।
याद रखो—तुम्हें धन-सम्पत्ति मिली है, वस्तुएँ मिली हैं—भगवान्की सेवाके लिये। जहाँ अभाव है, वहाँ भगवान् उन अभावग्रस्तोंके रूपमें तुमसे धन-सम्पत्ति तथा उन वस्तुओंकी माँगते हैं। तुम उन वस्तुओंको अपनी न मानकर, अपने लिये कम-से-कम शेष सब यथायोग्य अभावग्रस्तोंको आदरपूर्वक प्रदान करनेके रूपमें भगवत्-सेवामें लगा देते हो, तब तो उनका सदुपयोग करते हो और तुम्हारी धन-सम्पत्ति तथा प्राप्त वस्तुओंकी सार्थकता होती है। इससे आत्मप्रसादके साथ तुम्हें भगवत्कृपा प्राप्त होती है। परंतु इसके विपरीत यदि उस धन-सम्पत्तिपर अपना स्वामित्व—अपना अधिकार मानकर उसे अपने ही भोगमें लगाते हो या संग्रह करके ही उसके रक्षणकी चिन्ता करते हुए मर जाते हो तो तुम अपनी बड़ी हानि करते हो; क्योंकि भगवान्की वस्तुको अपनी मानकर तुम चोरी करते हो और इस चोरीका दण्ड तुम्हें भोगना पड़ेगा। तुम यदि धन-सम्पत्तिको स्वाद-शौकीनी, विलासिता-फैशन आदिमें, शराब-व्यभिचार, अनाचार-अत्याचार, अभक्ष्य-भक्षण-पान या वैर-हिंसामें लगाते हो तो उसका पूरा दुरुपयोग करते हो—आप ही अपने लिये अनन्त यन्त्रणामय नरकभोगकी योजना बनाते हो। अत: सावधान हो जाओ। पापके कार्योंमें धन-सम्पत्ति या किसी भी वस्तुका उपयोग करो ही मत। अपने जीवननिर्वाहमें भी अत्यन्त सादगीसे उनका कम-से-कम उपयोग करो। बढ़िया बेशकीमती कपड़े न पहनकर कम दामके कपड़े पहनो और पैसोंको बचाकर उनसे अभावग्रस्तोंके लिये वस्त्रोंकी व्यवस्था करो। खान-पानमें सादगी बरतो और शेष पैसोंको अन्नके अभावसे दु:खी पीड़ित भगवत्स्वरूपोंकी सेवामें—अन्नदानके रूपमें लगाओ। यही सदुपयोग है।
याद रखो—इसी प्रकार तुम्हें जो कान, नाक, आँख, जीभ, त्वक्, इन्द्रियाँ मिली हैं, इनको भी भगवान्के साथ जोड़कर तथा इनके द्वारा सेवा करके इनका सदुपयोग करो। दु:ख, निन्दा, अपमान, संकट आनेपर उनका भी सदुपयोग यों विचारकर करो कि ये सब हमारे ही किये दुष्कर्मोंके फल हैं। अतएव अब किसी प्रकार भी कोई दुष्कर्म न करके सदा सत्कर्म ही करना है।