विचार और आचरण
याद रखो—मनुष्य-जीवनके वास्तविक स्वरूपका पता उसके बाहरी वेष-भूषासे नहीं लगता, उसके विचार तथा आचरणसे ही लगता है। जिसके जैसे विचार और आचरण हैं, वैसा ही उसका स्वरूप है। अतएव तुम निरन्तर अपने विचार तथा आचरणको सँभालते रहो।
याद रखो—जबतक तुम्हारा विवेक जाग्रत् है, तभीतक तुम्हें अपने अच्छे-बुरे विचार और आचरणका पता लगेगा। मनुष्यका विवेक जब लुप्त हो जाता है, तब उसकी अच्छा-बुरा देखने-परखनेकी दृष्टि नष्ट हो जाती है और बुरे वातावरण तथा चिन्तनसे यदि बुराईमें अच्छाई दीखने लगती है, तब तो उसका अनायास ही पतन हो जाता है; क्योंकि तब उसकी धारणामें पाप करनेपर ‘मैं पुण्य करता हूँ’ ऐसी मिथ्या अनुभूति होती है और वह पापमें सफलता प्राप्त करनेपर अपनेको गौरवशाली तथा सफल-जीवन मानता है। इसलिये जहाँतक बने विशुद्ध सत्संग तथा शुद्ध स्वाध्यायसे विवेकको जाग्रत् रखो।
याद रखो—पतन जितना सहज और शीघ्र होता है, उतना सहज शीघ्र उत्थान नहीं होता। फिसलाहटसे भरा है जगत्। सावधान रहो, सदा गिरनेसे बचो और निरन्तर ऊपर उठने अथवा सन्मार्गपर आगे बढ़नेका प्रयास उत्साहपूर्वक करते रहो।
याद रखो—विवेक नष्ट होकर मनुष्यका जो पतन होता है, उसमें सबसे प्रधान कारण है कुसंग। कुसंग केवल किसी पतित मनुष्यके संगको ही नहीं कहते। प्रत्येक इन्द्रियका प्रत्येक विषय ही कुसंग बन सकता है। जिस प्राणी-पदार्थके देखने, सुनने, सूँघने, चखने और स्पर्श करनेसे पापमें पुण्यकी तथा बुराईमें भलाईकी धारणा होती हो, भोगोंके लिये अनुचित लालसा जगती हो वह सभी कुसंग है। साहित्य, दृश्य, मनुष्य, भोजन-पान, वस्त्राभूषण, स्थान, वार्तालाप—सभी कुसंग बन सकते हैं। अतएव कुसंगसे सदा बचते रहो। सत्संगका सदा सेवन करो।
याद रखो—सत्संग किसी प्राणी, स्थान या वस्तुका नाम नहीं है। सत् हैं भगवान्, सत् है सदाचार, सत् है सद्विचार—जिस संगसे श्रीभगवान्में प्रीति बढ़ती हो, सदाचार और सद्विचारोंका उदय और संवर्धन सहज ही होता हो, वही सत्संग है। सत्संगको अमूल्य धन समझो, सत्संगके साथ किसी भी धन, सौभाग्य या पुण्यकी तुलना नहीं हो सकती। सत्संग मनुष्यको समस्त पाप-तापसे सर्वथा छुड़ाकर दिव्य पुण्यमय तथा सुखमय बना देता है। सत्संग अतुलनीय धन है।
याद रखो—विषयी जगत्का संग एक बार सुहावना लगता है और वह लगता है इन्द्रियोंके बहिर्मुखी—भोगमुखी स्वभावके कारण ही। पर विषयी जगत्का संग वस्तुत: मीठे विषके समान है। उसका तत्त्व-रहस्य न जाननेके कारण ही उसमें सुख तथा प्रिय बुद्धि हुआ करती है। जिनकी विवेककी आँखें खुली होती हैं, वे प्रत्यक्ष देख पाते हैं उसके भीतरी असली भयानक रूपको और उसके द्वारा होनेवाले घोर विनाशमय परिणामको। इसलिये जहाँतक बने, प्रयत्नपूर्वक मन तथा इन्द्रियोंको अन्तर्मुखी करो, उन्हें सत् में लगाये रखो, भगवान्के साथ नित्य-निरन्तर जोड़े रखनेका प्रयत्न करो। तभी मानव-जीवन सफल होगा और जीव-जीवनका दु:खमय प्रवाह सूखेगा।