विचारोंके अनुसार मानवका स्वरूप

याद रखो—तुम अपने मनमें जिस प्रकारके विचारोंको स्थान दोगे, जिस प्रकारके विचारोंका पोषण करोगे, वही तुम्हारा आदर्श होगा और तुम सहज ही वैसे ही बनते चले जाओगे। तुम यदि यह निश्चय करोगे—सदा इसी प्रकारके विचारोंका पोषण करते रहोगे कि ‘ईश्वर सर्वशक्तिमान् हैं, वे मेरे परम सुहृद् हैं, मैं उनका अपना हूँ,अतएव उनके सहज सौहार्दसे मेरे जीवनमें त्याग, प्रेम, आनन्द, पुण्य, सफलता, दया, परदु:ख-कातरता और सबमें भगवान‍्को देखकर सबकी सेवाके भाव सदा जाग्रत् रहेंगे। मेरा जीवन ऐसा ही बन रहा है और बनेगा। मैं जहाँ रहूँगा, वहीं मेरे द्वारा वातावरणमें इन्हीं सद्भावोंका प्रसार होगा। लोगोंके ऐसे सत्-चित् के निर्माणमें मैं सहज सहायक बनूँगा।’ तो सचमुच तुम ऐसे ही बन जाओगे और दूसरे लोगोंको भी ऐसा बननेमें सहायता दोगे।

याद रखो—जैसे प्रकाश जहाँ जाता है, वहीं अपना प्रकाश फैलाता है। चन्द्रमा जहाँ जाता है, वहीं अमृत बरसाता है, सुगन्धित पुष्प सर्वत्र अपनी सुगन्ध फैलाता है, वैसे ही तुम भी अपने जीवनके द्वारा सर्वत्र प्रकाश, अमृत और सुगन्धका प्रसार कर सकते हो। तुम्हें देखते ही लोगोंके अन्धकारका नाश, विषका शमन और दुर्गन्धका अभाव होने लगेगा और बदलेमें उजियाला, मधुर अमृतरस तथा सुन्दर सुगन्ध पाकर लोग प्रमुदित और पुलकित हो जायँगे।

याद रखो—तुम भगवान‍्के सनातन अंश हो, उनके सभी दिव्य गुणोंका तुम्हारे अन्दर विकास तथा प्रकाश हो सकता है, बस, उनका चिन्तन करो, उनको जगाओ और उनका पोषण करो उनको अपनाकर। तुम्हारा जीवन भगवान‍्के दिव्य गुणोंसे—दैवी सम्पदासे सम्पन्न होकर परम सुन्दर, परम पवित्र, परम सुखमय और परम मधुर मनोहर बन जायगा। फिर तुम्हारे द्वारा इन्हींका प्रसार-प्रचार होगा।

याद रखो—तुम सदा सात्त्विक दैवी विचार रखोगे, तब उन्हींके अनुसार सहज ही तुमसे बर्ताव-व्यवहार होगा। दूसरोंके साथ तुम वैसे ही बरतोगे। परिणाम यह होगा कि सारे जगत‍्से बदलेमें तुम्हें भी वही सात्त्विक दैवी व्यवहार प्राप्त होगा। इससे परस्पर प्रेम-आनन्द फैलेगा तथा जगत‍्के अशुद्ध अशान्तिमय वातावरणको भी तुम सहज ही शुद्ध शान्तिमय बनानेमें अपना अमूल्य हिस्सा दे सकोगे। यह भी भगवान‍्की बहुत बड़ी सेवा होगी तुम्हारे द्वारा। तुम्हारा अपना तो परम कल्याण होगा ही, तुम औरोंको भी कुपथसे हटाकर कल्याणपथपर ला सकोगे।

याद रखो—जगत‍्की सबसे बड़ी सेवा है जगत‍्के प्राणियोंमें सद्भावोंको, भगवद्भावोंको जाग्रत् करके उनको बढ़ाना, उन्हें भगवान‍्की ओर लगाना। यह काम सदुपदेशसे उतना नहीं होता, जितना सत्-जीवनसे होता है। तुम्हारा जीवन पवित्र भगवद्भावसम्पन्न होगा तो उसके द्वारा अपने-आप जगत‍्के लोग भगवद्भावकी सच्ची शिक्षा-दीक्षा प्राप्त कर सकेंगे। पर यदि तुम अपने अशुद्ध भोगासक्तिमय भावोंसे जगत‍्के लोगोंके अंदर आसुरी भावोंको भरते, जगाते और बढ़ाते रहोगे तो तुम अपनी तथा जगत‍्की बहुत बड़ी हानि करोगे। फलस्वरूप तुम्हें स्वाभाविक ही भगवान‍्का भी कोपभाजन होना पड़ेगा, जिसका रोग-नाशके लिये कड़वी दवाकी भाँति, मंगलमय दयामय भगवान् तुम्हारे लिये मंगल विधान करेंगे!

याद रखो—यदि तुम अपने अंदर रहे परमात्माको जगा सके, देख सके, उनके प्रति अपनेको अर्पण करके उनके आदेशानुसार चल सके और उनके दिव्य गुणोंका अपने अंदर विकास-प्रकाश कर सके तो तुम्हारा मानव-जीवन परम सफल होगा। तुम जगत‍्में धन्य ही नहीं बनोगे, तुम तो तरन-तारन बन जाओगे। तुम्हारे अंदर भगवान् नित्य विराजित हैं, उनके साथ ही उनके दिव्य गुण भी, दिव्य भाव भी वर्तमान हैं। उनको देखो, प्रकाश करो और उन्हें अपने सहज जीवनमें उतारकर धन्य हो जाओ।