विनयकी महत्ता

याद रखो—जो पलड़ा नीचा होता है, वही भारी होता है। वैसे ही जो विनयशील, मानका त्यागी तथा दूसरोंको सम्मान देनेवाला होता है, अपनेको सबसे नीचा मानकर विनम्र बर्ताव करता है, सबमें भगवान‍्की अभिव्यक्ति देखकर जो सबके सामने सिर झुकाता है तथा सबकी सेवा करता है; इन गुणोंके कारण वस्तुत: वही भारी है। इस क्षेत्रमें नीचा ही ऊँचा है और व्यर्थ अभिमानके ऊँचे पहाड़पर रहनेवाला ही नीचा है।

याद रखो—विनयीसे सब प्रसन्न रहते हैं, सेवकसे सबको सुख मिलता है, सभी सबको हृदयसे चाहते हैं और अपना मानते हैं। भगवान‍्की तो परम कृपा उसे मिलती ही है; क्योंकि सबमें भगवान् देखनेवालेके सामनेसे भगवान् तो कभी एक क्षणके लिये हटते नहीं। वह सदा सर्वत्र सबमें भगवान‍्को देखता है तो भगवान् उसको देखते रहते हैं।

याद रखो—विनयी पुरुषके मित्र बढ़ते हैं और अभिमानीके शत्रु। विनयीके कहीं गिरनेपर लोग उसे उठाने दौड़ते हैं तो अभिमानीको धक्‍के और ठोकर मिलते हैं। विनयीको कहीं अपमान-तिरस्कारका अनुभव नहीं होता; क्योंकि वह अपमान-तिरस्कारको कुछ समझता ही नहीं और अभिमानीको बार-बार अपमान-तिरस्कारकी चोट लगती रहती है। कोई भी स्वाभाविक आकृति, चाल तथा शब्द ही उसपर मर्माघात करने लगते हैं। ये सब विपत्तियाँ अभिमानीकी अपनी बुलायी होती हैं और वे सदा उसके साथ लगी रहती हैं। उनके संगी-साथी तथा परिवारकी वृद्धि होती रहती है। पर विनयीके पास ऐसी दैवी सम्पदाका सुदृढ़ किला रहता है कि उसमें इन विपत्तियोंका कभी प्रवेश ही नहीं हो सकता।

याद रखो—विनयी पुरुषके द्वारा ही किसीका सेवा-सत्कार हो सकता है। अभिमानी तो अपनी ऐंठमें ही रहता है, वह अभिमानवश गुरुजनोंका भी अपमान कर बैठता है। इससे वह उनकी सद्भावना एवं आशीर्वादसे वंचित रह जाता है। शिक्षा ग्रहण करनेमें भी अभिमानसे बहुत बड़ी बाधा आती है; क्योंकि अभिमानी मनुष्य किसीसे कुछ भी पूछने-जाननेमें अपना अपमान समझता है, वह किसीको भी किसी विषयमें अपनेसे ऊँचा माननेको तैयार ही नहीं होता। वह भगवान‍्से भी अभिमानवश दूर ही रहता है। संतोंका भी तिरस्कार करता है। इसीसे भगवान् भी सच्चे चिकित्सक वैद्यकी भाँति अभिमानीका अभिमान नाश करनेके लिये उसके साथ द्वेषकी लीला करते हैं और विनयीके दैन्यके कारण उसके प्रति स्नेह-लीलाका प्रकाश करते हैं।

याद रखो—विनयीके हृदयमें सदा शान्ति रहती है और अभिमानीका हृदय जलता रहता है। वह किसीकी भी उन्नति, प्रगति, उत्थान, समृद्धि तथा कीर्तिकी बात सुन लेता है तो उसे सह नहीं सकता और उसके हृदयकी द्वेषाग्नि बड़े वेगसे भड़क उठती है। उसी जलनको मिटानेके लिये यह ऐसे कुकर्म भी कर बैठता है जो उसकी उस आगको भीषण दु:खदावाग्नि एवं नरकानल बनाकर जलनको और भी तीव्र तथा भयानक कर देते हैं।

याद रखो—सच्चा विद्वान् तथा बुद्धिमान् भी वही है, जिसमें विनय है। विद्याका अवश्यम्भावी फल ही है विनयकी प्राप्ति और विनयके आते ही पात्रता तथा समृद्धि भी आ जाती है। इस प्रकार जो सुख-शान्ति प्रदान करनेवाली पात्रता एवं समृद्धिका सम्पादन कर लेता है, वही बुद्धिमान् है।

याद रखो—फलवाले वृक्ष झुक जाते हैं और अपने अमृत-स्वादी फलोंसे जन-जनको तुष्ट करते हैं, पर अफलवृक्ष सीधे तने खड़े रहते हैं और सबकी उपेक्षाके पात्र होते हैं। सब प्रकारके उत्तम लाभ विनयमें ही हैं। अत: तुम भी विनयी बनो और उससे सबको अपना बना लो।

याद रखो—विनय असली होना चाहिये, दिखावटी नहीं। दिखावटी विनय तो एक प्रकारका छल है जो अपनेको धोखा देता है। अत: दिखावटी विनय न करके असली आदर्श विनयका अर्जन तथा व्यवहार करो।