विवेकका सदुपयोग
याद रखो—तुम मनुष्य हो, भगवान्ने तुमको भविष्यके अच्छे-बुरे सोचनेकी बुद्धि दी है, विवेक दिया है। भगवान्के दिये हुए उस विवेकके द्वारा अच्छे-बुरेका यथार्थ निर्णय करके अच्छेका ग्रहण और बुरेका त्याग करो। तभी तुम्हारे विवेकका सदुपयोग तथा संरक्षण होगा और विवेकके सदुपयोग तथा संरक्षणसे ही तुम्हारी मानवता सिद्ध होगी।
याद रखो—विवेकसे रहित मनुष्य काम-क्रोध-लोभके वेगसे ग्रस्त होकर पशु या पिशाच बन जाता है। कहीं-कहीं तो वह पशु तथा पिशाचके स्तरसे भी आगे बढ़कर इतना मूढ़ और इतना भयंकर बन जाता है कि महान् राक्षस भी उसकी समता नहीं कर पाता, वह अपने तथा जगत्के अमंगलके कारण घोर पापका समुद्र बन जाता है।
याद रखो—मनुष्यके पास जो बुद्धि है, वह जब विपरीत निर्णय देनेवाली तथा विपरीत मार्गपर चलानेवाली बन जाती है, तो फिर उस मनुष्यके समस्त साधन उसके लिये भयानक पापके साधन बन जाते हैं। जिन ज्ञान-विज्ञानके आविष्कारोंसे, जिन भौतिक तथा दैविक सामग्रियोंसे वह समस्त जगत्की सेवा करके सबको सुख पहुँचाकर परिणाममें अपना परम कल्याण कर सकता है, अविवेकके कारण काम-क्रोध-लोभपरायण मनुष्य उन्हीं ज्ञान-विज्ञानके साधनोंसे, उन्हीं भौतिक तथा दैविक सामग्रियोंसे अपने मिथ्या लाभकी कल्पनासे अहंकारमें भरकर समस्त जगत्के विनाशकी बात सोचता है और फलत: स्वयं जीवनभर अशान्ति तथा चिन्ताकी आगमें जलता हुआ बुरी तरह मरता है और मरणोत्तर भीषण नरक-यन्त्रणा भोगने एवं बार-बार आसुरी योनियोंमें जन्म लेनेको बाध्य होता है। यह सब विवेक नष्ट होनेका ही कुपरिणाम है।
याद रखो—काम, क्रोध और लोभ—ये तीन नरकके दरवाजे हैं और आत्माका पतन करनेवाले हैं। विवेकमें शिथिलता आते ही इनकी प्रबलता बढ़ जाती है। फिर ये रहे-सहे विवेकको भी नष्ट कर देते हैं। तब मनुष्य बुद्धिका दुरुपयोग करके अपने सहज प्राप्त साधनोंके द्वारा अन्य सबके विनाशकी बात सोचता है और योजना बनाता है। हिंसावृत्तिवाले हिंसक पशु सिंह, बाघ, साँप आदि तो सामने आये हुए जीवकी ही हिंसा करते हैं, वे योजनापूर्वक हिंसा नहीं करते, वे योजनापूर्वक विषय-संग्रहका प्रयास नहीं करते। पर मनुष्य योजना बनाना जानता है और उसके पास योजनाके अनुसार कार्य करनेके साधन भी हैं; ऐसा शक्तिमान् मनुष्य जब अपनी बुद्धि तथा प्राप्त साधनोंको अमंगलमें मंगल मानकर अमंगल-साधनमें ही लगा देता है, तब वह पशु तथा पिशाचसे भी कितना अधिक आगे बढ़ जाता है, अपने तथा जगत्के लिये कितना अहितकर—कितना शत्रु होता है। इसपर गहराईसे विचार करो।
याद रखो—मानव-जीवन प्रभुकी प्राप्तिके लिये है, भोगोंके लिये नहीं। पाप-साधन करके अपना अमंगल करनेके लिये तो कदापि नहीं। इस बातको सोच-समझकर विवेकका संरक्षण और सदुपयोग करो तथा मानव-जन्मके असली लाभ परमात्मा या भगवत्प्रेमको प्राप्त करके जीवनको सफल बना लो।