विवेकसे अनासक्ति

याद रखो—जो मनुष्य यह जान जाता है कि वह जिस मकानमें रहता है उसमें नीचे-ऊपर, चारों ओरकी दीवालोंमें बारूद भरी है और वह जब कभी भी फट सकती है, वह क्या एक क्षण भी उस मकानमें सुखका अनुभव करके टिक सकेगा? क्या उस मकानमें उसकी आसक्ति रह जायगी? इसी प्रकार जब यह मालूम हो जाता है कि इस सुन्दर दीखनेवाली स्वादिष्ट मिठाईमें संखिया विष मिला हुआ है तो क्या कोई उसे खाना चाहेगा? क्या उसे तुरंत छोड़ना नहीं चाहेगा? इसी प्रकार सदसद्विचारके द्वारा, विवेकके द्वारा जब यह निश्चयपूर्वक विश्वास हो जाता है कि संसारके सभी भोग अनित्य दु:ख-ज्वालामय और अन्तमें विषके समान मारनेवाले हैं तो क्या मनुष्य इन भोगोंमें आसक्त रह सकता है? इस बातको विवेकसे समझो और संसारके तमाम भोगोंको विषवत् जानकर इनसे अनासक्त बनो।

याद रखो—विवेक होनेपर वैराग्य अवश्य होगा ही। भोग दु:ख-ज्वालामय, विषमय हैं—यह ठीक जान लेनेपर उनमें राग रह नहीं सकता। फिर उन्हें मनुष्य तुरंत छोड़ देना चाहेगा। उसे फिर उनमें रहते भय लगेगा। वह चाहेगा, जितनी जल्दी छुटकारा हो जाय, उतना ही अच्छा है। इस प्रकार भोग-जगत‍्से छुटकारा पानेकी इच्छा ही ‘मुमुक्षा’ है। यह जिसमें है वही ‘मुमुक्षु’ है। इसीको भगवत्प्राप्तिकी इच्छा कहते हैं। इस इच्छाके जाग्रत् तथा तीव्र हो जानेपर मोक्ष या भगवान‍्की प्राप्ति तुरंत हो जाती है। भगवान‍्की प्राप्तिमें विलम्ब इसीलिये हो रहा है कि उसकी इच्छा तीव्रतम और अनन्य तो है ही नहीं, अभी पूरी जागी भी नहीं है।

याद रखो—जबतक भोगोंमें सुख दिखायी देता है, भोगोंमें सुख है—इस प्रकारकी आस्था है, भोगोंके लिये जी ललचाता है, दूसरोंके पास भोगोंको देखकर उनके भाग्यकी सराहना होती है, उनसे ईर्ष्या होती है और वैसे ही भोग प्राप्त करनेके लिये मनमें व्याकुलता होती है, तबतक विवेकके द्वारा भोगका असली स्वरूप तुम्हारे सामने प्रकट हुआ ही नहीं। वह विषभरी मीठी मिठाई है, तुमने जाना ही नहीं। चाहे तुम्हारा नाम भक्त हो, महात्मा हो, संत हो, महापुरुष हो, त्यागी-वैरागी हो या कर्मयोगी हो। सच तो यह है कि जबतक तुम भोगोंमें सुख मानकर मनमें भोग-लालसाका पोषण कर रहे हो, तबतक तुम भोगोंके ही गुलाम हो। इसका दूसरा अर्थ है—तबतक तुम अगाध दु:ख-सागरमें ही गोते खाते रहोगे!

याद रखो—यदि तुम्हें मानव-जीवन सफल करना है, सच्ची सुख-शान्तिको प्राप्त करना है तो भोगोंकी ओरसे मुँह मोड़कर अपने जीवनका मुख भगवान‍्की ओर कर दो। फिर यदि तुम्हारे पास भोग रहेंगे तो वे तुम्हारी सेवाके लिये तुम्हारे पीछे-पीछे चलनेवाले होंगे। तुम उनकी ओर ललचाई दृष्टिसे नहीं देखोगे। तुम्हारी आँख रहेगी भगवान‍्की ओर, तुम्हारे पैर आगे बढे़ंगे भगवान‍्की ओर और तुम्हारा चित्त लगा रहेगा भगवान‍्की ओर।

याद रखो—इस अवस्थामें जो भोग तुम्हारे पीछे-पीछे चलेंगे; वे भी भगवत्पूजाकी सामग्री बनकर धन्य हो जायँगे। जिन भोगोंमें मनुष्यकी आसक्ति है और जो मनुष्यके भोग्य हैं, वे स्वयं नरकरूप हैं और भोगनेवालेको भी नरकमें ले जाकर दु:खाग्निमें पकानेवाले हैं। भोगोंसे विरक्ति करके भगवान‍्में अनुरक्त हो जाओ तो तुम्हारा जीवन भी सार्थक होगा और फिर, यदि कोई भोग तुम्हारे साथ रह सकें तो वे भी पवित्र, सार्थक हो जायँगे।