दिव्य सन्देश
इस समय मनुष्य-जातिकी बुरी दशा हो रही है। पार्थिव प्रलोभनोंकी अधिकतासे अभाव और अशान्तिकी आग धधक उठी है। इसी जड़ भोग-विलासकी प्रबलतासे धार्मिक जगत्में भी अन्दर-ही-अन्दर बड़ा अनर्थ होने लगा है। धर्मके नामपर आज जगत्में दानवी लीलाका ताण्डव नृत्य हो रहा है, उसे देखकर कलेजा काँप उठता है। परमात्मापर विश्वास रखकर संसारमें लोकहितार्थ अपना कर्तव्यकर्म करनेवालोंकी संख्या कम हो रही है। परस्पर एक-दूसरेका सर्वस्वान्त करनेके लिये जातियाँ और राष्ट्र अपना-अपना दृढ़ संगठन कर रहे हैं तथा वे अपने सुसंगठित साधनोंद्वारा दूसरोंकी स्वाभाविक उन्नतिके मार्गमें रोड़े अटकाकर उन्हें गिराने और पददलित करनेकी घृणित चेष्टा कर रहे हैं। दम्भपूर्ण आसुरी सम्पत्तिका विकास हो चला है। विषयासक्ति और कामनाने मनुष्यके ज्ञानको ढककर उसे अपने मनुष्यत्वके पदसे गिरानेका प्रयत्न आरम्भ कर दिया है। सभ्यताकी बाह्य सुन्दरतासे दम्भ, व्यभिचार, मिथ्या अभिमान और हिंसा-प्रतिहिंसा आदि दुर्गुण उत्पन्न होकर क्रमश: उन्नत हो जगत्की मनुष्य-जातिको आध्यात्मिक आत्महत्या करनेके लिये प्रोत्साहित कर रहे हैं। सर्वव्यापी, सर्वप्रिय, सर्वमय और सर्वधन परमात्माका आसन छोटा करके उसे एक छोटी-सी संकुचित सीमाके अन्दर रखनेकी व्यर्थ चेष्टा करके एक धर्मनामधारी दूसरे प्रतिपक्षी धर्मनामधारीके उस धर्मके नामका नाश कर अपने धर्मके नामकी निरर्थक उन्नति करना चाहता है।
धर्मके नामपर आज ढोंग और दम्भका पार नहीं रहा है। परमात्माको, उसके नामको और उसके दिव्य धर्मको भुलाकर जगत् आज ऊपरकी बातोंमें ही लड़ रहा है। इसीलिये न तो आज धर्मकी उन्नति होती है और न कोई सुखका साधन ही दीखता है। लोग समझते हैं कि ईश्वर केवल उनके निर्देश किये हुए स्थान और नियमोंमें ही आबद्ध है, अन्य सब जगह तो उसका अभाव ही है।
ऐसी स्थितिमें मनुष्य-जातिके कल्याणके लिये कुछ ऐसी बातें होनी चाहिये जिनपर अमल करनेसे सबका कल्याण हो सकता हो। इसी उद्देश्यकी पूर्तिके लिये निम्नलिखित सात बातें ‘‘दिव्य सन्देश’’- के रूपमें आपलोगोंके सम्मुख रखी जाती हैं। इनका पालन ईश्वरवादीमात्र कर सकते हैं और यह जोरके साथ कहा जा सकता है कि इनका पालन करनेसे उनका परम कल्याण होनेमें कोई सन्देह नहीं है।