जीवनमें उतारनेकी सोलह बातें
रक्षा करो पराधिकारकी,
करो त्याग अपना अधिकार।
यथासाध्य पर-आशाओंको
पूरा करो सहित सत्कार॥
ऐसा करके कभी किसीपर
करो नहीं कुछ भी अहसान।
कभी न कुछ भी बदला चाहो,
त्याग करो मनसे अभिमान॥
दूसरेके अधिकारकी रक्षा करो, अपने अधिकारका त्याग कर दो। जहाँतक हो सके, दूसरेकी आशाओंको सत्कारके साथ पूर्ण करो।
ऐसा करके न तो कभी किसीपर कुछ भी अहसान करो और न कभी कुछ भी बदला चाहो। मनसे अभिमानका त्याग कर दो।
प्राणि-पदार्थ-परिस्थितिसे तुम
रक्खो कभी न कुछ भी आस।
आशा करो आत्मसुखकी, जो
हर हालतमें रहता पास॥
जो सुख-सिद्धिहेतु करता है
अन्य किसीसे कुछ भी आश।
आत्मसिद्धि-सुखसे वह वंचित
रहता होता सदा निराश॥
किसी भी प्राणीसे, पदार्थसे या परिस्थितिसे तुम कभी कुछ भी आशा मत रखो। उस आत्मसुखकी आशा करो जो हर हालतमें तुम्हारे पास रहता है।
जो सुख और सफलताके लिये दूसरे किसीसे कुछ भी आशा करता है, वह जीवनकी सफलता तथा सुखसे वंचित रहता है और सदा निराश होता है।
समझो तुम जिन-जिन बातोंको
अपने हित मनसे प्रतिकूल।
उन्हें न बरतो कभी किसीसे,
समझो इसे धर्मका मूल॥
जिन-जिन बातोंको तुम अपने लिये प्रतिकूल समझते हो उन्हें दूसरे किसीके साथ कभी बर्तावमें मत लाओ। इसे धर्मका मूल समझो।
दोष न देखो कभी किसीके,
निन्दा-चुगलीको दो त्याग।
सद्गुण-सद्भावोंको देखो,
सेवा करो सहित अनुराग॥
कभी किसीके दोष मत देखो, किसीकी निन्दा-चुगली करना छोड़ दो। सबके सद्गुण और सद्भावोंको देखो और प्रेमके साथ सेवा करो।
अपने सभी सुखोंको समझो
दुखियोंसे है लिया उधार।
वितरण कर उनको दुखियोंमें
करो विषम ऋणका उद्धार॥
अपने सभी सुखोंको दु:खियोंसे उधार लिया हुआ समझो और उन्हें दु:खियोंमें वितरण करके भयानक ऋणसे अपना उद्धार करो।
पेट भरे उतने ही धनपर
अपना हक है, अपना जोर।
इससे अधिक माननेवाला
दण्डनीय है, हकका चोर॥
यज्ञ-शेष जो खाता है,
वह होता सब पापोंसे मुक्त।
अपने लिये कमाता केवल,
खाता पाप, पाप-संयुक्त॥
सबको सबका हक देकर जो
बचता, वही यज्ञ-अवशेष।
उससे जो जीवन-यापन करता
उसके अघ होते शेष॥
जितनेसे पेट भरे, उतने ही धनपर अपना हक है और अपना वश है। इससे अधिकको जो अपना मानता है, वह हकका चोर दण्डका पात्र है। जो ‘यज्ञसे बचा हुआ’ खाता है, वह सब पापोंसे मुक्त होता है; पर जो पापलिप्त मनुष्य केवल अपने लिये ही कमाता-खाता है, वह पाप खाता है। सबको सबका हक देनेके बाद जो बच रहता है, वही ‘यज्ञसे बचा हुआ’ है; उस (यज्ञशेष)-से जो अपना जीवन-यापन करता है, उसके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं।
बुरा न चाहो कभी किसीका,
चाहो भला, करो कल्यान।
सबके सुखमें ही सुख समझो,
सबके हितमें ही हित जान॥
कभी किसीका बुरा मत चाहो, सबका भला चाहो। सबका कल्याण करो, सबके सुखमें ही अपना सुख और सबके हितमें ही हित समझो।
प्रेम करो सुख दो सब ही को,
सबका करो सत्य सम्मान।
सबमें समझो निज आत्माको
या सबमें देखो भगवान॥
सबसे प्रेम करो, सभीको सुख दो। सबका सच्चा सम्मान करो, सबमें अपने आत्माको समझो या सबमें भगवान्को देखो।
प्रभुने जो कुछ दिया, परिस्थिति
दी जैसी उसमें हित मान।
मंगलमय प्रभुका विधान वह,
सत् उपयोग करो सुभ जान॥
प्रभुने जो कुछ दिया है, जैसी परिस्थिति दी है—वही मंगलमय प्रभुका विधान है। उसीमें अपना हित मानकर, शुभ समझकर उसका सदुपयोग करो।
प्रभुकी कृपा अनन्त सदा है,
उसपर करो पूर्ण विश्वास।
उनकी सहज सुहृदतासे ही
मिलती शान्ति परम अनयास॥
प्रभुकी तुमपर सदा अनन्त कृपा है, उसपर पूरा विश्वास करो। प्रभुकी सहज सुहृदतासे ही अनायास परम शान्ति मिलती है।
हैं अनित्य क्षणभंगुर दुखमय
जगके सारे प्राणि-पदार्थ।
उनमें स्वार्थ न देखो, साधो
मनसे सदा शुद्ध परमार्थ॥
जगत्के समस्त प्राणि-पदार्थ अनित्य, क्षणभंगुर और दु:खमय हैं। उनमें स्वार्थ मत देखो, मनसे सदा शुद्ध परमार्थ-साधन करो।
भोगोंकी आसक्ति-कामना
तजकर हो जाओ निष्पाप।
प्रभुकी सुखद शरणमें जाओ,
शान्ति मिलेगी अपने आप॥
भोगोंकी आसक्ति और कामनाको त्यागकर निष्पाप हो जाओ तथा प्रभुकी सुखप्रद शरणमें चले जाओ, अपने-आप ही शान्ति मिलेगी।
नित्य निरन्तर प्रभुका पावन
नाम जपो कर मन विश्वास।
मनमें सदा रखो प्रभुको ही,
रहो निरन्तर उनके पास॥
मनमें विश्वास करके नित्य-निरन्तर प्रभुके पवित्र नामका जप करो। मनमें सदा प्रभुको ही बसाये रखो और निरन्तर उनके पास रहो।
दुर्लभ, सुलभ हुआ प्रभुकी
अनुकम्पासे मानव-जीवन।
इसका लाभ उठा लो पूरा,
कर अर्पण मन-वाणी-तन॥
प्रभुकी कृपासे दुर्लभ मानव-जीवन सुलभतासे मिल गया है। मन, वाणी और शरीरको भगवान्के प्रति पूर्णरूपसे अर्पण करके इसका पूरा लाभ उठा लो।
सबमें सदा विराजित प्रभु हैं,
सबमें वे हैं एक समान।
सबमें अपने शुभ कर्मोंसे
अविरत पूजो श्रीभगवान॥
प्रभु सब जीवोंमें सदा ही विराजित हैं और वे सबमें एक समान हैं, अतएव अपने शुभकर्मोंके द्वारा सबमें उन श्रीभगवान्की निरन्तर पूजा करो।
आश्रय सभी छोड़कर मनसे,
होओ प्रभुके शरण अनन्य।
जन्म सफल होगा निश्चय ही,
हो जायेगा जीवन धन्य॥
मनसे सभी आश्रयोंको छोड़कर प्रभुके अनन्य-शरण हो जाओ, निश्चय ही तुम्हारा जन्म सफल और जीवन धन्य हो जायगा।