आप्तपुरुष और आप्तवाक्य

आपका कृपापत्र मिला। असलमें ‘आप्तवाक्य’ का अर्थ है ‘वेदवाक्य’। वह स्वत: प्रादुर्भूत अनादि अपौरुषेय दिव्य सनातन वाणी—जो समस्त ज्ञानका मूल है। यह वाणी ही वेद है। देश, सभ्यता, परिस्थिति और मानव-वाक्-यन्त्रके संगठन-भेदसे वह नाना आकार-प्रकारोंमें प्रकाशित होनेपर भी मूलत: एक है; क्योंकि वही शाश्वत है, सत्य है। वाक्य दो तरहके माने गये हैं—‘सत्य’ और ‘मिथ्या’। वाक्यके सत्य-मिथ्याका निर्णय करना सहज नहीं है, तथापि उसके ऐसे कुछ लक्षण हैं, जिनसे पहचाननेमें सुविधा होती है। सत्य सत्य ही है। उसमें ह्रास-वृद्धि, अवनति-उन्नति, आरोहण-अवतरण नहीं है, वह नित्य है—लय और क्षयरहित है। महाप्रलयमें भी उसका नाश नहीं होता। वह अनादिकालसे अनन्त कालतक समस्त लोकोंके प्रलयकालमें भी वर्तमान रहता है। वह सर्वकालोंसे अतीत, समस्त कालोंमें सर्वदा वर्तमान कालके भी आधाररूपमें रहता है। उसकी सत्ता समस्त स्थूल-सूक्ष्मके सृजन-संहार और उसके पहले-पीछे भी अखण्ड रहती है। वही अभ्रान्त ज्ञानका आधार है। ऐसा सत्य जिस वाणीसे प्रस्फुटित होता है, उस वाणीका नाम ‘आप्तवाक्य’ है। यह आप्तता जैसे वाणीमें है, वैसे ही जिस पुरुषका आश्रय करके ऐसी वाणी प्रकट होती है, उस पुरुषमें भी है। भ्रम, प्रमाद, विप्रलिप्सा (दूसरोंको छलनेकी इच्छा) और करणापाटव (इन्द्रियोंकी अशक्ति—कानोंका बहरापन, जीभका गूँगापन, आँखोंका अन्धापन आदि) ये चार दोष जिसमें नहीं हैं, वह ‘आप्त’ है। ऐसा पुरुष जो कुछ बोलता है, वह सर्वथा पर-प्रतारणेच्छारहित, इन्द्रियोंकी आसक्तिसे रहित, भ्रम-प्रमादहीन, परम सत्य होता है। आप्त पुरुषकी वाणीसे वेदका ही उच्चार होता है, चाहे भाषा कोई-सी हो। वाक्यकी आप्ततामें भ्रम-प्रमादशून्यताके अतिरिक्त चार बातें और होती हैं—(१) वाक्य अर्थकी अपेक्षावाले होते हैं। (२) शब्दोंका अर्थ-प्रकाशक क्रमोच्चार होता है, जैसे किसीने आज कहा ‘हमने’, कल कहेगा ‘रोटी खायी’ तो यह ठीक नहीं। जिस समय ‘हमने’ कहा उसी समय ठीक उसके बाद ही ‘रोटी खायी’ कहना चाहिये। (३) वाक्यका अर्थ प्रत्यक्ष और युक्तिसंगत होना चाहिये। जैसे ‘स्त्री बाँझ है’ ऐसा कहना ठीक है परंतु ‘माँ बाँझ है’ कहना ठीक नहीं; क्योंकि पुत्रके रहते माँका बाँझ होना नहीं बनता। (४) वक्ताका मनोगत भाव जो शब्दज्ञानका प्रधान अंग है। इनके क्रमश: नाम हैं—१-आकांक्षा, २-क्रमबद्धता, ३-औचित्य और ४-तात्पर्य। वक्ताका तात्पर्य अर्थात् उसका मनोगत भाव ही असलमें वाक्यका असली मापदण्ड है। जिस वाक्यका कोई तात्पर्य नहीं, वह वाक्य आकांक्षा, क्रमबद्धता और औचित्यके अनुसार उच्चारित होनेपर भी प्रमाणरूप नहीं होता। ‘इसकी माँ तो बाँझ ही है।’ इस वाक्यमें यदि तात्पर्य न हो तो यह सर्वथा व्यर्थ है और तात्पर्य होनेपर बड़ा सुन्दर अर्थ रखता है। तात्पर्य यह कि ‘इसे प्राप्तकर माँने जरा भी सुख नहीं पाया। वह तो पुत्र होते भी बाँझ है ऐसा पुत्र हुआ-न-हुआ एक-सा है।’

इस प्रकार भ्रम, प्रमाद, विप्रलिप्सा और करणापाटवरहित पुरुषके द्वारा जो आकांक्षा, औचित्य, क्रमबद्धता और तात्पर्ययुक्त, अभ्रान्तज्ञान-की एकमात्र आधार, यथार्थ, नित्य सत्य वाणीका प्रस्फुटन होता है, उसीका नाम ‘आप्तवाक्य’ है। आप्तवाक्य ही परम सत्य और अखण्ड सत्तात्मक है। आप्तवाक्यसमूह ही ‘वेद’ है। इसीलिये वेदवाक्य प्रमाण है। वेद अपौरुषेय है, परंतु वेदार्थ-ज्ञानका विश्लेषण और प्रकाशन आप्तपुरुषोंके द्वारा हुआ है, अतएव उनकी वाणी भी वेद ही है। ऐसे आप्तपुरुष दो हैं—एक परमेश्वर और दूसरे परमेश्वरके कृपापात्र परमेश्वरीय ज्ञानको प्राप्त महापुरुष! प्रत्यक्ष और अनुमानमें भ्रम होता है, परंतु आप्तवाक्य सर्वथा निर्भ्रान्त सत्य है। इसीसे ‘आप्तवाक्य’ परम प्रमाण है।