अभी तो जगत् पतन तथा दु:खकी ओर ही जा रहा है

सप्रेम हरिस्मरण! आपका कृपापत्र मिल गया। विलम्बसे उत्तर जा रहा है क्षमा करें। मनुष्य जो यह चाहता है ‘पहले प्रतिपक्षी मेरे साथ अच्छा बर्ताव करेगा, तब मैं उसके साथ अच्छा बर्ताव करूँगा।’ यह उसकी भूल है; क्योंकि जैसा वह चाहता है, वैसा ही उसका प्रतिपक्षी भी चाहता होगा। फिर अच्छाईकी पहल कौन करेगा? बुद्धिमानी तो इसीमें है कि दूसरा बुरा करे तब भी हम तो उसका भला ही करें। भलाईकी पहल करनेमें संकोच और लज्जा होना तो पाप-बुद्धिका ही परिचायक है। वस्तुत: कल्याणकामी पुरुषको कभी भी किसीके साथ असत् व्यवहार करना ही नहीं चाहिये। कोई मेरे साथ बुराई करता है, इसलिये बुराईको बुराई मानता और कहता हुआ भी अभिमानवश, मैं भी उसके प्रति बुराई करूँ। दूसरा जहर खाता है तो मैं भी खाऊँ। यह कोई समझदारीकी बात नहीं है। भला मनुष्य अपनी भलाईको कैसे छोड़े? वह अपने स्वभावसे क्यों च्युत हो? असलमें अपना स्वार्थ भी भलाई करनेमें ही है। प्रत्येक मनुष्यके लिये यही बात है। फिर जो परमार्थके साधक हैं, उनको तो संतोंका आदर्श ग्रहण करना चाहिये। श्रीरामचरितमानसमें भगवान् श्रीशंकरजीके वचन हैं—

उमा संत कइ इहइ बड़ाई।

मंद करत जो करइ भलाई॥

‘संतकी यही महिमा है कि वह बुराई करनेपर भी उसके साथ भलाई करता है।’ फिर उन्होंने चन्दनकी उपमा देकर समझाया है—जो कुठार चन्दनको काटता है, चन्दन उस कुठारकी लकड़ीकी मूठमें अपना गुण सुगन्धि भर देता है—

काटइ परसु मलय सुनु भाई।

निज गुन देइ सुगंध बसाई॥

इसलिये बुराई करनेवालेके साथ भलाई ही करनी चाहिये और सात्त्विक साहसके साथ उसकी पहल भी अपनी ओरसे ही होनी चाहिये। इसमें जरा भी संकोच या अपमानका बोध नहीं होना चाहिये। इस अपमानका यदि पुरस्कार प्राप्त करना हो तो भगवान‍्के यहाँसे बड़ा सुन्दर पुरस्कार भी मिल सकता है।

आपने लिखा कि ‘विकासवादके सिद्धान्तके अनुसार उत्तरोत्तर उन्नति होनी चाहिये और भौतिक उन्नति हो भी रही है। पर लोगोंके मनोंमें पाप-भावना बढ़ती जा रही है तो क्या भौतिक उन्नतिको ही उन्नति मानना चाहिये और यदि ऐसा नहीं है तो इसका क्या परिणाम होगा?’

इसका उत्तर यह है कि मेरी समझसे तो यह विकासवादका सिद्धान्त ही सर्वथा भ्रमपूर्ण है। कुछ ही सहस्र वर्ष पूर्व जंगलोंमें रहनेवाली असभ्य जातिके लोग वर्तमान भौतिक उन्नतिको देखकर ऐसा कहें तो वे कह सकते हैं; परंतु भारतवर्षकी अत्यन्त प्राचीन संस्कृतिकी सत्ता और महत्ताको जाननेवाले लोग ऐसा कभी नहीं मान सकते। हमारा तो यह सिद्धान्त है कि अच्छा-बुरा समय चक्रवत् आता-जाता रहता है। सत्ययुगके बाद क्रमश: कलियुग आता है और कलियुगके बाद पुन: सत्ययुग। इस समय कलियुगके प्रारम्भका सन्धिकाल चल रहा है। अतएव इस समय जगत‍्की गति वस्तुत: उन्नतिकी ओर नहीं, पर अवनतिकी ओर है। उन्नति-अवनतिकी कसौटी चमत्कारपूर्ण भौतिक साधनोंका आविष्कार नहीं है। उसकी सच्ची कसौटी है समष्टिके मनकी उच्चतम सात्त्विक स्थिति। यदि समष्टिमें गीतोक्त दैवी सम्पत्ति बढ़ रही है तो समझना चाहिये, उन्नति हो रही है और आसुरी सम्पत्ति बढ़ रही है तो अवनति हो रही है। भौतिक उन्नतिसे न इसका विरोध है न मेल। बड़ी-सी-बड़ी भौतिक सम्पत्तिके साथ भी दैवी सम्पत्ति रह सकती है और भौतिक सम्पत्तिके सर्वथा अभावमें भी आसुरी सम्पत्ति आ सकती है। हमारे प्राचीन युगोंमें भौतिक सम्पत्तिकी पूर्ण प्रचुरता थी; परंतु उसका प्रयोग होता था सात्त्विक-भावापन्न पुरुषोंकी सुबुद्धिके द्वारा वास्तविक जनकल्याणकारी कार्योंमें। आजकी भौतिक सम्पत्ति ऐसी नहीं है। अणुशक्तिका आविष्कार भौतिक उन्नतिका एक अद्‍भुत उदाहरण है, परंतु मनुष्यकी राक्षसी और आसुरी बुद्धिके कारण उसका प्रथम प्रयोग होता है क्रूरतापूर्ण विपुल जनसंहारमें! आज भी बड़े-बड़े वैज्ञानिकोंके मस्तिष्क आसुरी बुद्धिकी प्रेरणासे इसी नर-संहारके अनुसन्धानमें लगे हैं और इसमें बड़े गर्वका अनुभव कर रहे हैं। आसुरी सम्पत्तिका अवश्यम्भावी परिणाम श्रीभगवान् बतलाते हैं—

अनेकचित्तविभ्रान्ता मोहजालसमावृता:।

प्रसक्ता: कामभोगेषु पतन्ति नरकेऽशुचौ॥

तानहं द्विषत: क्रूरान्संसारेषु नराधमान्।

क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु॥

आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि।

मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिम्॥

(गीता १६। १६, १९, २०)

‘वे अनेक प्रकारकी कामनाओंसे भ्रमितचित्त हुए, मोहजालमें फँसे हुए और विषयोंमें अत्यन्त आसक्ति रखनेवाले लोग अपवित्र नरकोंमें गिरते हैं। उन द्वेष-हृदय, क्रूरकर्मा, पापपरायण नराधमोंको मैं संसारमें बार-बार आसुरी योनियोंमें गिराता हूँ। अर्जुन! वे मूढ़ मनुष्य (मानव-जीवनके चरम और परम फलरूप) मुझ भगवान‍्को न पाकर कई जन्मोंतक लगातार आसुरी योनिको प्राप्त होते हैं और फिर उससे भी अधिक बहुत नीची अधम गतिको जाते हैं—नरकाग्निमें पचते हैं।’

इससे यह सहज ही सिद्ध है कि जिस अनुपातसे आसुरी सम्पत्ति बढ़ रही है, उसी अनुपातसे दु:ख भी बढ़ेगा। किसी विषयके विचार पहले मनमें आते हैं, फिर वाणीमें और तदनन्तर वैसा कार्य होता है एवं तब उसीके अनुसार फल होता है। आज जगत‍्के अधिकांश लोगोंके मनोंमें दम्भ, दर्प, द्वेष, काम, क्रोध, लोभ, हिंसा, प्रतिहिंसा, मान, अभिमान, ईर्षा और असूया आदिके कुत्सित विचार बड़ी तेजीसे बढ़ रहे हैं और तदनुसार चोरी, असत्य, लूट, हिंसा, व्यभिचार आदि असत् कार्योंकी मात्रा भी बढ़ रही है। इसी अनुपातसे बीजफल-न्यायके अनुसार इनका भयानक परिणाम भी अवश्य होगा! यहाँ भी दु:ख बढ़ेंगे और परलोकमें भी दु:खोंकी ज्वाला अधिक धधकेगी। भीषण दु:खोंकी आगमें जलनेके बाद सम्भव है, कलियुगकी महादशामें भी कुछ समयके लिये सत्ययुग-त्रेताका प्रत्यन्तर आवे। पर उसके पहले एक बार तो भीषण पतन और दु:खोंका आना अनिवार्य-सा प्रतीत होता है!