अभिनेताकी भाँति अपना पार्ट कीजिये

आपके कार्डसे मैं आपकी व्यथाको ठीक समझ नहीं सका। तथापि आपका हृदय व्यथित है—इतना अवश्य मालूम हुआ। व्यथित हृदयको शान्ति देनेवाले तो एकमात्र श्रीभगवान् ही हैं। उन्हींका आश्रय लीजिये। इस जगन्नाटकके सूत्रधार वे ही हैं। यहाँ जो भी परिस्थितियाँ हैं, उन्हींकी प्रस्तुत की हुई हैं। यह नाटक है न, इसमें हर्षके भी पार्ट आते हैं और शोकके भी। इन्हें एक तटस्थ दर्शककी तरह देखते रहिये और प्रभु जैसी ड्यूटी आपको सौंपें, आप भी वैसा ही अभिनय करते रहिये। नाटकके सुख-दु:खोंका भला क्या मूल्य? वहाँ तो मालिक जैसा पार्ट देता है, अभिनेता वैसा ही अभिनय कर देते हैं। पार्ट-वितरणमें अभिनेताकी रुचि नहीं देखी जाती। वह तो सूत्रधार ही निश्चय करता है कि किसे क्या पार्ट देना है। अभिनेताका काम तो अपने अभिनयको ठीक-ठीक उतार देना है, इसीसे मालिककी प्रसन्नता होती है। आपको भगवान‍्ने व्यथाकी परिस्थितिमें रखा है तो आप धैर्यसे काम लीजिये। धैर्यसे आप व्यथितोंकी भी सहायता कर सकेंगे और स्वयं भी शान्त रहेंगे।

आशा है इन पंक्तियोंसे आपको कुछ सन्तोष हो सकेगा।