अच्छे और बुरे विचार

भाई साहेब! सप्रेम हरिस्मरण। आपका कृपापत्र मिले बहुत दिन हो गये। क्षमा करें। श्रीमद्भगवद‍्गीतामें भगवान‍्ने कहा है—श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्ध: स एव स:॥ (१७। ३) यह पुरुष श्रद्धामय है और जैसी जिसकी श्रद्धा है वैसा ही उसका स्वरूप है, असलमें श्रद्धाके अनुसार मनुष्यके विचार होते हैं और विचारोंके अनुसार ही उसका स्वरूप होता है। मनुष्यके विचार उसके इतने अधिक समीप हैं, जितने समीप उसके हाथ-पैर और आँख-कान आदि अंग भी नहीं हैं। मनके विचारोंका आत्माके साथ साक्षात् सम्बन्ध है, जबकि कर-चरणादि तथा नेत्र-श्रोत्रादि तो मनके सेवकमात्र हैं।

आपके अच्छे विचार आपके परम मित्र हैं और बुरे विचार आपके परम शत्रु! जिस समय आपके मनमें बुरे विचार आते हैं और आपको चिन्तित, भयान्वित और आशंकित कर डालते हैं, उस समय आप प्राय: भूल जाते हैं कि अब क्या करना चाहिये; परंतु असलमें वे बुरे विचार इसीलिये आते हैं कि आप उन्हें आने देते हैं, बल्कि बुलाते हैं और रहने देते हैं।

संसारमें भले-बुरे अनुभव होते ही रहते हैं, बहुत बार तो मनुष्य अपने ही मनकी कल्पनाके अनुसार भलेको बुरा और बुरेको भला मान बैठता है, पर मान लें कि किसीने आपके साथ कभी बुराई भी की हो, तो भी उसके लिये विषाद, क्रोध और बदला लेनेके विचार आपको अपने मनमें नहीं आने देने चाहिये। यदि वैसे विचार आते हैं और आप उन्हें रहने देते हैं तो निश्चय मानिये कि आप अपना अकल्याण कर रहे हैं। इस प्रकारके विचारोंसे न तो आपके हृदयका घाव ही भरेगा और न चोट पहुँचानेवालेको ही वस्तुत: कोई ऐसा दण्ड मिलेगा, जिससे वह फिर ऐसा अपराध न करे।

विषाद, क्रोध और प्रतिशोधके विचार आपके मनमें निराशा, मूर्खता और पैशाचिकताके विचारोंको बुलावेंगे, उनसे आपका जीवन और भी विषादमय और अन्धकारपूर्ण हो जायगा। जबतक आपके मनमें विषादयुक्त स्थितिका चिन्तन बना रहेगा, तबतक आपका विषाद बढ़ता ही जायगा। पर यदि आप चेष्टा करके किसी सुखमय स्थितिका स्मरण कर लेंगे और वह आपके मनमें आ जायगी तो आप तुरंत सुखी हो जायँगे।

कभी-कभी ऐसा देखा जाता है कि पुत्रशोकमें निमग्न पुरुष बातचीतमें किसी प्रसंगपर जब पुत्र-शोकको भूलकर क्षणभरके लिये किसी सुखमय स्थितिका चिन्तन करने लगता है, तब उसके मुखपर हँसीकी रेखा खिंच जाती है और दूसरे ही क्षण वह लोगोंकी ओर देखकर लज्जित-सा हो जाता है।

अतएव मनुष्यको निरन्तर सुखद वस्तुओंका स्मरण करना चाहिये। असलमें मनुष्यकी आत्माका स्वरूप एकान्त आनन्दमय ही है और भक्तके भगवान् भी सचमुच अपने भक्तको सदा सुखी ही देखना चाहते हैं। देखा जाय तो सर्वत्र और समस्त वस्तुओंमें आनन्द भरा है। सूर्यके प्रकाशमें, वायुके संचरणमें, प्रकृतिके सौन्दर्यमें, चन्द्रमाकी ज्योत्स्नामें, जलकी शीतलतामें, मित्रों और परिवारके प्रति होनेवाले हमारे प्रेममें सर्वत्र आनन्द-ही-आनन्द है। हम आनन्दको भूलकर सदा दु:खका ही चिन्तन करते हैं, इसीसे हमें सभी जगह विषाद दीखता है। यदि हम नित्य-निरन्तर विषादयुक्त विचारोंके बदले आनन्दमय विचारोंका आवाहन किया करें तो हमारी विषादकी बुरी आदत मिट जायगी और आनन्दकी अच्छी आदत पड़ जायगी। फिर हम हर एक स्थितिमें सुखी रह सकेंगे। आप यह निश्चय मानिये कि सच्चिदानन्दमय भगवान् सर्वथा आपके साथ हैं, आपके पास हैं, वे आपके नित्य सुहृद् हैं, उनका प्यार आपकी ओर सदैव उमड़ा चला आ रहा है और वे आपके जीवनको विशुद्ध आनन्दमय, विज्ञानमय और प्रेममय बना देनेके लिये सदा समुत्सुक हैं।

ऐसे सर्वसमर्थ, सर्वज्ञ, परम सुहृद् भगवान‍्के होते आप यदि विषादमय विचारोंको मनमें स्थान देते हैं तो एक प्रकारसे परम सुहृद् सुखमय भगवान‍्का तिरस्कार करते हैं और दु:खोंको निमन्त्रण देकर बुलाते हैं।

आप भगवान‍्का आश्रय करके आनन्द, दया, प्रेम, सेवा और शान्ति आदि विचारोंको बार-बार मनमें लाइये। जीवनकी दु:खमयी घटनाओंको भूल जाइये—उसमें जो प्रभुने कृपा करके आपको सुख दिया है, सुखकी सामग्री दी है, उनका स्मरण कीजिये। दूसरोंके अपराधोंको याद मत कीजिये। दूसरोंके प्रेम, सदाशयता और उदारताका स्मरण कीजिये। आप यह निश्चय मानिये कि आप ऐसा कर सकते हैं। आप अपने मनके स्वामी हैं—गुलाम नहीं हैं। विचारोंकी शुद्धि ही मनकी शुद्धि है। भगवान‍्ने पाँच प्रकारसे मानसतपकी सांगता बतलायी है—

मन:प्रसाद: सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रह:।

भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते॥

(गीता १७।१६)

(१) विषाद, भय, चिन्ता, शोक, व्याकुलता, उद्विग्नता आदि दोषोंसे रहित एवं हर्ष, निर्भयता, निश्चिन्तता, आनन्द, स्थिरता आदि गुणोंसे युक्त मनकी प्रसन्नता; (२) रूखापन, डाह, हिंसा, प्रतिशोध, कठोरता, निर्दयता आदि उग्र तथा जलन पैदा करनेवाले दोषोंसे रहित एवं स्नेह, मुदिता, प्रेम, उपकार, विनय और दया आदि गुणोंसे युक्त मनकी सौम्यता; (३) जागतिक पदार्थ, जागतिक स्थिति, दूसरोंके व्यवहार, उन्नति-अवनति, दोष-गुण आदि व्यर्थ तथा अनावश्यक चिन्तनसे रहित एवं भगवान‍्के गुण, प्रभाव, तत्त्व, रहस्य, लीला, नाम, धामके तथा संत पुरुषोंके सद्भावोंके नित्य मननसे युक्त मनका ‘मौन’; (४) मनके निरन्तर चाहे जहाँ जाने और चाहे जिस बातको सोचते रहनेकी बुरी आदतका न होकर उसका अपने वशमें होना, जहाँ लगावें वहीं लगना और स्थिर रहना—इस प्रकारका मनका विनिग्रह और (५) राग-द्वेष, काम-क्रोध, लोभ-मोह, मद-मत्सर, ईर्ष्या-वैर, घृणा-तिरस्कार, शोध-प्रतिशोध, असूया-असहिष्णुता, इष्टविस्मृति और अनिष्टचिन्तन आदि दुर्भावोंसे रहित और विराग, समता, निष्कामता, क्षमा, संतोष, ज्ञान, नम्रता, सरलता, सदाशयता, हितकारिता, सेवा, सम्मान, बुरेका भला करनेकी स्वाभाविक भावना, गुणदर्शन, सहिष्णुता, भगवान‍्की नित्य स्मृति और अनिष्ट वस्तुमात्रकी नित्य विस्मृति आदि सद्भावोंसे युक्त मनकी शुद्धि—इस प्रकार ये पाँच मानस तप कहे गये हैं।’

उपर्युक्त भगवदाज्ञाके अनुसार मनमेंसे अशुभ—बुरे विचारोंका नित्य बहिष्कार तथा शुभ—अच्छे विचारोंका नित्य सत्कार, स्वागत, संरक्षण और संवर्धन करते रहना चाहिये। आप यदि ऐसा अभ्यास करने लगें तो देखेंगे आपका स्वभाव ही बदल जायगा और आज जहाँ आपको सर्वत्र विषाद, दु:ख, निराशा और क्रोधके ही कारण नजर आते हैं, वहाँ आपको सर्वथा आनन्द, सुख, आशा और शान्तिके सतत पवित्र दर्शन होंगे। इससे आप तो सुखी हो ही जायँगे, आपकी जिनको हवा लगेगी, उनमें भी आपके विचारोंका संक्रमण होगा और इस प्रकार उन्हें भी आप न्यूनाधिकरूपमें सुखी बना सकेंगे। यह उपाय आपके हाथमें है और आप चाहें तो इसका प्रयोग आजसे ही आरम्भ कर सकते हैं।