आजके मठ और आश्रम

प्रिय महोदय! आपका कृपापत्र मिला। आपने लिखा कि ‘मैं कई वर्षोंसे एकान्तमें रहकर भजन-ध्यान करनेकी इच्छासे विविध आश्रमों और मठोंमें रहता आया हूँ, पर मुझे कहीं भी शान्ति नहीं मली। जहाँ गया, वहीं प्रपंच पाया और उकताकर मुझे वहाँसे भागना पड़ा।’ बात ठीक है। शान्ति किसी स्थानविशेषमें नहीं है, शान्ति तो आपके अंदर है और वह अनुकूल वातावरण मिलनेपर कहीं भी प्रकाशित हो सकती है। आजकलके आश्रमों और मठोंमें अधिकांशकी स्थिति अच्छी नहीं है। इस विषयमें पिछले दिनों स्वामी असीमानन्दजी सरस्वतीने एक लेख लिखा था, उसके कुछ अंशका अवतरण नीचे दिया जाता है, इससे आजकलकी ऐसी संस्थाओंकी दशाका अनुमान लगाया जा सकता है। वे लिखते हैं ‘.......अतीत भारतका आडम्बरशून्य एक आश्रम भारतवर्षको जो अमूल्य सम्पत्ति दान कर जाता था, आजके सैकड़ों मठ-मन्दिर और आश्रम क्या वैसी सम्पत्ति दे सकते हैं? आज महलों-पर-महल बन रहे हैं, प्रचार-पर-प्रचार चल रहा है, पर सच्चे आश्रमोंका आदर्श मानो क्रमश: इस कोलाहल और आडम्बरमें लुप्त हुआ जा रहा है। × × × शान्ति और आनन्दकी धाराका वितरण करनेके लिये जगत‍्के हितार्थ जिसकी स्थापना की गयी है, वहाँ आगे चलकर मिलती है दलबंदीकी विषक्रिया और वैयक्तिक प्रधानताकी दारुण दावाग्नि! मनुष्य शान्तिकी आशासे मनके व्याकुल आवेगको लेकर वहाँ जाता है, पर कुछ दिनोंमें ही वहाँसे भागनेके लिये व्याकुल हो उठता है।

‘धर्मलाभकी आशासे आश्रमका निर्माण किया जाता है, आश्रमका अवलम्बन करके धर्मसाधनका संकल्प किया जाता है; परंतु आगे चलकर वह आश्रम धर्म-लाभका अवलम्बन नहीं रह जाता, वहाँकी धर्मसाधना आश्रमके संगठनका उपकरण बन जाती है और वह आश्रम बन जाता है अर्थागमन और अपने स्वार्थलिप्साकी पूर्तिका साधन। फलस्वरूप कहाँ तो हम साधना करके अपने सारे बन्धनोंको काटकर मुक्तिके मार्गपर चलना चाहते थे और कहाँ उसके बदलेमें हमारा वह आश्रम हमें हजारों नये-नये बन्धनोंमें बाँधनेवाला क्षेत्र बन जाता है। आश्रम होता है अर्थागमनका केन्द्र। आश्रममें धन बढ़ता है, आश्रमवासियोंकी संख्या बढ़ती है, नाम होता है, यश भी होता है, घर बनते हैं, गाड़ी-मोटरें आती हैं और ऐश्वर्य बढ़ जाता है; परंतु जब अपने भीतरकी ओर देखा जाता है, तब दिखायी देता है कि अन्तरका सारा ऐश्वर्य—अन्तर्देवता हमारी बिना ही जानकारीके कभीका लुप्त हो गया है। धर्मका दम्भ करके, जनहितके नारे लगाकर जड-जगत‍्के ऐश्वर्यमें चाहे हमें सम्राटत्व मिल गया हो; परंतु साधनाके राज्यमें तो हम दिवालिये हो गये हैं! हमारे अन्तरका दैन्य अपनी विशालताको लेकर प्रतिपल हमारा उपहास करता है!’

यह है आजके अधिकांश आश्रमों और मठोंकी स्थिति, पर इसका यह अर्थ नहीं है कि सभी आश्रम ऐसे ही हैं। अच्छे आश्रम भी होंगे; पर वैसे बहुत थोड़े हैं। इसीसे मैं तो सदा यही सलाह दिया करता हूँ कि घरमें रहकर भगवान‍्का भजन कीजिये। घरमें जितनी सुविधा है, उतनी बाहर कहीं नहीं मिलेगी। मेरा तो अब भी यही निवेदन है कि आप बाहर भटकना छोड़कर घरपर रहिये। त्यागपूर्वक रहनेसे घरवाले भी आपपर प्रसन्न रहेंगे। घरवालोंकी अप्रसन्नता तो स्वार्थसे ही होती है। उनके स्वार्थमें आप बाधक न होंगे तो वे आपसे प्रसन्न रहेंगे तथा आप सुखपूर्वक साधन-भजनका अभ्यास भी कर सकेंगे। आपको कहीं शान्ति नहीं मिली, चित्त उकता गया। इसका कारण यह भी हो सकता है कि आपके चित्तमें ही कहीं कोई दोष हो। आपके जिस चित्तने घरमें अनुकूलता न पाकर जैसे वहाँसे आपको भगाया, वैसे ही उसीने इन आश्रमोंमें भी अनुकूलता न पाकर आपको उकताया हो तो क्या आश्चर्य है। किसीमें दोष न होनेपर भी वह हमारी दृष्टिमें प्रतिकूल हो सकता है। अत: मेरी यह प्रार्थना है कि आप भगवान‍्का मंगल-विधान समझकर सदा सर्वत्र अनुकूलताकी भावना कीजिये। अनुकूलता हो जानेपर फिर आप किसी भी परिस्थितिमें शान्तिपूर्वक रह सकेंगे।