अनन्यता
प्रिय महोदय! सादर सप्रेम हरिस्मरण। कृपापत्र मिला। उत्तरमें निवेदन है कि रामायणका यह कथन सर्वथा सत्य है कि शिवद्रोही रामभक्त अथवा रामद्रोही शिवभक्त नरकमें पड़ते हैं। साथ ही ‘कल्याण’ का वह लेख भी सत्य है, जिसमें किसी एक देवविशेषकी ही अनन्य उपासनापर जोर दिया गया है। इन दोनोंमें वस्तुत: कोई विरोध नहीं है। किसी एक स्वरूपकी उपासनाका यह अर्थ नहीं कि दूसरे स्वरूपसे वह द्रोह करे; क्योंकि दूसरे सभी स्वरूप वस्तुत: उसी भगवान्के हैं, जिसकी वह उपासना करता है। अनन्य उपासकका यही कर्तव्य है कि वह अपने इष्ट-स्वरूपकी उपासना करे और यह माने कि शेष सभी स्वरूप—जिनकी अन्यान्य लोग उपासना करते हैं, उसीके इष्टके हैं। जैसे श्रीरामका उपासक माने कि मेरे भगवान् राम ही शिव बने हुए हैं और शिवका उपासक माने कि मेरे भगवान् शिव ही राम बने हुए हैं। तत्त्वत: शिव और राममें कोई अन्तर भी नहीं है। लीलाभेदसे एकके ही दो या अनेक रूप हैं। हम यदि किसी पुरुषके मैजिस्ट्रेटके रूपमें तो उसकी सेवा करें और उसके ब्राह्मणरूपमें उसे गाली दें तो क्या वह हमपर प्रसन्न होगा। इसी प्रकार भगवान्के एक स्वरूपसे प्रेम और दूसरे स्वरूपसे द्रोह करनेवाला कभी भगवान्को प्रसन्न नहीं कर सकता। अत: भगवान् विष्णु या शिवमेंसे एकके प्रति अनन्य भक्ति रखते हुए भी दूसरेकी निन्दा नहीं करनी चाहिये। यही रामायणका कथन है और यही बात ‘कल्याण’ के लेखमें कही गयी है। शेष भगवत्कृपा।