अपने दोषोंसे ही दु:ख होता है

सप्रेम हरिस्मरण! आपका पत्र मिला। आपने जो कुछ लिखा है, उससे यही विदित होता है कि आपके प्रति उन लोगोंका बर्ताव अच्छा नहीं है। इसीसे आपको क्रोध होता है और आपका चित्त अशान्त रहता है; परंतु आपके शब्दोंसे यह भी सिद्ध होता है कि आप उनके सुखसे दु:खी रहते हैं। उन लोगोंके प्रति आप घृणा रखते हैं और क्रोधका तो आप किसी भी समय त्याग नहीं कर पाते। मेरी समझसे आपके अपार दु:खमें जितना उनका दुर्व्यवहार कारण है, उससे अधिक कारण हैं आपके मनमें बसनेवाले ये आपके दोष ही। महात्मा श्रीविदुरजीने कहा है—

ईर्षुर्घृणी न संतुष्ट: क्रोधनो नित्यशङ्कित:।

परभाग्योपजीवी च षडेते नित्यदु:खिता:॥

(महा० उद्योग० ३३। ९०)

‘जो ईर्ष्या करते हैं (दूसरेकी उन्नति या सुख देखकर जलते हैं), घृणा करते हैं (सभीमें दोष देखकर उनको बुरा समझते हैं), असंतुष्ट हैं (किसी भी स्थितिमें संतोष नहीं करते), क्रोधी स्वभावके हैं, सदा शंकित रहते हैं (सब ओर संदेहकी दृष्टिसे देखते हुए डरते रहते हैं) और दूसरेके भाग्यपर जीवन-निर्वाह करते हैं, ये छहों सदा दु:खी रहते हैं।’

मेरे एक परिचित सज्जन हैं, वे सदा उदास रहते हैं। उनमें भी यही दोष है कि वे सदा असंतोषकी आगमें जला करते हैं, सदा सशंकित रहते हैं और स्वावलम्बी नहीं बनना चाहते। मैं उन्हें समझाया भी करता हूँ; पर उनकी समझमें बात आती नहीं और फलत: उनका दु:ख भी नहीं मिटता।

मनुष्य बहुधा अपने ही दोषोंसे दु:खी होता है। अपने मनकी दूषित दृष्टि दूसरोंमें दोषारोपण करके उन्हें दोषी देखती है और परिणाममें घृणा, द्वेष और भी बढ़ जाते हैं, जिनसे अपना ही दु:ख बढ़ता है। याद रखना चाहिये, जब हमारे मनमें किसीके प्रति द्वेष और क्रोध उत्पन्न होता है तो उसी समय हम जलने लगते हैं। वह तो तब जलता है, जब हमारे मनके इन दोषोंकी कोई क्रिया बाहर प्रकट होती है।

आप अपने मनमें गहराईसे देखिये। अवश्य ही आपको ये दोष दिखायी देंगे। उन लोगोंके बुरे बर्तावके इलाज करनेकी चिन्ता छोड़कर पहले अपने इन मानस रोगोंको दूर भगानेका प्रयत्न कीजिये। जब आपके ये रोग नष्ट हो जायँगे, तब आपको उन लोगोंके दुर्व्यवहारमें अपने-आप ही कमी प्रतीत होने लगेगी; क्योंकि अभी तो आप द्वेष या क्रोधका चश्मा चढ़ाकर उनको देखते हैं, इससे आपकी दृष्टि यथार्थ नहीं है; फिर आपकी दृष्टि यथार्थ हो जायगी। उस समय जो जैसा है, ठीक वैसा ही आपको दिखायी देगा। इसलिये स्वाभाविक ही उनके दोष कम दीखेंगे। फिर उनके रहे-सहे दोष आपके सद्‍‍व्यवहारसे दूर हो जायँगे। दूसरेके दुर्व्यवहारका नाश करनेका उपाय बदलेमें सद्‍‍व्यवहार करना है, दुर्व्यवहार करना नहीं। किसी दूसरेमें तो दोष है ही, तभी वह दुर्व्यवहार करता है; हम यदि बदलेमें दुर्व्यवहार करेंगे तो हमारेमें भी वही दोष आ जायगा। इससे हमारी हानि ही होगी और यदि हम अपने दुर्व्यवहारको दोष नहीं समझते तो फिर उसके दुर्व्यवहारको दोष समझनेका क्या अधिकार है। दोष समझते हैं, इसीलिये उसे दूर करना चाहते हैं। पर दूसरेका दोष तो दूर करना चाहें और उसे दूर करने जाकर अपने उसी दोषको ग्रहण कर लें, यह कहाँकी बुद्धिमानी है। इसलिये मनुष्यको चाहिये कि वह पहले अपने दोषोंको बारीकीसे देखे और उन्हें दूर करनेका पूर्ण प्रयत्न करे। इसीमें उसका और जगत‍्का कल्याण है।