अपनी संस्कृतिके प्रति घृणा
सप्रेम राम-राम! आपका कृपापत्र मिल गया था; उत्तरमें देर हुई, इसके लिये क्षमा कीजिये। आपका लिखना सर्वथा सत्य है—इस समय हमारी सभ्यतापर बड़ा ही मार्मिक आघात हो रहा है और उस आघातके करनेवाले दूसरे नहीं, स्वयं हम ही हैं। आज हमारी स्वयं अपने ही ऊपर घृणा हो गयी है। कुछ वर्षों पहले भारतके आदरणीय विद्वान् सर हरिसिंह गौड़ महोदयने कलकत्ता विश्वविद्यालयके मुखपत्र ‘कलकत्ता रिब्यू’ में ‘हमारे सात शत्रु’ (Our seven enemies) शीर्षक एक लेख लिखा था, जिसमें उन्होंने भारतीय संस्कृतिकी बड़ी बुरी तरहसे निन्दा की थी। उनके बताये हुए सात शत्रु—१. हमारे देशकी जलवायु (Climate), २. हमारा वर्ण-विभाग (Caste), ३. हमारी अहिंसा, ४. हमारे देवता (Our god), ५. हमारे दर्शन-शास्त्र (Philosophy), ६. विभिन्न भाषाएँ (the languages) और ७. जडता (Inertia)। जो वस्तुएँ हमारे लिये विशेष गौरवकी हैं, वे ही आजके पाश्चात्यभावोंसे अनुप्राणित विद्वान् सज्जनोंकी दृष्टिमें ग्लानि और लज्जाका विषय बन रही है। यह हमारी मानसिक दासताका फल है, जिसके कारण हमें अपनेमें सिवा जघन्य वृत्तियोंके और कुछ दीखता ही नहीं। आपने जो लिखा है, प्राय: वही सर हरिसिंहजीने भी कहा था। यह विषभरी भावना वस्तुत: हमारी जातिके और धर्मके नाशके लिये बड़ा भयानक काम कर रही है।
हमारी संस्कृतिकी सच्ची महत्ता, हमारे धर्मका यथार्थ गौरवमय स्वरूप आज इनको कौन समझाये। जो समझाने योग्य हैं, उनकी कोई सुनता नहीं और जिनकी सुनी जाती है, वे समझा नहीं सकते। ऐसी अवस्थामें मेरी रायमें इस समय सर्वोत्तम उपाय है—व्यक्तिगत तथा सामूहिक रूपसे भगवान्की आराधना करना। इसीसे विषवृक्षकी जड़ कटेगी। बाहरी साधन भी यथासाध्य करने चाहिये; परंतु आज सारे जगत्में जिस प्रकारकी बयार बह रही है, उसके सामने बाहरी साधनोंका टिकना और सफल होना बहुत कठिन है।
भगवान् और धर्म—ये दो ही हैं जगत्के सर्वांगीण अभ्युदयके आधार और आज इन्हींपर जगत्की अनास्था बढ़ी जा रही है। इससे अधिक पतनके प्रकट चिह्न और क्या होंगे। भगवान्से प्रार्थना करनी चाहिये कि वे ही धर्मकी रक्षा करें, हमलोगोंको धर्मका बल प्रदान करें और बढ़ती हुई अधार्मिक प्रवृत्तिको रोकें।
पता नहीं, भगवान्की क्या इच्छा है। जो कुछ हो रहा है, सब उनकी दृष्टिमें ही हो रहा है। उनके इंगितसे ही हो रहा है तथापि हमें तो उनकी आज्ञाका ही अनुसरण करना चाहिये। अपनी ओरसे त्रुटि नहीं करनी चाहिये। फल तो उनके हाथमें है। उनके मंगलमय विधानके अनुसार जैसा कुछ उचित और आवश्यक होगा, वही होगा। यह समझकर फलमें समबुद्धि रखते हुए हमें भगवत्प्रीत्यर्थ अपने कर्तव्यका अवश्य पालन करना चाहिये। साथ ही निश्चय यह रखना चाहिये—
करी गोपालकी सब होय।... ...
जो कछु रचि राखी नँदनंदन, मेटि सकै नहिं कोय॥