अपनी स्थितिके अनुसार ही कार्य करना चाहिये

सादर प्रणाम। आपका कृपापत्र मिला था। आप सब समझते हैं, मैं आपको क्या लिख सकता हूँ। मेरी समझसे तो मनुष्यको अपनी स्थिति समझकर उसके अनुसार ही कार्य करना चाहिये। ‘उतने पैर पसारिये जितनी लाँबी सोड़’, तभी कार्य सात्त्विक और परिणाममें सुख तथा शुभ प्रदान करनेवाला होता है और तभी उसका बहुत दिनोंतक निर्वाह भी हो सकता है। आवेशमें आकर ऐसा कार्य नहीं करना चाहिये, जिसको आगे चलकर छोड़ना पड़े। जो लोग बिना विचारे किसी सदुद्देश्यसे भी अपनी शक्तिके बाहर काम कर बैठते हैं, उनकी आगे चलकर अपने उद्देश्यके प्रति ही उपेक्षा, उदासीनता, अवज्ञा और शिथिलता हो जाती है। जैसे किसीकी आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं हो और वह जोशमें बड़ा ऋण लेकर भगवान‍्का मन्दिर बनवा दे। मन्दिर-निर्माण बहुत अच्छी बात है; परंतु ऋण भी बड़ा पाप है। ऋण नहीं चुकाया जायगा और महाजनका कड़ा तकाजा शुरू होगा, तब मानसिक शान्तिको बनाये रखना असम्भव-सा हो जायगा। ऋण लेकर मन्दिर न बनाया जाता तो यह अशान्ति नहीं होती। जब चित्तमें अशान्ति होगी, दु:ख होगा, तब अपने कार्यपर पश्चात्ताप भी होगा और मन्दिर-निर्माणके मूलमें भगवान‍्के प्रति जो श्रद्धा थी, वही शिथिल हो जायगी। फिर भगवान‍्में भी उपेक्षा, उदासीनता एवं अनादरकी भावना आ जायगी। पर इसका यह अर्थ नहीं है कि प्रचुर अर्थ होनेपर भी भगवत्-सेवामें या सत्कार्यमें उसका व्यय नहीं किया जाय। वह तो कृपणता और वित्तशाठ्य है। अपने पास कोई वस्तु हो, अपने शरीर और मनमें शक्ति हो एवं उचित अवसरपर उनसे काम नहीं लिया जाय, यह भी बहुत बुरी बात है।

आप यह मत समझें कि मैं आपके उत्साहको तोड़ रहा हूँ और आपकी सत्-प्रवृत्तिमें बाधा देना चाहता हूँ। आपकी सद्भावना और उत्साह बहुत सराहनीय है; परंतु आपने अपनी जो स्थिति बतलायी है और उसपर मेरी सम्मति पूछी है, इसलिये कर्तव्यवश आपको यह लिखनेके लिये बाध्य होना पड़ रहा है कि आप अपने उत्साहके अनुसार कार्य तो अवश्य कीजिये—पर कीजिये उसी सीमातक, जहाँतक आपकी शक्ति है। आपने भविष्यकी जिस कल्पनापर इतना बड़ा कार्य करनेका विचार किया है, वह उचित नहीं मालूम होता। सोचिये, यदि आपकी भविष्यकी कल्पना सिद्ध न हुई तो आपको कितना कष्ट होगा और साथ ही आपके बाल-बच्चोंकी भी क्या दशा होगी। आपके ऊपर बच्चोंका दायित्व तो है ही। जबतक आपको अपने शरीरका ज्ञान है, तबतक इस दायित्वसे आप मुक्त नहीं हो सकते। यह भी आपका धर्म है। आप बच्चोंमें, घरमें आसक्त न हों, यह ठीक है; परंतु उनकी देख-रेख न करें, यह अनुचित है और किसी कल्पनापर उनके भविष्यको अन्धकारमय बना देना नितान्त अनुचित है। यह सत्य है कि सबके रक्षणावेक्षणका भार श्रीभगवान् पर है। आजकी बनायी हुई व्यवस्था कल नष्ट हो सकती है और इससे बहुत अच्छी नयी व्यवस्था भी हो सकती है; परंतु मनुष्यका कर्तव्य तो यही है कि वह अपनी वर्तमान स्थितिके अनुसार सोचे और तदनुसार ही व्यवस्था करे। फिर होगा तो वही जो होना है और वही ठीक होगा। पर इस विचारको लेकर अहंता-ममतासे युक्त मनुष्य अपनेको कर्तव्यके दायित्वसे मुक्त नहीं मान सकता।

आपके दूसरे प्रश्नका उत्तर यह है कि मेरी समझसे इस समय संसार उन्नतिकी या विकासकी ओर नहीं, परंतु अवनति और विनाशकी ओर ही जा रहा है। हमलोगोंकी मानसिक स्थिति ही इसका प्रमाण है। जिस कालमें मनुष्यका मन त्याग एवं प्रेमसे पूर्ण, पवित्र, भगवत्-सम्बन्धयुक्त सात्त्विक भावोंसे भरा होता है, वही काल उसकी उन्नतिका होता है; क्योंकि मानसिक भावोंके अनुसार ही कार्य होते हैं और उन कार्योंका अच्छा-बुरा परिणाम ही हमारी उन्नति-अवनतिका स्वरूप होता है। जब हमारे मनमें काम, क्रोध, लोभ, असत्य, वैर, हिंसा, द्वेष, दम्भ, द्रोह, विषाद, सन्ताप, ईर्ष्या, मत्सर, अभिमान, दर्प, ममत्व, अहंकार आदि भरे हैं और दिनोंदिन बढ़ रहे हैं, तब हमारे द्वारा सत्कार्योंका होना और उनके फलस्वरूप अभ्युदय और विकासकी प्राप्ति होना कैसे सम्भव है? जैसा आज हमारा मन है, वैसा ही जगत् हमारे सामने आनेवाला है। आजके हमारे मनमें विध्वंस, विनाश और अवनतिके विचार ही बढ़ रहे हैं और सबसे बढ़कर बात तो यह है कि अपनेको प्रगतिशील माननेवालोंको इन विनाशी विचारोंमें ही प्रगति और विकास दीख रहा है। भगवान‍्ने श्रीमद्भगवद‍्गीतामें कहा है—

अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसावृता।

सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धि: सा पार्थ तामसी॥

(१८। ३२)

‘बुद्धि जब तमोगुणसे ढक जाती है, तब वह अधर्मको धर्म मानती है, उसको फिर सभी अर्थोंमें विपरीत मान्यता हो जाती है।’ फिर हानिमें लाभ, अवनतिमें उन्नति, विनाशमें विकास, पतनमें उत्थान और लघुत्वमें महत्त्व दीखने लगता है। यह तामसी बुद्धिका स्वरूप है और तमोगुणका फल है अध:पात—(अधो गच्छन्ति तामसा:) तामस प्राणी अधोगतिको प्राप्त होते हैं (गीता १४। १८)।

हाँ, इस दु:समयमें भी भगवान‍्का आश्रय लेकर उनका भजन करनेवाले पुरुष न तो दैवीगुणोंसे वंचित होंगे और न उनका अध:पात ही होगा, चाहे संसारमें उनकी बड़ी अवज्ञा ही हो जाय। अतएव मेरी तो प्रार्थना है कि हम सबको भगवद्भजनमें संलग्न होना चाहिये।

मेरी धृष्टताके लिये क्षमा करेंगे।