भगवदवतारका स्वरूप और हेतु
प्रिय महोदय! सप्रेम हरिस्मरण। आपका कृपापत्र मिला। श्रीमद्भगवद्गीतामें जो यह आया है कि ‘भगवान् साधुओंके परित्राण, दुष्कृतोंके विनाश और धर्मके संस्थापनके लिये अवतार धारण करते हैं’ सो सर्वथा सत्य है। पर इसमें न तो यह सन्देह करना चाहिये कि ‘भगवान् अपने स्वरूपमें अनन्त हैं, वे यदि आंशिकरूपसे यहाँ आते हैं और वहाँ उनका आंशिकरूप ही बच रहता है, इसलिये वे अनन्त कहाँ रहे और यदि अनन्त नहीं, तो फिर सच्चिदानन्दघन पूर्णब्रह्मसे अतिरिक्त क्या वे कोई दूसरी वस्तु हैं?’ क्योंकि सचमुच भगवान् नित्य, अनन्त और अखण्ड हैं और वे समग्ररूपसे ही अवतीर्ण होते हैं, परंतु उसी समय वैसे ही वे समग्ररूपसे विश्वमें व्याप्त भी रहते हैं। इतना ही नहीं, इस विश्वके बाहर भी वे समग्ररूपसे स्थित रहते हैं। इसीलिये उपनिषद्ने कहा है—‘पूर्णरूपसे पूर्ण ग्रहण कर लेनेपर भी पूर्ण ही बच रहता है।’
पूर्णमद: पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥
न यह मानना चाहिये कि भगवान् अवतार नहीं ले सकते। ऐसा माननेसे तो भगवान्की सर्वशक्तिमत्ता ही नष्ट हो जाती है। वे परिपूर्ण रहते हुए ही इच्छानुसार एक ही साथ एक जगह या अनेक जगह विभिन्न रूपोंमें अवतीर्ण हो सकते हैं। इन्हीं बातोंसे उनकी भगवत्ताका पता लगता है।
आपका तीसरा सन्देह भी ठीक नहीं है। भगवान् बिना अवतार लिये अपनी शक्तिसे ही साधुओंका परित्राण, दुष्कृतोंका विनाश और धर्मका संस्थापन कर सकते हैं, इसमें जरा भी सन्देह नहीं; तथापि वे परम दयालु होनेके कारण स्वयं अवतीर्ण होते हैं और असलमें वे अवतीर्ण होते हैं इसीलिये दुष्कृतोंके विनाशके बहाने उनके दुष्कृतोंका विनाश होता है और वे अनायास ही परमगतिको प्राप्त हो जाते हैं। श्रीमद्भागवतमें एक बड़ा सुन्दर हेतु अवतार-ग्रहणका यह बतलाया गया है—
अनुग्रहाय भूतानां मानुषं देहमास्थित:।
भजते तादृशी: क्रीडा या: श्रुत्वा तत्परो भवेत्॥
(१०। ३३। ३७)
‘भगवान् जीवोंपर कृपा करनेके लिये ही अपनेको मनुष्यरूपमें प्रकट करते हैं और ऐसी लीलाएँ करते हैं, जिन्हें सुनकर जीव भगवत्परायण हो जायँ।’
असलमें भगवान् अपने भक्तोंको नहीं, जीवमात्रको अपना प्रेमदान करना चाहते हैं, वे न मालूम कितने रूपोंमें आकर मनुष्यके हृदयद्वारको खटखटाते हैं, परंतु वह अहंकारकी अर्गला लगाकर हृदयके दरवाजेको बंद करके निश्चिन्तरूपसे बैठा अविद्याके सपने देखता रहता है। भगवान् उत्तर न पाकर लौट जाते हैं, परंतु न तो वे इससे रूठते हैं और न क्रोध करते हैं। वे पुन:-पुन: आते हैं। जब मनुष्य किसी तरह नहीं सुनता, तब उसके हृदयपर जरा जोरसे चोट करके उसे जगाते हैं और उसका कल्याण करते हैं। कल्याणमय, मंगलमय प्रभु कल्याणके सिवा और क्या करें?