भगवद्भक्तिसे हानि नहीं होती
प्रिय बहिन! आपका पत्र मिला। आप बचपनसे ही यथाशक्ति पूजा-पाठ तथा जप करती हैं। आपके दो पुत्र चले गये। अब तीसरा बच्चा हुआ है। पर आपकी माताजी कहती हैं कि ‘इस पूजा-पाठके कारण ही पहले बच्चे मर गये थे। तुम्हारे पूजा-पाठसे इस बच्चेका भी अनिष्ट हो जायगा।’ सो यह उनका भ्रम है। भलेका फल कभी बुरा नहीं हो सकता। भगवान्की भक्ति, भगवान्के नाम-जप तथा अपने घरमें भगवान्की पूजा करनेका सभीको अधिकार है। स्त्री हो या पुरुष—यह सभीके लिये मंगलकारी कार्य है। भगवान्की भक्तिसे पुत्रोंके मरनेका कुछ भी सम्बन्ध नहीं है। हानि-लाभ, सुख-दु:ख, जीवन-मरण सब प्रारब्धके फल हैं। भगवद्भक्तिसे तो सकामभाव होनेपर ये प्रारब्धके विधान उलटे टल सकते हैं। न टलें तो भी अमंगल तो होता ही नहीं। मनुष्य-जीवनकी सफलता ही भगवान्की भक्तिमें है। आपको बड़ी नम्रता, विनय तथा सेवा करके माताजीको यह बात समझानी चाहिये। विवाद-झगड़ा कभी नहीं करना चाहिये।
फिर भी यदि माताजीको इससे बहुत ही दु:ख होता हो तो आप धीरे-धीरे अपने भक्तिके भावको मनके अंदर ले जाइये। मनसे आप भगवान्को याद करेंगी, उनकी मानसिक पूजा करेंगी तो उससे कोई आपको रोक नहीं सकता। न किसीको पता ही लग सकता है। फिर किसीकी नाराजीका कोई प्रश्न ही नहीं रह जायगा और असलमें जितना महत्त्व मानसिक भावोंका है, उतना बाहरी पूजाका है भी नहीं। पर इसका यह अर्थ नहीं मानना चाहिये कि मैं बाहरी पूजाका निषेध करता हूँ। बाहरी पूजा भी अवश्य करनी चाहिये, परंतु भीतरीके साथ-साथ और जहाँ-कहीं उससे कोई उपद्रव खड़ा होता हो, (चाहे वह किसीकी भूलसे हो) वहाँ तो ज्यादा अभ्यास भीतरीका ही करना चाहिये।
अन्तमें आपकी माताजीसे भी मेरी प्रार्थना है कि वे इस वहमको छोड़ दें। भगवान्की भक्ति और पूजा स्त्री-पुरुष सभी कर सकते हैं और भगवान्की भक्ति-पूजासे लोक-परलोकमें कल्याण ही होता है। उसको रोकना, भक्ति करनेवालेका विरोध करना पाप है और उससे परिणाममें दु:ख होता है। घरवालोंका तो यह परम धर्म होना चाहिये कि वे समझाकर, विनय करके, सेवा करके सभी घरवालोंको भगवान्की भक्तिके मार्गमें लगावें। वही सच्चा घरका मित्र, बन्धु और हितैषी है, जो अपने घरवालों, मित्रों और बन्धुओंको भगवान्की ओर लगाता है—
तुलसी सो सब भाँति परम हित
पूज्य प्रान तें प्यारो।
जासों होय सनेह रामपद
एतो मतो हमारो॥
शेष भगवत्कृपा।