भगवद्दर्शनके साधन

प्रिय महोदय! सप्रेम हरिस्मरण। आपका कृपापत्र मिला। उत्तरमें निवेदन है कि भगवान‍्की प्राप्तिके अनेकों मार्ग हैं और अधिकारी-भेदसे सभी ठीक हैं। ज्ञान, भक्ति, कर्म, योग—सभी अपने-अपने स्थानमें महत्त्व रखते हैं। इनमेंसे किसी एकको मुख्यरूपमें स्वीकार करके साधक अपना मार्ग निश्चित करता है। फिर इन ज्ञान, भक्ति, योग आदिके भी विभिन्न स्वरूप तथा स्तर हैं। एक मार्गसे यदि सफलता नहीं मिलती तो यह समझना चाहिये कि या तो उस मार्गपर वह साधक भलीभाँति चल नहीं पाया अथवा वह उस मार्गका अधिकारी नहीं है; परंतु एक मार्गपर चलना आरम्भ करके उसे सहसा छोड़ना या बदलना नहीं चाहिये। सावधानीके साथ पता लगाना चाहिये—कहाँपर त्रुटि है। जहाँ त्रुटि मिले, वहीं उसकी पूर्तिका प्रयत्न करना चाहिये। साधक यदि लौकिक पदार्थोंकी कामनावाला नहीं है, वह शुद्ध हृदयसे एकमात्र भगवत्प्राप्ति या अपने इष्टस्वरूप भगवान‍्का साक्षात्कार चाहता है तो उसके मार्गकी कठिनाइयोंको भगवान् स्वयं दूर करेंगे, वे ही उसके मार्गदर्शक बनेंगे और वे ही उसके लिये पाथेय, प्रकाश और साथीकी व्यवस्था करेंगे। आप अपनेको उनपर छोड़ दीजिये, अपनी जीवनचर्याको सर्वथा उनके अर्पण कर दीजिये। फिर वे आप ही सँभालेंगे। भगवान‍्ने स्वयं गीतामें कहा है—

अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जना: पर्युपासते।

तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥

(९। २२)

‘जो अनन्य (एकमात्र मेरे ही शरणापन्न होकर मुझपर ही श्रद्धा, विश्वास, आशा-भरोसा रखनेवाले) मेरे जन निरन्तर मेरा चिन्तन करते हुए (मेरे लिये ही) मेरी उपासना करते हैं, उन नित्य मुझमें लगे हुए पुरुषोंके योग-क्षेमका मैं स्वयं वहन करता हूँ। अर्थात् उनके प्राप्त साधनकी रक्षा—क्षेम मैं स्वयं करता हूँ और जो कुछ उन्हें प्राप्त करना है, उसका योग—प्राप्ति भी मैं स्वयं करा देता हूँ।’

हमें तो बस, यही करना है कि हम उनपर निर्भर करना सीख लें। अपना सब कुछ उन्हें सौंपकर उनके हाथकी कठपुतली बन जायँ। वे जब करें, जो करें, जैसे करें—उसीमें हमें आनन्दका अनुभव हो। ऐसा होनेपर उनके दर्शन बहुत शीघ्र होते हैं।

उनके दर्शनका दूसरा साधन है—आत्यन्तिक उत्कण्ठा। जिसे ‘अनिवार्य आवश्यकता’ भी कह सकते हैं, जैसी प्यासेको जलकी होती है। हमारी भगवत्-मिलनकी इच्छा जब वैसी आवश्यकतामें परिणत हो जायगी, तब उसकी पूर्ति बिना विलम्ब होगी।

आप जो साधना कर रहे हैं, वह ठीक है। उसे श्रद्धापूर्वक करते जाइये। मनमें कभी अविश्वासको स्थान न दीजिये। न ऊबिये ही। धैर्यके साथ लगे रहिये। जो अधीरता भगवान‍्के मिलनकी आवश्यकता पैदा करती है, वह तो बहुत श्रेष्ठ है, परंतु जो अधीरता साधनमें शिथिलता लाती है, उससे सदा बचना चाहिये। वह तो साधनका विघ्न है।

‘लागौ रहु रे भाइया तेरी बनत-बनत बनि जाय।’

शेष भगवत्कृपा!