भगवान् और भजनके सम्बन्धमें कुछ प्रश्नोत्तर
प्रिय महोदय! सादर सप्रेम हरिस्मरण। कृपापत्र मिला। धन्यवाद। आपकी शंकाओंका उत्तर इस प्रकार है—
(१) जिसने जीवनभर भगवान्का स्मरण किया होगा, उसे अन्तसमयमें अनायास ही भगवान्का स्मरण होगा। जीवनमें जहाँ मन अधिक रमता रहा है, अन्तकालमें प्राय: उसीकी स्मृति होती है। अत: अन्तकालमें भगवान्का ही स्मरण हो, इसके लिये सम्पूर्ण जीवनमें भगवान्के चिन्तनको अनिवार्य बना देना चाहिये। अन्तकालमें किसी कारणवश वाक्-शक्ति कुण्ठित हो जाय तो भी स्मरण बना रहता है। प्राण जानेकी घड़ीमें तो सबसे बड़े सहारेकी ही याद आती है, अत: उस समय भगवद्भक्तको भगवान्का सहज ही स्मरण हो सकता है। मान लीजिये, प्राण दो दिन बाद निकलें, परंतु बेहोशी पहले ही हो जाय, उस दशामें भी होशके अन्तिम क्षणमें जो स्मरण रहेगा, उसीके अनुसार भावी गति होगी। अत: दो दिन पूर्व होशके अन्तिम क्षणमें किया हुआ स्मरण ही अन्तकालका स्मरण समझा जायगा।
(२) जो लोग छोटी अवस्थासे चिन्तन न करके बुढ़ापेमें चिन्तन प्रारम्भ करते हैं, उनमेंसे बहुत थोड़े लोग स्मरणके संस्कारको अधिक जाग्रत् कर पाते हैं। अधिकांश लोग जीवनमें जहाँ अधिक रमे हैं, उन आसक्तियोंको नहीं छोड़ पाते। अत: उनके द्वारा अन्तसमयमें भगवत्स्मृति नहीं बन पाती। यदि किसीके द्वारा पूर्वजीवनमें अभ्यास न होनेपर भी अन्तकालमें भगवत्स्मरण बन गया तो ऐसा मानना चाहिये कि उसका कोई पूर्वपुण्य सहायक हो गया है; अथवा भगवान्की अकारण कृपा बरस गयी है।
(३) गीता (८। २४, २५)-में शुक्लमार्ग और कृष्णमार्गका वर्णन है। इन मार्गोंसे वे ही जाते हैं, जो उक्त पथोंके योग्य होते हैं। शुक्लमार्गसे गये हुए उपासक ब्रह्मको प्राप्त होते हैं और कृष्णमार्गसे गये हुए सकाम पुण्यकर्म करनेवाले जीव चन्द्रलोक (स्वर्ग)-तक जाकर वहाँके भोग भोगनेके बाद यहाँ लौट आते हैं। मान लीजिये, कोई शुक्लमार्गसे यात्रा करनेकी योग्यतावाला उपासक दक्षिणायनमें मर गया तो वह पहले अग्निके अधिकारमें जायगा, अग्नि उसे दिनके अभिमानी देवताके अधिकारमें पहुँचा देगा और वह उसको शुक्लपक्षके अभिमानी देवताके अधिकारमें दे देगा। इसके बाद वह वहीं रुकेगा। जब दक्षिणायन बीत जायगा, तब उत्तरायण आरम्भ होते ही उसका अभिमानी देवता उस जीवको अपने अधिकारमें लेकर आगे बढ़ा देगा। इसी क्रमसे वह सद्गतिको प्राप्त होगा।
गीता अध्याय ९, १० और ग्यारहमें भगवान्ने अपनी बहुत प्रशंसा नहीं की है, यथार्थ बातका दिग्दर्शन कराया है। हमारे और आप-जैसे दोषदर्शीके सामने यह बात नहीं कही जा सकती; क्योंकि हमलोगोंको इस उपदेशमें आत्मप्रशंसाकी गन्ध आती है, परंतु अर्जुन ऐसे नहीं थे। वे ‘अनसूयु’ थे; इसीलिये उन्हें नवें अध्यायका गुह्यतम ज्ञान विज्ञानसहित बताया गया—
इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे।
ज्ञानं विज्ञानसहितं ... ... ...॥
जो किसीके गुणोंमें दोष नहीं देखता, वही अनसूयु है। अर्जुनने इस उपदेशको सुनकर अपने ऊपर भगवान्की कृपा मानी, आत्मप्रशंसा नहीं समझी। वे भगवान्के प्रेमी थे, इसीलिये उनके सामने भगवान्ने अपने परम रहस्यका (जिसका दसवें अध्यायमें वर्णन है) उपदेश किया—
भूय एव महाबाहो शृणु मे परमं वच:।
यत्तेऽहं प्रीयमाणाय वक्ष्यामि हितकाम्यया॥
भगवान्के उपदेशको सुनकर अर्जुनने क्या समझा? यह वे अपने मुखसे बता रहे हैं—
सर्वमेतदृतं मन्ये यन्मां वदसि केशव।
‘भगवन्! आप मुझसे जो कुछ कहते हैं, वह सब मैं यथार्थ मानता हूँ।’
अर्जुन भगवान्के अनन्यभक्त थे; इसीलिये उन्हें ग्यारहवें अध्यायका उपदेश सुलभ हुआ। अनन्यभक्तिके प्रभावसे ही वे विश्वरूप-दर्शनका सौभाग्य प्राप्त कर सके। जैसा कि भगवान्ने स्वयं बताया है—
भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन।
ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परंतप॥
अत: गीताको समझनेके लिये अनसूयु, भगवत्प्रेमी एवं अनन्यभक्त बननेकी आवश्यकता है। फिर किसी प्रकारकी शंकाका उदय न होगा। शेष भगवत्कृपा।