भगवान् सर्वसमर्थ हैं
सादर हरिस्मरण। आपका पत्र मिला। आप विश्वास कीजिये, भगवान् ‘कर्तुमकर्तुमन्यथाकर्तुं समर्थ’ हैं। उनके लिये कुछ भी असम्भव नहीं है—
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रीते भरै, भरै पुनि ढोरै, चाहे तो फेरि भरै॥
कबहूँ तृन डूबै पानीमें, कबहूँ सिला तरै।
बागर ते सागर करि राखै, चहुँदिसि नीर भरै॥
पाहन बीच कमल बिकसावै, जलमें अग्नि जरै।
सूर पतित तरि जाय तनिकमें जो प्रभु नेक ढरै॥
भगवान्के भजनसे ऐसी अग्नि उत्पन्न होती है जो जन्म-जन्मान्तरके पापोंको क्षणोंमें जला डालती है। भक्तिके प्रयासमें ही सारे प्रायश्चित्त और कर्मफल-भोग एक ही साथ हो जाते हैं। भगवत्कृपासे ऐसी-ऐसी विलक्षण बातें होती हैं, जिनकी हमलोग कल्पना भी नहीं कर सकते। जो लोग तर्ककी कसौटीपर कस-कसकर—अपने विषयासक्तिसे दूषित गंदी बुद्धिरूपी तराजूपर तौल-तौलकर भगवान्को परखना चाहते हैं, उन्हें तो निराश ही होना पड़ता है; पर जो संतों और भक्तोंके अनुभवको परम सत्य मानकर विश्वासके साथ भगवान्का भजन करने लगते हैं, भक्तिमणिको अपने हृदयमें बसा लेते हैं, उनके लिये सब कुछ सुलभ और अनुकूल हो जाता है—
खल कामादि निकट नहिं जाहीं।
बसइ भगति जाके उर माहीं॥
गरल सुधा सम अरि हित होई।
तेहि मनि बिनु सुख पाव न कोई॥
ब्यापहिं मानस रोग न भारी।
जिन्ह के बस सब जीव दुखारी॥
राम भगति मनि उर बस जाकें।
दुख लवलेस न सपनेहुँ ताकें॥
और वास्तवमें उसीमें सारे गुण भी आ जाते हैं—
सोइ सर्बग्य गुनी सोइ ग्याता।
सोइ महि मंडित पंडित दाता॥
धर्मपरायन सोइ कुल त्राता।
राम चरन जा कर मन राता॥
नीति निपुन सोइ परम सयाना।
श्रुति सिद्धांत नीक तेहिं जाना॥
सोइ कबि कोबिद सोइ रनधीरा।
जो छल छाड़ि भजइ रघुबीरा॥
मैं ऐसे लोगोंको जानता हूँ, जिन्होंने भगवान् पर विश्वास करके असम्भव-से जान पड़नेवाले कार्योंमें विलक्षण सफलता प्राप्त की है और ऐसी महान् विपत्तियोंसे सहज ही तर गये हैं, जिनसे तरनेका कोई भी उपाय सामने नहीं रह गया था और ये सब बातें जादूकी भाँति बहुत थोड़े ही समयमें हो गयी हैं।
अवश्य ही इससे मैं यह नहीं कहना चाहता कि भगवान् हमारी अनुचित और विनाशकारी इच्छाको भी पूर्ण कर देंगे। बहुत बार ऐसा भी हुआ है कि इच्छाके विपरीत फल हुआ है; परंतु आगे चलकर यह प्रमाणित हो गया है कि उस विपरीत फलमें ही हमारा कल्याण था, कहीं अनुकूल फल होता तो बहुत बुरा होता। इसलिये सर्वशक्तिमान् भगवान् पर विश्वास करके अपनी समस्या उन्हींको सौंप दीजिये। वे मंगलमय मंगल ही करेंगे।
आपने जिन उपायोंका उल्लेख किया है, वे तो वस्तुत: दु:ख बढ़ानेवाले ही हैं। ‘लोग उन उपायोंको काममें लाते हैं और उनमें सफल होते देखे जाते हैं।’ आपका यह लिखना बाहरी दृष्टिसे ठीक है; परंतु इसमें रहस्य यह है कि वे यदि इस समय सुख-भोग करते हैं तो वह उनके पूर्वजन्मार्जित किसी पुण्यकर्मका परिणाम है, वर्तमान पापका फल नहीं। बीज बोते ही फल नहीं लग जाते। समय पूरा होनेपर ही परिणाम प्रकट होता है। उनके वर्तमान पापोंका परिणाम जब प्रकट होगा, तब वे सुखमें कदापि नहीं रहेंगे। दु:ख और नरक-यन्त्रणामें ही छटपटाते मिलेंगे। आप निश्चय मानिये, बुरेका फल अच्छा और अच्छेका फल बुरा कभी हो नहीं सकता!
सकाम भक्ति बुरी नहीं है, न पाप ही है। सकाम करते-करते ही निष्कामता प्राप्त होती है। भगवान्ने तो अपने सकाम भक्तको भी ‘सुकृती’ और ‘उदार’ बतलाया है और अन्तमें उसे भगवान्की प्राप्ति होगी, यह घोषणा की है (देखिये गीता अध्याय ७ श्लोक १६, १८, २३); परंतु सकाम भक्तिमें भी अनन्य निष्ठाकी आवश्यकता है। सच्ची सकाम भक्ति न तो मनचाही वस्तु प्राप्त होनेपर छूटती है और न मनचाही न प्राप्त होनेपर भी घटती ही है। वह भक्ति है, कोई मोल-तौलका सौदा नहीं है। किसी पतिव्रता स्त्रीको गहनों-कपड़ोंकी इच्छा है, पर है वह एकमात्र पतिसे ही। गहने-कपड़े न मिलनेपर उसकी पति-भक्ति कम नहीं होती और मिल जानेपर ऐसा भाव नहीं होता कि वस्तु मिल गयी, अब पतिसे क्या काम रहा। असलमें सच्चा सकाम भक्त किसी वस्तु या स्थितिको तो चाहता है; परंतु उसका अपने भगवान्में दृढ़ विश्वास होता है और वह उस वस्तुकी अपेक्षा अपने भगवान्को अधिक मूल्यवान् और आवश्यक समझता है। जो लोग भगवान्में श्रद्धा-भक्ति नहीं रखते और अवसर आनेपर किसी कार्यकी सिद्धिके लिये अनुष्ठान करते-कराते हैं, उनकी श्रद्धा सिद्धि न होनेपर तो घट ही जाती है। सिद्धि होनेपर भी स्थिर नहीं रहती; क्योंकि उन्हें भगवान्से काम नहीं है, उनका काम तो अपनी कामनाकी वस्तुसे है। भगवान् और उनकी पूजाका अनुष्ठान तो उसका साधनमात्र था। साध्य प्राप्त होनेपर साधनसे क्या प्रयोजन! इसलिये सकामभावसे अनुष्ठान करनेवालोंको भक्त बनना चाहिये, सौदागर नहीं।
सबसे ऊँची तो निष्काम अहैतुकी प्रेमभक्ति ही है, जो अकारण होती है और जिसके रहे बिना भक्तको चैन नहीं पड़ता। वह एक क्षण भी भगवान्को भूल जाता है तो उसे परम व्याकुलता होती है और उसे वह महान्-से-महान् विपत्ति मानता है। इसी भक्तिकी कामना और इसीकी प्राप्तिके लिये साधन-भक्तिका आचरण करना चाहिये।