भगवान् शंकर और श्रीकृष्ण एक ही हैं

प्रिय महोदय! सप्रेम हरिस्मरण। आपका पत्र मिला। आपके गुरुदेव समर्थ विद्वान् हैं और चार-पाँच वर्ष पहले आप उनसे भगवान् शंकरका मन्त्र ले चुके हैं, पर इधर दो महीनेसे आपको लगातार स्वप्नमें भगवान् श्रीशंकरके बदले भगवान् श्रीकृष्णकी पूजा करनेकी प्रेरणा मिलती है और आप दुविधामें हैं कि किसकी पूजा करें। इसके उत्तरमें निवेदन है कि वस्तुत: तत्त्वदृष्टिसे भगवान् श्रीशंकरजीमें और भगवान् श्रीकृष्णमें कोई भी अन्तर नहीं है। एक ही भगवान् दो स्वरूपोंमें प्रकट हैं। इनमेंसे किसी एकको छोटा-बड़ा मानना उचित नहीं है। यह दूसरी बात है कि साधक अपने इष्टस्वरूपमें दृढ़ और अनन्य श्रद्धा रखकर उसीको सर्वोपरि और सर्वरूप मानकर भजता है एवं अन्यान्य सभी भगवत्-स्वरूपोंको उसीके विभिन्न रूप मानता है एवं ऐसा ही होना भी चाहिये। आपने इधर श्रीमद्भगवद‍्गीता, महाभारत और रामायणका अध्ययन किया है, सम्भव है, इसी कारण श्रीकृष्ण-सम्बन्धी नवीन संस्कारोंके कारण आपको वैसे स्वप्न आते हों। यह भी हो सकता है कि आपकी प्रकृति श्रीकृष्णस्वरूपकी उपासनाके अनुकूल हो और स्वयं भगवान् शंकर ही आपको उनकी उपासनाके लिये प्रेरित करते हों। जो कुछ भी हो, आपको भगवान् श्रीशंकरकी उपासना छोड़नी नहीं चाहिये और मन न माने तो श्रीशंकरजीका ही दूसरा रूप समझकर श्रीकृष्णकी उपासना भी करनी चाहिये। कुछ समय बाद अपने-आप ही ढंग ठीक बैठ जायगा। यह निश्चय मानिये कि श्रीशंकरजीकी पूजासे श्रीकृष्णकी पूजा हो जाती है और श्रीकृष्णकी पूजासे श्रीशंकरजीकी! श्रीशंकरजीमें दृढ़ निष्ठा होनेके लिये आपको शिवपुराण आदि ग्रन्थोंका अध्ययन करना चाहिये। शेष भगवत्कृपा।