भगवान‍्का लीलाविलास

प्रिय महोदय! सप्रेम हरिस्मरण। कृपापत्र मिला। धन्यवाद।

आप आस्तिक-परिवारमें उत्पन्न हुए, यह सौभाग्यकी बात है। इक्‍कीस वर्षकी आयुतक आप पूर्ण आस्तिक रहे, ऐसा होना परिवारके अनुरूप ही था। बादमें आपकी श्रद्धा मूर्तिपूजापरसे हट गयी, सगुण-उपासना भी बुद्धिको नहीं रुची और निर्गुण-उपासनामें भी मन-बुद्धिका प्रवेश न हो सका। इसका प्रधान कारण है—वैसे सत्संग और स्वाध्यायका अभाव। आयु और शिक्षा बढ़नेके साथ ही विचारशक्ति भी जाग्रत् होती है; उस समय अपने भीतर जो संशय एवं वितर्कपूर्ण प्रश्न उठते हैं, उनका समाधान होना ही चाहिये। तभी श्रद्धाके लिये सुदृढ़ आधार प्राप्त होता है। आपने अपने भीतरकी इस प्यासको सत्संग और स्वाध्यायके जलसे बुझा दिया होता तो यह अशान्ति नहीं आती। इस सम्बन्धमें मेरी सम्मति यही है कि आप गीताको मनोयोगपूर्वक पढ़ें, मनन करें। सम्भव हो तो ‘गीतातत्त्वविवेचनी’ का मनन करें, अनुशीलन करें। साथ ही किसी ज्ञानी महापुरुषकी सेवामें उपस्थित होकर अपनी शंकाओंका समाधान करायें। सत्संगसे आपकी खोयी हुई शान्ति चिरस्थायिनी होकर लौट आ सकती है। इसमें कोई बड़ी बात नहीं है।

आप यह अनुभव न करें कि मुझमें नास्तिकतापूर्ण विचार आ रहे हैं। विचारोंको उद‍्बुद्ध होने दें। शंकाएँ उठती हैं तो उठने दें। प्रश्न और जिज्ञासाका उदय होना उर्वर मस्तिष्कका लक्षण है। इससे आपका उत्साह बढ़ना चाहिये। अवसाद अथवा शैथिल्य क्यों आये?

प्रत्येक मनुष्य प्रत्येक वस्तुको समझ ही ले—यह धारणा भूल हो सकती है; परंतु प्रत्येक मनुष्य अपनेको, अपने ‘स्व’ या आत्माको समझे—यह उसके लिये अनिवार्य है। इस ज्ञानका वह अधिकारी है। इसे समझे बिना सच्ची शान्ति कहाँ?

आपकी बुद्धि निर्गुण तत्त्वको मानती-सी दीखती है; परंतु वास्तवमें मानती-जानती कुछ नहीं। मानती-जानती होती तो निश्चय ही अपने ‘स्व’ में उसको असीम शक्तिका साक्षात्कार होता।

जिसमें प्रत्येक वस्तुको मानकर चला जाता है, उस सिद्धान्तसे आप सहमत नहीं, आप अनुसन्धानके द्वारा सत्यका निर्णय करना चाहते हैं—यह ठीक है; परंतु सत्यको मानना ही पड़ता है। प्रत्येक व्यक्ति ‘मैं हूँ’ इस सत्यका अनुभव करता है; अत: आत्मसत्ता सबको प्रत्यक्ष है। आत्माको मानकर चलना अनुचित नहीं। आत्मा है या नहीं? यह प्रश्न नहीं उठता। आत्मा क्या है? इस प्रश्नका समाधान अपेक्षित है। इसका समाधान होते ही सब कुछ समझमें आ जाता है। गीताने थोड़े-से शब्दोंमें ही इस प्रश्नका उत्तर दिया है—

इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्य: परं मन:।

मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धे: परतस्तु स:॥

‘ज्ञानेन्द्रियाँ स्थूलशरीरसे परे (श्रेष्ठ) हैं, इन्द्रियोंसे मन श्रेष्ठ है, मनसे बुद्धि और बुद्धिसे परे ‘वह’ (आत्मा) है।’

इस श्लोकका मनन करें। आत्मा बुद्धिसे भी परे है। वही बुद्धिका प्रकाशक और साक्षी है। विशुद्ध आत्मा और परमात्मा एक ही तत्त्वके दो नाम हैं।

परमात्मतत्त्व-शोधनकी चिन्ता होनी ही चाहिये। जो मनुष्य विचारवान् होकर आत्मतत्त्व या परमात्मतत्त्वकी शोध नहीं करता, उसे आत्महननका दोष लगता है, वह घोरतर अन्धकारमें पड़ता है।

जबतक आपका मन सगुण या निर्गुण किसी भी तत्त्वमें रमता या उसकी ओर आकृष्ट होता है, तबतक आपको अपनेमें नास्तिकताका आरोप नहीं करना चाहिये। सच्चा नास्तिक भी निर्द्वन्द्व रहता है। आपके मनमें सगुण-निर्गुण आदिके प्रश्नको लेकर जो आकुलता छा रही है, वह नास्तिकको प्रभावित नहीं कर सकती। नास्तिक जडवादी होता है। आस्तिक आत्मचैतन्यके प्रकाशका अनुभव करता है। आप नास्तिक कदापि नहीं हैं।

मनुष्य क्यों उत्पन्न होता है? इस प्रश्नको और व्यापक रूप भी दिया जा सकता है। जगत‍्के सम्पूर्ण जीव क्यों उत्पन्न होते हैं? जैसे वृक्ष और बीज अनादि हैं, वैसे ही जागतिक जीवोंके जन्म-मरणकी परम्परा भी अनादि है। बीज बोया गया, इसलिये वृक्ष उत्पन्न हुआ। उत्पन्न वृक्षमें नूतन बीज उत्पन्न हुए। उन बीजोंके कारण वृक्षके और भी अनेक जन्म हो सकते हैं। बीज जलनेपर ही वृक्षोत्पत्तिकी परम्परा रुक सकती है। इसी प्रकार कर्मबीज ही जागतिक जीवोंकी उत्पत्तिमें कारण बनते हैं। उत्पन्न हुए जीव पुन: नूतन कर्मबीजका संचय करते हैं; जो पुन: उन्हें जन्म-मरणकी परम्परामें बाँधते हैं। ज्ञानाग्निसे या भगवान‍्की शरणागतिसे उन बीजोंको जलाये बिना बन्धनसे छुटकारा नहीं मिलता।

मनुष्य जागतिक जीवोंमें सबसे श्रेष्ठ माना गया है। ज्ञान और कर्मके जो प्रकृष्ट साधन मनुष्यको प्राप्त हैं, वे अन्यत्र दुर्लभ हैं। अत: मनुष्य क्यों उत्पन्न हुआ? इस प्रश्नका महत्त्व भी बढ़ जाता है। कर्मफलभोगके साथ ही सत्कर्म, भगवद्भजन अथवा तत्त्वज्ञानद्वारा भगवत्प्राप्ति किंवा मुक्तिलाभ करना ही मानवजन्मका महान् उद्देश्य है। इस उद्देश्यको साधनेके लिये ही मनुष्य उत्पन्न हुआ है। मानवशरीर मोक्षका द्वार है। गोस्वामी तुलसीदासजी कहते हैं—

साधन धाम मोच्छ कर द्वारा।

पाइ न जेहिं परलोक सँवारा॥

सो परत्र दुख पावइ सिर धुनि धुनि पछिताइ।

कालहि कर्महि ईस्वरहि मिथ्या दोष लगाइ॥

आगे कहते हैं—

जो न तरै भव सागर नर समाज अस पाइ।

सो कृतनिंदक मंदमति आत्माहन गति जाइ॥

इसलिये मानव-जीवनका लक्ष्य है—आत्माको जानना अथवा परमात्माको प्राप्त करना। ज्ञान और भक्ति—ये ही इस लक्ष्यके परम साधन हैं। उपासनासे तत्त्वज्ञान और भगवत्तत्त्वकी प्राप्ति दोनों सध जाते हैं। अत: यही सबके लिये सहज और सुगम साधन है। मनुष्य अपना जीवन कैसे बिताये? इसका उत्तर गीताके शब्दोंमें इस प्रकार है—

तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ।

ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि॥

(१६। २४)

क्या करना, क्या न करना—यह शास्त्र बताते हैं। शास्त्रकी आज्ञा है—‘असत्य तथा असत्-कर्मोंसे दूर रहो। सत्य और सदाचारका पालन करो।’ शास्त्रके इन विधि-निषेधोंका पालन करते हुए मनुष्य भगवत्परायण रहे। भगवान‍्को याद रखते हुए ही भगवत्प्रीत्यर्थ प्रत्येक कार्य करे—

‘सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च।’

इस प्रकारका शास्त्रीय कार्यमात्र भगवत्पूजा है।

‘स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानव:।’

(गीता १८।४६)

‘अपने कर्मके द्वारा उस भगवान‍्को पूजकर मनुष्य सिद्धि—भगवत्प्राप्ति लाभ करता है।’

पर कर्म होना चाहिये शास्त्रीय। शास्त्रविपरीत आचरण करनेसे सिद्धि, सुख तथा परम गति, सभी दुर्लभ हैं—

‘न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्।’

पता नहीं, मानवके आदिम कालका यह अद्‍भुत इतिहास आपने कहाँ पढ़ा है जिसके अनुसार सशक्त मानवकी विजय और अशक्तके शोषणसे पूर्ण ही प्राचीन युगका इतिहास लक्षित हुआ। मानवकी मनमानी, दूसरोंका रक्त शोषण करके शक्ति और वैभवके खेलमें आसुरी आनन्द लेना, स्वर्गको नरक बनाना—यह सब तो आधुनिक युगकी देन हैं। प्राचीन सिद्धान्तके अनुसार तो परस्पर सहयोग ही परम कल्याणकर समझा जाता था—

‘परस्परं भावयन्त: श्रेय: परमवाप्स्यथ।’

भगवती श्रुति भी इसी पारस्परिक प्रेम और सहयोगका सन्देश देती है—

संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्॥

(ऋ०१०।१९१।२)

आज तो प्रजा भी एक-दूसरेको नोच-खसोटकर अपना पेट भरना चाहती है, परंतु प्राचीन कालमें राजा भी प्रजाकी इच्छाका दास था। प्रजाके संकेतसे राजा अपना राज्य, अपना देश, अपना प्राण तथा अपनी प्राणप्यारी धर्मपत्नीका भी त्याग कर सकता था। भगवान् श्रीराम और उनका रामराज्य इसका आदर्श है।

आजकल आसुरी प्रवृत्तियाँ बढ़ रही हैं। ऐटम बमका निर्माण और हाइड्रोजन बम बनानेका प्रयत्न इसीके परिणाम हैं। प्राचीन कालमें भी पाशुपत और नारायण-जैसे संहारक अस्त्र थे, पर उनका प्रयोग निरीह जनताके वधके लिये नहीं होता था। उन अस्त्रोंके साथ यह मर्यादा थी कि निरीह, निरपराधपर इनका प्रयोग न हो; अन्यथा परिणाम विपरीत होगा। वर्तमान कालके इन भयानक आसुरी बमोंसे तथा आसुरी मानवोंसे बचनेका एक ही उपाय है—‘शंख-चक्र-गदा-पद्मधर असुर-संहारक विश्वप्रतिपालक भगवान् विष्णुकी ही अनन्य शरण ली जाय।’

जब दैवी वृत्तिके लोग देवको भूलकर अहंकारके वशीभूत हो प्रमाद करने लगते हैं, तब उसकी प्रतिक्रियामें आसुरी शक्तियाँ सिर उठाती हैं। यह सब भगवान‍्का ही एक खेल है। फिर असुरोंके अत्याचारसे तभी छुटकारा मिलता है, जब उनका भी दमन हो। यह सब भी भगवान‍्की लोकहितकारिणी लीलाका ही विलास है।

प्रभु मंगलमय हैं, वे सबका मंगल ही करते हैं—इस विश्वासके साथ उनकी शरण ग्रहण करनी चाहिये। शेष भगवत्कृपा।