भगवान‍्का मंगलविधान

प्रिय महोदय! सप्रेम हरिस्मरण। आपका कृपापत्र मिला। सचमुच इस समय भारतवर्षकी स्थिति बहुत शोचनीय है। हमारे समाज-जीवनका जिस प्रकारका नैतिक पतन हुआ है, उसे देखकर बड़ी चिन्ता होती है। इसका परिणाम अच्छा तो कैसे होगा। पर घबरानेकी बात नहीं है। अमावस्याके बाद ही शुक्ल पक्षका प्रारम्भ हुआ करता है। हमारे दु:ख जब बहुत अधिक बढ़ जायँगे, तब हमें चेत होगा। भगवान‍्का विधान मंगलमय होता है। वे जीव-जगत‍्की भलीभाँति परिशुद्धि करनेके लिये ही विपत्तिरूपी औषधका प्रयोग किया करते हैं। जो कुछ करते हैं सर्वथा निर्भ्रान्त होकर निश्चित कल्याणके लिये ही। असलमें तो इस समय जो कुछ संकट हमपर या तमाम विश्वपर आये हुए हैं, वे सभी उनके मंगलमय विधानके ही अंग हैं—जो पहलेसे सुनिश्चित हैं। हमारा कर्तव्य है कि इन दु:खों और विपत्तियोंमें भगवान‍्का मंगलमय हाथ देखकर हम इनका स्वागत करें एवं अपने विश्वास, श्रद्धा, प्रभु-शरणागतिसे तथा प्रभुके हाथके यन्त्र बनकर इन्हें सुख और सम्पत्तियोंके रूपमें परिणत कर दें। ऐसा हम कर सकते हैं—यदि प्रभुकी शरण होकर उनके विधानके रूपमें इनको सिर चढ़ायें। साथ ही अपने जीवनको प्रभुके सर्वथा अनुकूल बना लेना होगा। हमारी प्रत्येक चेष्टा प्रभुके मंगलकार्यका एक सुन्दर अंग बन जाय। प्रतिकूल वस्तु या भाव हममें रहे ही नहीं। हम अपने अलग अस्तित्वको भूलकर प्रभुकी ही चरणरजके एक कण बन जायँ, जिससे कि सदा चरणतलसे चिपटे रहकर निरन्तर उनके चरण-स्पर्शका सुखानुभव करते रहें। शेष भगवत्कृपा।