भगवान्का स्मरण महान् पुण्य है
प्रिय महोदय। सप्रेम हरिस्मरण। कृपापत्र मिला? धन्यवाद! आप लिखते हैं—एक साधक रजोगुण-वृत्तिका पालन करता है। उत्तरमें निवेदन है, रजोगुण-वृत्तिका पालन साधना नहीं है। सुख-भोगमें आसक्त रहनेवाला प्रत्येक मानव रजोगुणी है। तमोगुण तो उसमें तब आता है, जब वह मानवतासे भी गिरकर पशुताको अपना लेता है।
मनुष्य जब रजोगुणसे भी ऊपर उठकर सत्त्वगुणमें स्थित होनेका यत्न करे, तभी वह साधककी श्रेणीमें आता है। रजोगुणी मनुष्य सर्वथा पापसे नहीं बच सकता। वह अपने स्वार्थसाधनके लिये बहुत-से ऐसे कार्य करता है, जो पाप ही है; किंतु वह उन्हें पाप नहीं समझता। झूठ, कपट, द्वेष और हिंसा सब पाप है। पापका फल है नरक, पुन:-पुन:, पाप-योनियोंमें जन्म।
भगवान्का स्मरण महान् पुण्य है। इससे हृदय शुद्ध होकर धीरे-धीरे मनुष्य भगवान्का भक्त बन जाता है। शत्रुसे बदला लेना भी कोई पुण्यका काम नहीं है। भगवान्का भक्त चराचर जगत् में—सभी प्राणियोंमें अपने प्रभुको देखता है, अत: वह किसीसे विरोध नहीं करता, उसके लिये सारा जगत् पूजनीय और वन्दनीय हो जाता है, अत: आप भी किसीके प्रति शत्रुभाव न रखें। शत्रुमें भी भगवान्को देखें। इससे आपको तो भगवान् ही मिलेंगे। यदि दूसरा कोई आपसे अकारण वैर करेगा तो उसकी अपनी ही हानि होगी। शेष भगवत्कृपा।