भगवान‍्का स्वरूप

प्रिय बहिन! सादर हरिस्मरण। कृपापत्र मिला। धन्यवाद! आपके प्रश्नोंका उत्तर मेरी बुद्धिके अनुसार इस प्रकार है—

(१) भगवान‍्का स्वरूप अनिर्वचनीय है। भगवान् गुणातीत और अचिन्त्यानन्द दिव्यगुणनिधि हैं। सत्, चित्, आनन्द, ज्ञान और प्रेम आदि अनेकों नामोंसे भगवान‍्के स्वरूपका प्रतिपादन किया जाता है। भगवान् प्रेम, सुख और शान्तिके निकेतन हैं। प्रेम, सुख और शान्ति उनका स्वरूप ही है अतएव प्रेम सर्वथा दु:ख-स्पर्शशून्य है। भगवत्-स्वरूप प्रेम तो नित्य आत्यन्तिक आनन्दस्वरूप है ही। उच्च साधनरूप अकृत्रिम प्रेम भी एकान्त सुखस्वरूप ही है। प्रेमकी मूलभित्ति त्याग है और त्यागमें ही सुख है। प्रेमके आठ सात्त्विक भाव माने गये हैं—स्तम्भ, स्वेद, रोमांच, स्वरभेद, कम्प, वैवर्ण्य, अश्रु और प्रलय। इनमेंसे अश्रु ही दु:खका व्यंजक माना गया है, परंतु अश्रुपात केवल दु:खमें ही नहीं होता। आनन्दमें भी आँसू आते हैं। वर्षोंसे बिछुड़े प्रियजनके मिलनेपर हर्षातिरेकसे अश्रुपात होने लगता है। प्रेमके आँसू और दु:खके आँसूमें आकाश-पातालका अन्तर होता है। एकका स्थायीभाव प्रेम (रति) होता है और दूसरेका शोक। शोकजनित या शोकोत्पादक अश्रु ही दु:खका सूचक है, प्रेमजनित नहीं; वह तो सुखमें ही पर्यवसित होता है और सुखातिरेकसे ही उत्पन्न होता है। प्रेममें जो तड़पन, व्यथा, विकलता और रुदन आदि होते हैं, वे सभी रति-प्रगाढ़ प्रीतिके अनुभाव हैं। प्रेमका आँसू वरदान है और शोकका आँसू अभिशाप! प्रेममें जो मनुष्य दु:खका अनुभव करता है और उससे छूटना चाहता है, वह वास्तवमें प्रेमी ही नहीं है। वह तो लौकिक वासनाओंका दास है; वह प्रेमके पवित्र नामपर इन्द्रिय-लालसाको—मनोवासनाको चरितार्थ करना चाहता है। सच्चे प्रेमीको ही सच्चे प्रेमके दर्शन होते हैं और वह सच्चा प्रेमी प्रेममें सदा-सर्वदा परम सुखका ही अनुभव करता है। उसका अपना पृथक् सुख-दु:ख तो कुछ होता ही नहीं। वह अपने-आपको प्रियतम प्रभुके पावन पदारविन्दोंका मधुकर बनाये हुए होता है, वह अपनेको उन्हींपर न्योछावर कर देता है। अत: प्रियतम प्रभुका सुख ही उसका सुख है और प्रियतमका दु:ख ही उसका दु:ख है। भगवान् नित्य अखण्ड सुखस्वरूप हैं, अतएव उनके प्रेमीको कभी दु:ख हो ही नहीं सकता। विरहमें रुदन, हाहाकार, पीड़ा, विकलता आदि तो प्रेमीके जीवनके परम सुख हैं—ये तो प्रेमपन्थकी पान्थशालाएँ हैं—

नारायण घाटी कठिन जहाँ प्रेमको धाम।

विकल मूर्छा सिसकिबो ये मगके बिश्राम॥

ये तो सब आरामके स्थान हैं, इन्हें दु:ख कैसे कहा जा सकता है?

(२) आप किसी अज्ञात बालकसे प्रेम करती हैं और दर्शनके सिवा कुछ भी चाहती नहीं, तो यह प्रेम विशुद्ध ही है। यदि उस अज्ञात बालकमें आपका भगवद्भाव है, तो उससे किया हुआ प्रेम आपके लोक-परलोक दोनोंको सुधारकर आपको प्रभुके समीप पहुँचा दे सकता है। भगवान् नन्दनन्दनके प्रति वात्सल्यभाव यदि विशुद्ध और दृढ़ हो जाय तो वे सौन्दर्य-माधुर्य-रसनिधि भगवान् एक-न-एक दिन अवश्य ही क्रोडमें आकर अपनी मधुरतम बालोचित क्रीडाओंसे अवश्य सुख पहुँचायेंगे और उनका दिव्य संस्पर्श पाकर जीवन सफल हो जायगा।

पर आपका प्रेम छिपी आसक्तिके साथ यदि किसी पार्थिव पुतलेसे है तो वह अवश्य ही मोह है। मोह बन्धनकारक होता है और प्रेम बन्धननिवारक और उससे आपको तुरंत सावधान हो जाना चाहिये। यदि पार्थिव पुतला प्रतीकमात्र है और उसमें सच्चे भगवद्भावका दर्शन होता है तब तो वह प्रभुका पवित्र प्रेम ही है। प्रेमका लक्ष्य सदा भगवान् ही होते हैं। भगवान‍्से भिन्न यदि कोई प्रेमका लक्ष्य होता है तो अल्पके प्रति होनेसे वहाँ प्रेम भी संकुचित हो जाता है। लोकमें भी यदि कहीं सच्चा नि:स्वार्थ प्रेम है तो वह भगवान‍्को ही चरम लक्ष्य बनाता है। सरिताकी धाराको यदि कृत्रिम उपायोंसे रोका न जाय अथवा उसके पथमें कोई प्रतिरोध न आये तो वह समुद्रमें लीन हुए बिना नहीं रह सकती। इसी प्रकार प्रेमको यदि लौकिक सम्बन्धमें सीमित करके उसे संकुचित या इधर-उधर बिखेर न दिया जाय तो वह प्रेमार्णव भगवान‍्में ही मिलता है।

(३) प्रत्येक सत्पुरुषको पर-स्त्रीके सम्पर्कसे दूर रहना चाहिये तथा प्रत्येक सती-साध्वी स्त्रीको पर-पुरुषोंसे सदा अलग रहना चाहिये। तभी दोनों अपने धर्म और सदाचारकी रक्षा कर पाते हैं। यही शास्त्रका आदेश है। इसमें अपने कर्तव्यपालनपर ही दृष्टि रखी गयी है। किसीको किसीसे घृणा करनेकी आवश्यकता नहीं है। सभी स्त्रियाँ जगन्माताका स्वरूप हैं और सभी पुरुष जगत्पिताके अंग हैं। अत: कहीं भी घृणा, द्वेष या द्रोह तो होना ही नहीं चाहिये, परंतु साथ ही पतनकारक मोह भी नहीं होना चाहिये।

(४) सच्चे प्रेममें अपना सब कुछ प्रियतम प्रभुको समर्पित हो जाता है। अपना जीवन, अपना मन, अपना धन और अपना शरीर भी अपने लिये नहीं, प्रियतमकी सेवाके लिये ही रखा जाता है। प्रियतम जिस बातसे सुखी रहें, वही अपना कर्तव्य है, वही अपना आचार है, वही अपना धर्म है और वही अपना ध्येय है। उनका सुख ही अपना सुख है। अपने लिये तो सुख-दु:खका प्रश्न ही नहीं रह जाता। सती स्त्रीका सम्पूर्ण प्रेम पतिपरमेश्वरमें ही होना चाहिये। पति परमेश्वरका प्रतीक है। पतिका अर्थ हाड़-मांसका शरीर ही नहीं, उसमें व्याप्त परमात्मा है। नारीका प्रेम पतिके आत्मासे होता है; अतएव पतिके लौकिक शरीरका अन्त हो जानेपर भी सती नारीका सम्बन्ध उस आत्मासे बना ही रहता है और सती अपने सतीत्वके प्रतापसे स्वयं तो परमात्माको प्राप्त होती ही है; पतिको भी परमेश्वरकी प्राप्ति करा देती है।

(५) आपकी सहेलीका पति व्यभिचारी है और वह अपनी पत्नीको भी व्यभिचारके लिये बाध्य करना चाहता है, यह उसका घोर पाप है। इस अवस्थामें आपकी सहेली यदि सदाचारकी रक्षाके लिये पतिको छोड़कर चली आयी है तो यह उचित ही है। धर्म और ईश्वरसे विमुख करनेवाले प्रियसे भी प्रिय व्यक्तिका त्याग किया जा सकता है। जिस कर्मसे प्रेरकको भी पापका भागी होना पड़े वह कर्म, गुरुजनोंकी आज्ञारूप हो तो भी उसे नहीं करना चाहिये। पर हिंदू-नारीको इतना ध्यान अवश्य रखना चाहिये कि वह अपने सतीव्रतसे कभी स्खलित न होने पाये। जिस धर्म और सदाचारके लिये पतिका सामीप्य छोड़ा गया, वह पुरुषान्तरके साथ रहकर यदि भग्न कर दिया गया तो पहलेकी दृढ़ता कहाँ रह गयी। सती नारी अपने पतिका सर्वथा त्याग कभी नहीं करती; वह पथभ्रष्ट पतिको सुपथपर लानेके लिये और उसकी भूलोंको सुधारनेके लिये ही कुछ कालके लिये उससे दूर रहती है। उसका उद्देश्य पतिको पापपंकमें पड़नेसे बचाना मात्र है। वह आजीवन ब्रह्मचारिणी रहकर जीवन बिता दे, परंतु पतिका परित्याग करके दूसरे पुरुषको पति न माने। अन्यथा वह सन्मार्गसे भ्रष्ट होकर अपना लोक-परलोक दोनों बिगाड़ लेगी और उस मानव-कुल-कलंक पतिको तो क्या कहा जाय, जो स्वयं तो नरकका कीट बना ही हुआ है; अपनी पत्नीको भी पापपंकमें घसीटना चाहता है। यह जीवन—यह यौवन और यह सुन्दर शरीर सदा नहीं रहेगा। एक दिन उन्माद मिटेगा और इन पापाचारोंके लिये भीषण पश्चात्ताप और भारी ग्लानि होगी, पर उस समय रोने-धोनेसे कुछ भी बनेगा नहीं। कालके कठोर पंजोंसे और भयानक यमदण्डसे उसे बचानेवाला कोई नहीं मिलेगा। ईश्वर, परलोक और कर्मफलभोगपर कोई विश्वास करे या न करे, अपनी प्रबल तर्क-युक्तियोंसे या मूर्ख बहुमतके बलसे कोई चाहे इन्हें अस्वीकार कर दे; पर सत्य सत्य ही रहेगा। अनजानमें या अविश्वास करके भी कोई आगमें हाथ डालेगा तो वह जलेगा ही। न्यायकारी परमेश्वरके राज्यमें कर्मके अमिट परिणामसे कोई बच नहीं सकता। आज संसारमें दैव-दुर्विपाकसे नाना प्रकारकी आधि-व्याधि, दु:ख-शोक और भय-विनाशकी अग्निमें जलनेवाले प्राणी क्यों दिखायी देते हैं? यह सब उनके अपने ही पापोंका परिणाम है। पाप करते समय कोई अज्ञान या अहंकारके कारण इसकी परवा करे या न करे; एक दिन उसकी दुर्गति निश्चय होगी ही। मैं आपकी सहेलीसे, यदि वे मेरी बात मानें तो यही प्रार्थना करूँगा कि वे अपने गौरवकी ओर देखें, उस नराधम पतिके नीच आचरणोंपर दृष्टि न डालें। वे स्वयं सावधानीके साथ सदाचारकी रक्षा करती हुई भगवान‍्से प्रार्थना करें कि उनके पतिको सुबुद्धि प्राप्त हो। वे प्रात:स्मरणीया सीता और सावित्रीकी परम्परामें उत्पन्न हुई हैं; अत: अपनी श्रेष्ठ मर्यादाको कदापि न खोयें। भगवान् उनका मंगल करेंगे।

(६) शास्त्रमें जो कर्म निषिद्ध बताया गया है, जिसे करनेकी मनाही की गयी है, वह पाप है; उससे सदा बचना चाहिये। तथा शास्त्रोंमें जो कर्म करनेयोग्य बताये गये हैं, जिन्हें करनेके लिये स्पष्ट आदेश प्राप्त होते हैं, वे पुण्य हैं; उनका यथाशक्ति अनुष्ठान करना चाहिये। वेद, स्मृति, धर्म-शास्त्र आदि ही धर्माधर्मके निर्णायक शास्त्र हैं।

(७) शरीरसे दूर रहते हुए किसी व्यक्तिके प्रेममें व्याकुल रहना प्रभुके मिलनेका मार्ग नहीं है; यह तो उसी व्यक्तिके मिलनेका मार्ग है, जिसके लिये हृदयसे व्याकुल पुकार उठ रही है। फिर यदि वह व्यक्ति निषिद्ध है तो यह पुकार घोर नरकका मार्ग भी बन सकती है। प्रभु-प्राप्तिका उपाय तो निश्छल हृदयसे एकमात्र प्रभुको ही पुकारना है। प्रभुके लिये जितनी व्याकुलता होगी, वे उतनी ही शीघ्रतासे मिलेंगे। प्रभुका स्वरूप अज्ञानी पुरुषोंके लिये अव्यक्त तो है; पर कल्पित नहीं है। जो ज्ञानी-अज्ञानी, भक्त-अभक्त सबकी कल्पना करता है, जो संसारका एकमात्र स्रष्टा है, वह कल्पित नहीं, वह नित्यसिद्ध है। क्या आप सुन्दर मकान देखकर भी उसके बनानेवाले कारीगरको कल्पित कह सकती हैं? फिर अखिल ब्रह्माण्डोंके निर्माता उन महान् शिल्पी भगवान‍्को कल्पित कहनेका दु:साहस कौन बुद्धिमान् कर सकता है?

(८) यह ठीक है कि ध्यान उसीका करना चाहिये, जो सबसे प्रिय हो; परंतु सबसे प्रिय है कौन? इसका निर्णय कौन करेगा? बालकको खिलौना ही प्रिय है तो क्या वह उसीका चिन्तन करे? माता, पिता, पुत्र, धन, गृह, परिवार, पति, पत्नी, प्रेमी, भाई,बन्धु—ये सभी प्रिय समझे जाते हैं; इनमेंसे किसका ध्यान किया जाय? ये सब किसके लिये प्रिय हैं? अपने शरीरके लिये। मनुष्य अपने शरीरकी रक्षाके लिये सबको छोड़ देता है, अत: शरीर ही सबसे बढ़कर प्रिय हुआ। तब क्या इस नश्वर शरीरका ही ध्यान किया जाय? जब शरीरमें फोड़ा होता है और जीवनपर संकट उपस्थित हो जाता है, तब हम उसका ऑपरेशन करा देते हैं अपने जीवनके लिये। अत: जीवन ही प्रिय है। इस जीवनमें प्रियत्व कौन पाता है? आत्मा। (स्त्री, पुत्र, धन आदि) सबके प्रयोजनके लिये सब प्रिय नहीं होते, आत्माके प्रयोजनके लिये सब प्रिय होते हैं—

‘न वा अरे सर्वस्य कामाय सर्वं प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति.....’

(बृहदारण्यक०२।४।५)

अत: उपनिषदोंके मतमें आत्मा ही सबसे बढ़कर प्रिय है। आत्मा क्या है, हृदयस्थ परमात्मा ही सबके आत्मा हैं। भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र गीतामें कहते हैं—‘अर्जुन! मैं सब प्राणियोंके हृदयमें स्थित आत्मा हूँ।’

अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थित:।

(१०।२०)

अत: वे भगवान् ही सबसे अधिक प्रिय हैं; उन्हींका ध्यान कीजिये—भजन कीजिये। वे ही स्वयं प्रकाश हैं। उनका अनन्य-चिन्तन होनेपर उनकी प्राप्ति सुगम हो जाती है।

अनन्यचेता: सततं यो मां स्मरति नित्यश:।

तस्याहं सुलभ: पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिन:॥

(गीता ८।१४)

भगवान‍्ने कहा—‘अर्जुन! मुझमें अनन्यचित्तवाला जो पुरुष नित्य और सतत मेरा स्मरण करता है, उस नित्य मुझमें लगे हुए योगीके लिये मैं सुलभ हूँ।’ शेष भगवत्कृपा!