भगवान‍्के दिव्य आयुध

प्रिय महोदय! सप्रेम हरिस्मरण। पत्र मिला। धन्यवाद।

‘भूप सहस दस एकहिं बारा’

—यह पद्य आपके लिये एक जटिल समस्या बन गया है, यह बात मालूम हुई। आपकी ही भाँति और बहुत-से लोग भी इस विषयमें शंका करते हैं।

उत्तरमें निवेदन है कि आप पहले भगवान् और उनके दिव्य आयुधोंको समझ लें; फिर तो ऐसी शंका उठ ही नहीं सकती। भगवान् सर्वशक्तिमान् हैं; करने, न करने और अन्यथा करनेमें समर्थ पूर्ण परमेश्वर हैं। उनका स्वरूप सत्, चित् और आनन्दमय है। उनका शरीर हमलोगोंकी भाँति पंचतत्त्वका बना नहीं, दिव्य चिन्मय है। जैसा उनका स्वरूप है, वैसा ही उनका धाम है और वैसे ही उनके आयुध भी हैं। वे विष्णुरूपमें धनुष, गदा और सुदर्शन (चक्र) आदि धारण करते हैं तथा शिवरूपमें परशु, त्रिशूल तथा पिनाक नामक धनुष धारण करते हैं। ये धनुष आदि जड तत्त्वके द्वारा निर्मित नहीं, विशुद्ध चिन्मय हैं। भगवान‍्की इच्छाके अनुसार कार्य करते हैं। भगवान‍्की आज्ञासे सुदर्शनने मर्त्यलोकमें आकर अम्बरीषकी रक्षा की थी—यह बात प्राय: सब लोग जानते हैं। यही गुण भगवान् शिवके पिनाकमें भी है। वह भगवान् श्रीरामकी धनुर्भंगलीलाकी पूर्तिके लिये भगवान् शंकरकी इच्छासे ही कार्य-कारणवश जनकपुरमें आ पहुँचा था। वह भगवत्प्रेरणासे इच्छानुसार छोटा, बड़ा, हलका और भारी होनेकी शक्ति रखता था।

वह धनुष भगवान् शिवके इच्छानुसार काम करता था और स्वयं भी हलका-भारी हो सकता था—यह बात गोस्वामीजीने दिखानेकी चेष्टा की है। श्रीसीताजी भी धनुषकी इस अद्‍भुत शक्तिसे अपरिचित नहीं थीं। इसीलिये उन्होंने धनुषको हलका करनेके लिये पहले शिव-पार्वतीसे मन-ही-मन प्रार्थना की—

मनहीं मन मनाव अकुलानी।

होहु प्रसन्न महेस भवानी॥

करहु सफल आपनि सेवकाई।

करि हितु हरहु चाप गरुआई॥

यही प्रार्थना गणेशजीसे भी वे करती हैं—

बार बार बिनती सुनि मोरी।

करहु चाप गुरुता अति थोरी॥

अन्तमें वे घबराकर धनुषसे ही प्रार्थना करने लगती हैं—

सकल सभा कै मति भै भोरी।

अब मोहि संभुचाप गति तोरी॥

होहि हरुअ रघुपतिहि निहारी॥

और ऐसा ही हुआ। जब दस सहस्र राजा उठाने गये, तब वह बढ़ गया और बहुत भारी हो गया। फिर छोड़ देनेपर अपने स्वाभाविक रूपमें हो गया और श्रीरामजीने जब उठाया, तब इतना हलका हो गया कि अनायास ही उठ गया—

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अति लाघवँ उठाइ धनु लीन्हा॥

लेत चढ़ावत खैंचत गाढ़े।

काहुँ न लखा देख सबु ठाढ़े॥

उसका टूटना भी लीलामात्र ही था। अन्यथा चिन्मय धनुषका टूटना क्या है—वह देखनेमें जडवत् था, अतएव टूटनेकी क्रिया भी लोगोंके देखनेमें हुई। वास्तवमें पिनाक धनुष तो चिन्मय और अच्छेद्य है। वह सदा भगवान् शंकरके हाथोंमें शोभा पाता है।

भगवान् श्रीराम भी साक्षात् परमेश्वर थे; अत: उनकी शक्ति और लीलाके विषयमें कोई शंका नहीं उठ सकती। वे पंद्रह वर्षके होते हुए भी सदा सबके आदिपुरुष हैं। छोटे बालक-से प्रतीत होते हुए भी अखिल ब्रह्माण्डनायक परमेश्वर तथा घट-घटव्यापी परमात्मा हैं।