भगवान्के लिये व्याकुलताका अभाव
सप्रेम हरिस्मरण! कृपापत्र मिला, धन्यवाद। आप स्कूल जाते समय भगवान्का नाम जपते चलते हैं, ध्यानकी भी चेष्टा करते हैं और जो कोई भी मिल जाय उसे भगवत्स्वरूप मानकर मन-ही-मन प्रणाम भी किया करते हैं या करना चाहते हैं, यह बड़ी उत्तम बात है। प्रत्येक नामके साथ उसकी संख्या भी याद रखते हैं, किंतु इन सभी बातोंकी ओर दृष्टि रखनेमें आपको बड़ी कठिनाईका अनुभव होता है, यह सब कार्य एक साथ चले और कठिनाई भी न हो, इसका क्या उपाय है?—यही आपके प्रश्नका सारांश है।
अभ्यास न होनेसे आरम्भमें ऐसी कठिनाई हो सकती है। अभ्यास होनेपर ऐसा स्वभाव बन जाता है। फिर कोई कठिनाई नहीं होती। आप दो कोस जाते हैं, इतनी दूरीमें केवल सौ या पचास बार ही भगवान्का नाम ले पाते हैं, यह बहुत कम है। इसका कारण यही हो सकता है कि भगवान् और उनके नामोंका महत्त्व पूरा समझमें नहीं आया है, तभी उसमें रुचि नहीं हो पायी है। रुचि होनेपर तो उतनी देरीमें हजारों भगवन्नामका उच्चारण किया जा सकता है। आपने पत्रमें आगे जो बातें लिखी हैं, वे ठीक ही हैं; सचमुच ही हमलोग भगवान्की कोई आवश्यकता नहीं समझते। उनके बिना कोई काम रुका नहीं दिखायी देता। यह विपरीत दृष्टि हमारे ही पूर्वपापोंका फल है। जो इस जगत्को बनाते और बिगाड़ते हैं, जिनके बिना एक पत्ता भी नहीं हिल सकता, जिनकी शक्तिसे ही जगच्चक्रका संचालन हो रहा है, वे ही भगवान् अनावश्यक हो गये हैं। उनके बिना कोई काम रुकता नहीं दिखायी देता—यह अज्ञानकी पराकाष्ठा है!
इसका दूर होना भगवान्की अहैतुकी कृपापर ही निर्भर है। वे ही दया करके जब हमारे अज्ञानको हर लें और अपने ज्ञानकी दिव्य ज्योति हमारे अन्त:करणमें आलोकित कर दें, तभी हम उनकी महिमा समझ सकते हैं। फिर तो उनके लिये कुछ भी करनेमें न आलस्य होगा और न कठिनाईका अनुभव। आप प्रत्येक मनुष्य आदि प्राणीको भगवान् समझनेका यत्न करते हैं और उसमें कठिनाई होती है! क्यों? इसीलिये न कि आपके मनमें ऐसा विश्वास बना हुआ है कि ये भगवत्स्वरूप नहीं हैं। आमको इमली समझनेमें, मिट्टीको सोना माननेमें जो कठिनाई होती है, उसी तरहकी कुछ कठिनाई हमलोगोंको सर्वत्र और सबमें ईश्वर-भाव बनाये रखनेमें हुआ करती है।
आपने चीनीके बने हुए खिलौने देखे होंगे। उनमें घोड़ा, सवार, हाथी, पीलवान, मनुष्य, पशु, पक्षी, फल, मूल सभी तरहकी आकृतिवाले खिलौने होते हैं। वे हैं तो सब-के-सब चीनी, सबमें एक ही स्वाद है, फिर भी नाम, रूप और आकृतिमें भेद है। इसी प्रकार सम्पूर्ण जगत् जिस परमात्मासे प्रकट हुआ है, वे ही इसके उपादानकारण भी हैं। वे ही अनेक नाम-रूपोंमें दिखायी देते हैं। जैसे चीनीके बने हुए खिलौनोंमें चीनी ही सत्य है, नाम-रूप कल्पित हैं, उसी प्रकार परमात्मासे उत्पन्न हुए जगत्में परमात्मभाव ही सत्य है। जगद्भाव या नाम-रूप कल्पित है। इस बातको अच्छी तरह समझ लेनेपर एक-एक व्यक्तिको भगवान् माननेका अभ्यास नहीं करना पड़ेगा। जैसे आप अपनेको मनुष्य समझनेके लिये माला नहीं फेरते, इसी प्रकार सबको परमात्मरूप समझनेके लिये कोई कठिन अभ्यासकी आवश्यकता नहीं है। इस तत्त्वको एक बार समझ लेना है। फिर तो सब कुछ भगवान् है ही—‘वासुदेव: सर्वम्।’
मनुष्य धनके लिये रोता है, स्त्री और पुत्रके लिये रोता है, सगे-सम्बन्धियोंके लिये रोता है, किंतु भगवान्के लिये उसकी आँखोंसे आँसू नहीं निकलते। उनका महत्त्व इन गयी-बीती वस्तुओंसे भी कम मान रखा गया है। धन आता है और नष्ट हो जाता है। स्वामी, स्त्री-पुत्र, सगे-सम्बन्धी सब नाशवान् हैं, सबको एक दिन इस जगत्से नाता तोड़कर चल देना है और तो और, अपना यह शरीर भी, जिसका मोह हमें सबसे अधिक रहता है, हमें छोड़कर चल देता है या हमीं इसे विवश होकर छोड़ देते हैं। जब शरीर भी सदा साथ देनेवाला नहीं, तब जगत्के अन्य नश्वर पदार्थों, सम्बन्धों और व्यक्तियोंके लिये क्यों रोया-धोया जाय? भगवान् नित्य हैं, अजर-अमर हैं, सौन्दर्य, माधुर्य, ऐश्वर्य, सुख, आनन्द और ज्ञानके भण्डार हैं। हम जिन-जिन सुखोंकी कामनाके लिये, जिस शान्ति और सुविधाके लिये बाहर भटकते हैं, वे सभी अक्षयरूपसे भगवान्में नित्य और पूर्णरूपसे विराजमान हैं। वे ही भगवान् हमारे आत्मा हैं, प्राणोंके प्राण हैं, परम प्रियतम हैं, किंतु उनके लिये हमारे मनमें कभी दर्द नहीं उठता। हमारी दशा उन पागलोंकी-सी है, जो अपने सच्चे सुहृदोंको ही पराया समझते हैं और परायोंको अपना मानते हैं।
भगवान्की मोहिनी वंशी बज रही है, वे हमारा नाम ले-लेकर पुकारते हैं—‘मामेकं शरणं व्रज!’ पर हम नहीं सुनते। जहाँ हमें सब कुछ छोड़कर प्राणाधारसे मिलनेके लिये उत्सुक होकर दौड़ पड़ना चाहिये, न जाने कबके कितने युगोंके बिछुड़े हुए प्राणेशको हृदयसे लगानेके लिये व्याकुल हो जाना चाहिये और उनके चरणोंमें जाकर लोट जाना चाहिये। वहीं हम उनकी पुकारतक नहीं सुनते। उधरसे मुँह मोड़कर विपरीत दिशाकी ओर भागे जा रहे हैं। आनन्द और तृप्तिके एकमात्र भण्डार परमात्मारूपी जलाशयसे, सुधासागरसे दूर हटकर मरुकी मरीचिकामें प्यास बुझानेको दौड़ रहे हैं। फिर हमें वहाँ केवल जलन, केवल दु:ख और केवल नैराश्य ही हाथ लगे तो क्या आश्चर्य है।
यदि भगवान् हमें कर्मोंका पूरा-पूरा फल भुगताने लगें तो ‘नहिं निस्तार कल्प सत कोरी’—करोड़ों कल्पोंतक उद्धार न हो; किंतु वे तो ‘दीनबंधु अति मृदुल सुभाऊ’ हैं, जनका अवगुण नहीं देखते। उनकी जीवोंपर अकारण करुणा है; अतएव ‘कबहुँक करि करुना नर देही’ कभी दया करके ही वे हमें मानवशरीर, भारतवर्षमें जन्म और सनातन धर्मकी सेवाका शुभ अवसर प्रदान करते हैं। उनकी इस अपार दयाको भुलाकर यह मानना कि यह सब केवल हमें अपने अच्छे कर्मोंके प्रभावसे मिल गया है, इसमें भगवान्का हाथ नहीं है, मिथ्या अहंकारका परिचय देना है।
विश्वास नहीं है, परंतु सत्य यह है कि विश्वम्भर ही विश्वका भरण-पोषण करते हैं। वे भक्तोंका ही नहीं, प्राणिमात्रका योगक्षेम वहन कर रहे हैं। भक्त केवल उन्हींपर निर्भर रहता है, अत: उसको इस बातका प्रत्यक्ष अनुभव होता है। अभक्त सदा अपने अहंकारको ही सामने रखता है। क्या हम अपने परिश्रमसे ही कमाते-खाते हैं? परिश्रमके लिये जिसने शरीर दिया, साधन दिया, नीरोग रखा, नौकरी लगवायी और छिपे-छिपे न जाने और कितने उपकार किये, उस भगवान्का कोई स्थान नहीं है? हा दुर्भाग्य! तू मनुष्यका पीछा कब छोड़ेगा? कब उसे पद-पदपर भगवान्की कृपाका अनुभव करनेकी सुबुद्धि होगी?
‘केवल भगवान् ही सबके सच्चे सुहृद् हैं’—ऐसा दृढ़ विश्वास रखकर उनसे प्रेम बढ़ाते रहें, तभी कल्याण है। शेष भगवत्कृपा।