भगवान्के सामने निर्दोष रहें
प्रिय बहिन। सप्रेम हरिस्मरण। आपका पत्र मिला। आपके पतिदेव आपके चरित्रपर मिथ्या सन्देह करते हैं और इससे आपको बड़ा दु:ख है, सो तो ठीक ही है। निर्दोषके प्रति दोषारोपण होनेपर उसे स्वाभाविक ही बहुत दु:ख होता है, पर उसे विश्वास रखना चाहिये कि वह यदि भगवान्के दरबारमें निर्दोष है तो उसको वस्तुत: कोई भी दोषी नहीं बना सकता। मनुष्यको ऐसा कोई भी दोषयुक्त कार्य कभी छिपकर भी नहीं करना चाहिये, जिससे भगवान्की दृष्टिमें वह दोषी सिद्ध हो। बाहरसे कोई बहुत भला आदमी बना रहे, सब लोग उसे भला समझें और उसके मनमें दोष भरे हों, उसका भीतरी जीवन अपराधोंसे कलुषित हो तो उसके बाहरके भलेपनका कुछ भी महत्त्व नहीं है। वह अपने-आपको धोखा देता है। भगवान् तो धोखा खा नहीं सकते। पर जो किसी पूर्वजन्मके कर्म-फलके भोगरूपमें यहाँ दोषी, अपराधी, कलंकी कहलाता है, पर वस्तुत: उसमें दोष नहीं है, अन्तरसे परम पवित्र है, तो वह यहाँ चाहे जितना बदनाम हो जाय, भगवान् उसे कभी दोषी नहीं मानते और उसीका महत्त्व है। आप अलग रहने या अन्य किसी प्रकारसे कुछ करनेका कभी विचार न करें। सच्चे प्रेम, श्रद्धा तथा लगनके साथ पतिदेवकी सेवा करती रहें, उनके अनुकूल चलती रहें, अपने व्यवहार-बर्तावसे उनके हृदयपर अपनी भलाईका प्रभाव डालें। साथ ही इस कलंक भंजनके लिये मन-ही-मन कातर तथा आर्तभावसे भगवान्से प्रार्थना भी करती रहें। कुछ ही समय बाद आपके पतिदेवका मन आपके प्रति शुद्ध हो जायगा। आपकी आभ्यन्तरिक शुद्धि तथा व्यावहारिक सच्ची सेवाका असर पड़े बिना रहेगा ही नहीं। धैर्य रखें और पवित्र चित्तवृत्ति, बुद्धिमानी, दृढ़ आस्था, भगवद्विश्वास, श्रद्धा, नम्रता, सेवाभाव तथा सरल निष्कपट मधुर व्यवहारके द्वारा अपना प्रभाव-विस्तार करती रहें। वे कैसे मानते हैं, इसकी ओर दृष्टि न रखकर अपने चरित्रकी पवित्रता और सेवाभावपर विशेष ध्यान रखें। अपने-आप ही धीरे-धीरे उनका चित्त आपके प्रति अनुकूल होता जायगा।
संसारमें झूठे कलंक भी लग जाया करते हैं। भगवान् श्रीकृष्णपर भी मणि चुरानेका लोगोंने सन्देह कर लिया था। इसलिये घबराइये नहीं। किसी भी हालतमें सत्य और पवित्र चरित्रसे च्युत मत होइये। अन्तमें सत्यकी विजय होगी ही। आँधी आयी है, सो निकल जायगी। फिर वही निर्मल प्रकाश होगा, फिर वही यथार्थ दृष्टि होगी और उसमें सुखकी अनुभूति होगी।
सबसे आवश्यक वस्तु है भगवद्विश्वास। आप उसीका आश्रय लेकर भगवान्से प्रार्थना करती रहें। प्रार्थनामें बड़ी शक्ति है। उससे भगवत्कृपाकी अनुभूति होती है और भगवत्कृपा समस्त प्रतिकूलताओंको सहज ही अनुकूल बना देती है—
जापर कृपा राम कर होई।
तापर कृपा करहिं सब कोई॥
गरल सुधा रिपु करहिं मिताई।
गोपद सिंधु अनल सितलाई॥
आपके मनमें भगवत्प्रेम है और प्रभुकी समीपता प्राप्त करनेके लिये आप व्याकुल हैं, सो यदि ऐसी बात है तो आपका बड़ा ही सौभाग्य है। सब कुछ खोकर भी मनुष्य यदि भगवत्प्रेम प्राप्त कर ले और प्रभुकी सन्निधि प्राप्त करनेके लिये व्याकुल हो जाय तो जानना चाहिये कि उसका जीवन सफल हो गया। पर ऐसा माननेमें बहुत बार भ्रम होता है। मनुष्यके मनमें व्याकुलता होती है सांसारिक अनुकूलताकी प्राप्तिके लिये और उसे वह मान बैठता है भगवान्की समीपताके लिये। जिस भाग्यवान्के चित्तमें भगवान्के लिये जब यथार्थ व्याकुलता जाग्रत् हो जाती है, तब भगवान् उससे अलग नहीं रह सकते। जब क्षणमात्रका विलम्ब वस्तुत: असह्य हो जाता है, तब क्षणमात्र बीतनेके पहले ही प्रभु उसके पास पहुँच जाते हैं। आपके मनमें प्रभुके लिये जितना भी प्रेम और जितनी भी व्याकुलता है, वही बहुत सौभाग्य है! आप इस प्रेम तथा व्याकुलताको बढ़ाइये, पर इस बातको याद रखिये और आपके लिखनेके अनुसार आप यह भूल भी नहीं रही हैं कि आर्य-स्त्रीके लिये भगवान्की प्राप्ति पतिरूप परमेश्वरके द्वारा ही होती है। पति कितनी ही उपेक्षा करें, आप उपेक्षा न करें। आर्य-स्त्री पतिके द्वारा परित्यक्ता होनेपर भी पतिकी मंगलकामना करती है और इसीमें अपना सौभाग्य समझती है। आप भी इसी आदर्शका अनुकरण कीजिये।
आपको विद्यासे बहुत अनुराग है, सो बड़े आनन्दकी बात है, विद्या वस्तुत: बड़ी ही उत्तम वस्तु है। असली विद्या तो अध्यात्मविद्या है, जिसके द्वारा भगवान्की पहचान होती है। ......शेष भगवत्कृपा।