भगवान‍्के सामने सच्चे रहिये

आपका पत्र मिला। आप जिस परिस्थितिमें हैं, वह अवश्य ही बहुत शोचनीय है। मुझे आपके साथ पूर्ण सहानुभूति है। आपने अबतक भयानक संताप सहकर अपनेको बचाया, पर अब ऐसी परिस्थिति आ गयी कि उससे बचना असम्भव हो गया है और इस बातसे आपको बड़ा दु:ख है। सो ऐसी स्थितिमें दु:ख होना स्वाभाविक है। मनुष्य जिसको सबसे बढ़कर प्रिय वस्तु समझता है और जिसकी रक्षाके लिये अपना सब कुछ लगा देता है, वह वस्तु उसके पाससे जाने लगती है और वह अपनेको उसे बचानेमें जब सर्वथा असहाय और असमर्थ पाता है, तब उसे कितनी मानसिक पीड़ा होती है—इसे कोई भुक्तभोगी ही जानता है; साथ ही जब निर्दोष होनेपर भी—मनमें पूरी ईमानदारी होनेपर भी उसे डंकेकी चोट दोषी और बेईमान बताया जाता है, तब तो बड़ी ही मर्मपीड़ा होती है। इन सब बातोंपर विचार करनेसे, आपने जो कुछ लिखा है तथा जैसी अपनी स्थिति बतायी है, वह सर्वथा सत्य सिद्ध होती है।

यह भी सत्य है कि भगवान् सर्वशक्तिमान् हैं, वे चाहें तो क्षणभरमें स्थिति बदल दे सकते हैं। पर ऐसा करना, न करना उनकी इच्छापर निर्भर है। कोई भक्त अपनी एकान्त निष्ठा और अनन्य विश्वाससे उनमें ऐसे संकल्पका उदय करा दे तो यह हो सकता है; पर जो एकान्त निष्ठा और अनन्य विश्वाससम्पन्न होगा, वह किसी परिस्थितिविशेषको पलटनेकी इच्छा ही क्यों करेगा। जो कुछ हो रहा है, सब उसके परम सुहृद् एवं अनन्त मंगलमय भगवान‍्की दृष्टिमें और उन्हींके नियन्त्रणमें ही तो हो रहा है। वे यदि इसमें उसका कोई अहित समझते तो होने ही क्यों देते? जब होने देते हैं, तब अवश्य ही इसीमें उसका हित और मंगल भरा है। ऐसी अवस्थामें परिस्थितिके परिवर्तनका कोई प्रश्न ही नहीं रह जाता। असलमें बात भी यही है। जिसकी जीभकी स्वाद जाननेकी शक्ति चली नहीं गयी है, जिसके शरीरमें चेतना है, उसे कड़वी दवाका भी अनुभव होगा और डॉक्टरके द्वारा शस्त्रप्रयोग होनेपर पीड़ा भी होगी; परंतु वह इस बातसे न तो दु:खी होगा और न इस परिस्थितिको पलटना ही चाहेगा; क्योंकि वह जानता है कि कड़वी दवासे दूर होगा मेरा रोग और चीरा लगनेसे मेरे शरीरके अंदरका विष निकलेगा। हमलोग जो ऐसी दशामें दु:खी होते हैं सो अज्ञान और अविश्वासके कारण ही होते हैं। किसी वस्तुमें—धनमें, आराममें, भोगोंमें और मान-प्रतिष्ठामें—हमारी आसक्ति है, वह रोगकी तरह हमारे अणु-अणुमें व्याप्त है। भगवान् परम सुहृद् हैं, वे इस रोगसे हमें मुक्त करना चाहते हैं; इसीसे वैसी व्यवस्था करते हैं और हम अपनी आसक्तिकी वस्तुके बिछुड़ने, लगने या बिछुड़ जानेपर व्याकुल होकर रोते-कलपते हैं। वास्तवमें भगवान् दया करके हमारे पाप-तापको जला देना चाहते हैं। इसीसे प्रिय वस्तुका विनाश करके हमें दु:खाग्निमें—जो वस्तुत: दयामय भगवान‍्की लीला होनेपर भी मोहवश हमें ज्वालामालामयी अग्नि प्रतीत होती है—जलाकर शुद्ध करते हैं। किसी अबोध बच्चेके किसी अंगमें दर्द हो जानेपर स्नेहमयी माता उस अंगको किसी गरम-गरम वस्तुसे सेंकती है, बच्चा रोता है। यहाँ माताका उद्देश्य बच्चेको दु:ख देना नहीं, परंतु उसके उस दर्दको मिटाना है, जिससे वह अशान्त हो रहा है; पर बालक इस बातको न समझनेके कारण रोता-चिल्लाता है। ठीक यही दशा हमलोगोंकी है।

आप सच मानिये—आप जिस परिस्थितिमें हैं और जिस वस्तुको बचाना चाहते हैं, उसका उसी रूपमें रहना यदि आपके लिये हितकर होता तो उसके मिटानेकी व्यवस्था कभी नहीं होती। उसमें कुछ ऐसी सड़न, ऐसी बीमारी उत्पन्न हो गयी है, जो भविष्यमें आपको और भी दु:खी बना सकती है, इसीलिये—आपको भावी संकटसे बचाकर नवीन सुन्दर और सुरक्षित स्थिति प्राप्त करानेके लिये ही भगवान‍्के मंगल-विधानमें यह व्यवस्था है। मनुष्य वर्तमान अनुकूल अवस्थाको—जो विषभरे स्वर्णकलश या रेशम-लिपटे विषधर सर्पकी भाँति सुन्दर प्रतीत होनेपर भी वस्तुत: अनुकूल नहीं है—देखता है और उसकी रक्षा करना चाहता है; पर उसे पता नहीं कि यह अवस्था उसके लिये बड़ी भयानक है—इसके नष्ट हो जानेपर ही वह नयी अवस्थामें प्रवेश कर सकेगा, जो उसके लिये यथार्थमें हितकर और अनुकूल होगी। मैं समझता हूँ—मंगलमय भगवान‍्के विधानसे जब आपकी प्रिय वस्तुकी रक्षा नहीं हो रही है, तब यह निश्चित है कि यह वस्तु प्रिय होनेपर भी वस्तुत: आपके लिये हितकर नहीं है और इसके नाशसे उत्पन्न होनेवाली स्थिति या वस्तु अप्रिय प्रतीत होनेपर भी परिणाममें आपके लिये कल्याणकारिणी सिद्ध होगी।

अतएव आप घबराइये नहीं। प्रत्येक परिस्थितिमें मंगलमय भगवान् पर विश्वास रखकर निश्चिन्त और निर्भय रहिये। लोग गाली देंगे, अपमान करेंगे, तिरस्कार करेंगे, चोर-बेईमान बतलायेंगे और सब जगह आपपर लोग थूकेंगे। यही तो होगा न? इन सबको अपने परम सुहृद् भगवान‍्का भेजा हुआ आशीर्वाद समझकर सिर चढ़ाइये। ऐसा करना कठिन है, पर ऐसा करनेमें ही सुख-शान्ति है। साथ ही यह भी निश्चय मानिये कि भगवान‍्के सामने यदि आप सच्चे हैं, ईमानदार हैं, तो किसीके भी द्वारा झूठे और बेईमान बतलाये जानेसे आपकी परिणाममें कुछ भी हानि नहीं होगी। हानि तो वर्तमानमें भी नहीं है; क्योंकि यह तो आपके परम लाभका साधन हो रहा है, पर कड़वी दवाकी भाँति इसमें कड़वास मालूम होती है; परंतु परिणाममें तो प्रत्यक्ष परम कल्याण ही होगा, इसपर विश्वास कीजिये। आप कहेंगे कि ‘मुझे अपमान-निन्दाके लिये कोई दु:ख नहीं है। मुझे तो केवल इस बातका दु:ख है कि इस स्थितिसे कई निरपराध लोगोंकी हानि होगी और उन्हें बड़ा दु:ख पहुँचेगा।’ आपकी यह भावना बहुत ही श्रेष्ठ है। आपके निमित्तसे यदि किसीकी कुछ भी हानि होती है और उसे दु:ख पहुँचता है तो यह आपके लिये नि:सन्देह बड़े ही संतापकी बात है (यद्यपि उसकी वह हानि और दु:खप्राप्ति उसीके पूर्वकृत कर्मोंका फल है, आप तो उसमें निमित्तमात्र हैं, तथापि जब आप निमित्त हैं, तब आपको दु:ख होना ही चाहिये और यदि नीयत अशुद्ध है तो बड़ा पाप भी), पर इसके लिये अभी आप निरुपाय हैं। आपने जान-बूझकर उनको दु:ख पहुँचाने या उनकी हानि करनेका प्रयत्न नहीं किया है; वरं उन्हें हानि न हो, हो तो भी कम-से-कम हो और उन्हें दु:ख न पहुँचे, इसके लिये यथासाध्य पूरा प्रयत्न किया है। अब असहाय तथा असमर्थ हो गये हैं, तभी वह प्रयत्न छूटा है। इस स्थितिमें उनको दु:ख होने तथा उनके दु:खसे आपके दु:खी होनेकी बात स्वाभाविक होनेपर भी आप दोषी नहीं ठहरते। आप बेईमानी करते या उनके दु:खसे दु:खी नहीं होते तो अवश्य दोषी होते। भगवान् आपके सद्भावका आदर करेंगे और सम्भव है, (भगवान‍्ने चाहा तो) कुछ समयके बाद आपको ऐसी व्यवस्था करनेके लिये समर्थ बना देंगे कि आज जिनको दु:ख हुआ है, उनको आपके द्वारा उससे कहीं अधिक सुख मिल सके। पर यह तभी होगा, जब आपकी भावना इसी प्रकार निरन्तर शुद्ध बनी रहेगी और आपको ऐसा हुए बिना संतोष नहीं होगा।

यह भी सम्भव है कि आपलोगोंपर कानूनी कार्रवाई हो और उसमें आपको अपमानित—तिरस्कृत भी होना पड़े। पर इससे घबरानेकी जरूरत नहीं है। भगवान‍्के सामने सच्चे, ईमानदार तथा निर्दोष रहिये और फिर आनेवाली प्रत्येक स्थितिको भगवान‍्का प्रेमोपहार समझकर विनम्रभावसे सिर चढ़ाकर स्वीकार कीजिये। इसमें आपका परिणाममें निश्चित कल्याण है। इस उज्ज्वल भविष्यका निर्माण करना आपके ही हाथमें है। यह आँधी तो निकल ही जायगी; पर आप इसमें निर्दोष तथा निर्लेप बच रहेंगे तो सब कुछ हो जायगा। भगवान‍्की कृपापर विश्वास करके ऐसा ही कीजिये!

‘कल्याण’ के २३वें वर्षके ११वें अंकमें प्रकाशित ‘प्रभुके साथ सम्पर्क’ शीर्षक लेखको ध्यानपूर्वक पढ़ जाइये।